मस्तूरी WCD में बड़ा घोटाला : नौनिहालों के फंड को डकार गए ‘साहब’, एक दीवार पोतकर खिंचाई फोटो, लाखों का बंदरबांट !

बिलासपुर/मस्तूरी। छत्तीसगढ़ में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा फासला है, इसका ताजा और शर्मनाक उदाहरण मस्तूरी विकासखंड में देखने को मिला है। नौनिहालों के पोषण, प्राथमिक शिक्षा और महिलाओं के विकास का जिम्मा संभालने वाला मस्तूरी एकीकृत महिला एवं बाल विकास विभाग (WCD) इन दिनों एक बड़े भ्रष्टाचार का अखाड़ा बन गया है। यहां आंगनबाड़ी केंद्रों के रखरखाव और रंगाई-पुताई के लिए आए सरकारी फंड का विभागीय ‘साहब’ और उनके मातहतों ने मिलकर ऐसा बंदरबांट किया है कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

कागजों में चमचमाते केंद्र, हकीकत में बदहाल..

मिली जानकारी के मुताबिक, मस्तूरी विकासखंड के अंतर्गत लगभग 300 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। नियमानुसार इन केंद्रों को बच्चों के अनुकूल बनाने और सुरक्षित रखने के लिए समय-समय पर मेंटेनेंस और रंग-रोगन किया जाना चाहिए। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि रखरखाव के अभाव में इन केंद्रों की स्थिति बद से बदतर हो गई है।

अधिकांश भवनों की दीवारें जर्जर हो चुकी हैं, प्लास्टर उखड़ रहे हैं और रंग-रोगन तो मानों दशकों से नहीं हुआ है। इन केंद्रों को देखकर ऐसा लगता है जैसे ये किसी खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। इसके उलट, अगर आप विभागीय फाइलों को पलटेंगे, तो अधिकारी यह दावा करते हुए सीना ठोकते नजर आएंगे कि ‘हमने इसी वर्ष सभी आंगनवाड़ियों की शानदार रंगाई-पुताई कराई है।’

ऐसे रची गई भ्रष्टाचार की पटकथा : एक दीवार की पुताई और फर्जी फोटो..

आखिर जब रंगाई-पुताई हुई ही नहीं, तो कागजों में यह काम कैसे पूरा हो गया? इस ‘घोटाले’ की कार्यप्रणाली बेहद चौंकाने वाली है। सूत्रों से मिली पक्की जानकारी के अनुसार, विभाग की ओर से आंगनबाड़ी केंद्रों के रंग-रोगन के लिए प्रत्येक सेक्टर को 50 से 60 हजार रुपये का भारी-भरकम फंड जारी किया गया था। लेकिन यह पैसा केंद्रों के सुधार में लगने के बजाय भ्रष्टाचारियों की जेब में चला गया।

बताया जा रहा है कि विभाग के एक रसूखदार ‘साहब’ ने मौखिक निर्देश जारी कर रंगाई-पुताई का पैसा वापस मंगा लिया। साहब का ‘मास्टरप्लान’ यह था कि फंड हजम भी हो जाए और ऊपर जवाब देने के लिए कागजी सबूत भी तैयार रहे। इसके लिए बकायदा फरमान जारी किया गया कि पूरे केंद्र की पुताई करने की कोई जरूरत नहीं है। केवल केंद्र की ‘एक दीवार’ की पुताई की जाए और उसी दीवार की फोटो खींचकर विभाग को भेज दी जाए।

मजबूर कार्यकर्ता और फाइलों में दफ्न सच्चाई..

बड़े अधिकारियों के इस तुगलकी फरमान के आगे बेचारी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी बेबस नजर आईं। नौकरी पर आंच न आए, इसलिए उन्होंने वही किया जो उन्हें मौखिक रूप से आदेशित किया गया था।

सभी सेक्टरों में मौजूद आंगनबाड़ी केंद्रों की सिर्फ एक दीवार पोती गई, उसकी तस्वीर कैमरे में कैद की गई और उसे विभागीय अधिकारियों के पास भेजकर ‘काम पूरा’ होने की रिपोर्ट फाइल कर दी गई। इसके बाद उस बड़े फंड का विभाग के भीतर ही गुपचुप तरीके से बंदरबांट कर लिया गया।

लाखों के गबन की आशंका, जांच हो तो खुलेंगे कई राज..

मस्तूरी विकासखंड में सामने आया यह मामला तो महज एक बानगी है। एक दीवार पोतकर लाखों का फंड डकार जाने की यह कलाकारी अगर यहां हो सकती है, तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पूरे जिले में भी इसी तर्ज पर खेल खेला गया होगा। जानकारों का कहना है कि आंगनबाड़ी के रंग-रोगन के नाम पर प्रति सेक्टर 50-60 हजार रुपये का यह हिसाब अगर पूरे जिले के पैमाने पर जांचा जाए, तो यह लाखों रुपये के बड़े गबन का मामला साबित होगा।

अब देखना यह है कि जिले के आला अधिकारी और जिला प्रशासन इस मामले में क्या संज्ञान लेते हैं। यदि इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, तो महिला एवं बाल विकास विभाग के कई चेहरों से नकाब उतरना तय है।