छत्तीसगढ़ : 9.7 करोड़ की साड़ी खरीद में साजिश , जांच के नाम पर दो महीने से सन्नाटा..

रायपुर। छत्तीसगढ़ में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए की गई 9.7 करोड़ रुपए की साड़ी खरीद का मामला अब भ्रष्टाचार की गहरी परतों में उलझ गया है। दो महीने बीत जाने के बाद भी न तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है और न ही किसी दोषी पर कार्रवाई की गई है। इस खामोशी ने विभाग की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

गुणवत्ता से खिलवाड़ की गई मापदंडों की अनदेखी..

विभागीय जांच में खुद यह बात सामने आई है कि सात जिलों में सप्लाई की गई साड़ियों की गुणवत्ता बेहद खराब थी। तय मापदंडों के अनुसार साड़ियों की लंबाई 6.3 मीटर होनी चाहिए थी, जो घटकर 5 मीटर तक रह गई। इसके अतिरिक्त, साड़ियों के रंग छोड़ने, धागे निकलने और कपड़े की घटिया गुणवत्ता की ढेरों शिकायतें सामने आई हैं। आश्चर्यजनक यह है कि खराब गुणवत्ता वाली साड़ियों की पुष्टि के बावजूद, सप्लायर को करोड़ों का भुगतान कर दिया गया।

तकनीकी जांच एजेंसी और विभाग की भूमिका दोनों संदिग्ध..

साड़ी खरीद से पहले मुंबई की राइट्स लिमिटेड नामक तकनीकी एजेंसी ने सैंपलों की जांच की थी। एजेंसी से हरी झंडी मिलने के बाद ग्रामोद्योग विभाग ने साड़ियों की सप्लाई की। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या जांच एजेंसी ने गलत रिपोर्ट दी थी? या फिर विभाग ने जानबूझकर उस रिपोर्ट को दबा दिया ताकि सप्लायर को लाभ पहुंचाया जा सके? क्या यह महज तकनीकी चूक थी या सुनियोजित वित्तीय अनियमितता, इसका जवाब देने वाला फिलहाल कोई नहीं है।

साइलेंट मोड’ में विभाग, कर्मचारियों पर दबाव..

मामले ने जब तूल पकड़ा, तो मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने भुगतान रोकने और साड़ियां बदलने के निर्देश दिए। विभागीय स्तर पर जांच समिति भी बनाई गई। लेकिन हकीकत यह है कि आज विभाग ‘साइलेंट मोड’ में है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को व्हाट्सएप ग्रुपों के जरिए हिदायत दी जा रही है कि वे मीडिया से कोई बात न करें। कार्रवाई की धमकी देकर सच को दबाने की यह कोशिश विभाग की नीयत पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।

कमीशनखोरी और संरक्षण की चर्चा..

विभागीय गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि इस खरीद प्रक्रिया में प्रभावशाली लोगों और मंत्री बंगले के करीबी व्यक्तियों की मिलीभगत है। इन्हीं आरोपों के कारण जांच की सुई किसी दोषी की ओर मुड़ने के बजाय ठंडे बस्ते में डाल दी गई है। उधर, पुरानी साड़ियाँ वापस लेने के बाद भी कई केंद्रों पर अब तक नई साड़ियाँ नहीं पहुंची हैं, जिससे कार्यकर्ता असमंजस में हैं।

फिलहाल, विभाग का पूरा जोर केवल साड़ियों को बदलने (रिप्लेसमेंट) पर है, ताकि मामले को रफा-दफा किया जा सके। लेकिन 9.7 करोड़ रुपए के सरकारी धन की बंदरबांट और दोषियों को मिल रहे कथित संरक्षण का सच कब बाहर आएगा, यह अब भी सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। क्या जांच की यह औपचारिकता किसी बड़े घोटाले पर पर्दा डालने की कवायद है? यह प्रश्न छत्तीसगढ़ की सियासत में गर्माया हुआ है।