नीति आयोग ने Frontier Tech पहल में शामिल किया छत्तीसगढ़ का AI मॉडल, 21 महीने तक उदंती-सीतानदी में नहीं हुई मानव या हाथी की मौत..

रायपुर। जंगल और गांवों के बीच बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष को कम करने की दिशा में छत्तीसगढ़ ने तकनीक के जरिए एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसकी चर्चा अब देशभर में हो रही है। राज्य में विकसित ‘गजसंकेत’ नवाचार को नीति आयोग की Frontier Tech पहल में देश के प्रमुख नवाचारों में शामिल किया गया है। खास बात यह है कि यह व्यवस्था हाथियों की गतिविधि की जानकारी मिलने के बाद केवल सूचना दर्ज नहीं करती, बल्कि संभावित खतरे वाले गांवों की पहचान कर वहां पहले से अलर्ट पहुंचाती है। इसका उद्देश्य हाथी और इंसान के आमने-सामने आने की स्थिति को बनने से पहले रोकना है।
पहले हाथी की तलाश, फिर गांवों को अलर्ट..
गजसंकेत की पूरी व्यवस्था जंगल में तैनात वनकर्मियों और हाथी ट्रैकिंग टीमों से शुरू होती है। फील्ड में हाथियों की गतिविधि, उनके स्थान और झुंड की दिशा की जानकारी जुटाई जाती है। यह जानकारी GPS और GIS तकनीक के जरिए सिस्टम तक पहुंचती है। इसके बाद जियो-फेंसिंग की मदद से यह पता लगाया जाता है कि हाथियों की संभावित आवाजाही के दायरे में कौन-कौन से गांव आ रहे हैं।
खतरे वाले क्षेत्र की पहचान होते ही संबंधित ग्रामीणों और वन अमले को SMS, WhatsApp और वॉयस मैसेज के जरिए चेतावनी भेजी जाती है। इससे ग्रामीण समय रहते सतर्क हो जाते हैं और वन विभाग की टीम भी मौके पर पहुंचकर आवश्यक कदम उठा सकती है। यानी पहले जहां हाथी के गांव में पहुंचने के बाद प्रतिक्रिया शुरू होती थी, वहीं गजसंकेत में कोशिश है कि हाथी के पहुंचने से पहले ही गांव को खबर मिल जाए।
AI के साथ वनकर्मियों की भूमिका भी अहम..
गजसंकेत की खासियत केवल Artificial Intelligence नहीं है। इसकी सफलता के पीछे तकनीक के साथ मैदान में काम करने वाले वनकर्मियों की सक्रिय भूमिका भी है। हाथियों की गतिविधियों की वास्तविक जानकारी फील्ड स्टाफ उपलब्ध कराता है और तकनीकी सिस्टम उस जानकारी को उपयोगी चेतावनी में बदलने का काम करता है। इस पूरी व्यवस्था में फील्ड इंटेलिजेंस, AI, GIS, GPS, जियो-फेंसिंग, रियल टाइम अलर्ट, पैदल गश्त और ग्रामीणों की भागीदारी को एक साथ जोड़ा गया है। जहां मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट की सुविधा कमजोर है, वहां तकनीक के साथ मुनादी और पारंपरिक सूचना तंत्र का भी इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह गजसंकेत का उद्देश्य वनकर्मियों की जगह तकनीक को खड़ा करना नहीं, बल्कि उनकी क्षमता को और मजबूत करना है।
445 से घटकर 107 हुईं संघर्ष की घटनाएं..
नीति आयोग की Frontier Tech केस स्टडी में गजसंकेत और इससे जुड़े अन्य प्रयासों के प्रभाव का भी उल्लेख किया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं 2022-23 में 445 थीं, जो 2024-25 में घटकर 107 रह गईं। इसी अवधि में मुआवजा भुगतान में भी बड़ी कमी दर्ज की गई। मुआवजा राशि लगभग 79 लाख रुपये से घटकर 19 लाख रुपये रह गई। यह आंकड़े बताते हैं कि हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखने, समय पर सूचना देने और ग्रामीणों को पहले से सतर्क करने की व्यवस्था का संघर्ष प्रबंधन पर सकारात्मक असर पड़ा है।
उदंती-सीतानदी में 21 महीने तक नहीं हुई मौत..


गजसंकेत से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व का उदाहरण सामने आया है। नीति आयोग की केस स्टडी के अनुसार, यहां इस तरह के हस्तक्षेप लागू होने के बाद 21 महीनों तक मानव या हाथी की मृत्यु नहीं हुई। मानव-हाथी संघर्ष वाले क्षेत्रों में यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि हाथियों की आवाजाही वाले जंगलों से लगे गांवों में आमने-सामने की स्थिति को रोकना सबसे बड़ी चुनौती होती है।
60 लाख से ज्यादा अलर्ट जारी..
गजसंकेत की पहुंच का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सितंबर 2025 तक छत्तीसगढ़ में करीब 60 लाख अलर्ट जारी किए जा चुके थे। इन अलर्ट का मकसद संभावित हाथी गतिविधि वाले इलाकों में रहने वाले लोगों और संबंधित वन अमले तक समय पर सूचना पहुंचाना है। इस व्यवस्था में अलर्ट जितनी जल्दी पहुंचता है, ग्रामीणों को उतना ही अधिक समय सावधानी बरतने के लिए मिलता है। इसी वजह से इसे केवल सूचना प्रणाली के बजाय प्रिवेंटिव यानी पहले से बचाव करने वाली व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।
कम खर्च में तैयार हुआ बड़ा मॉडल..
गजसंकेत की एक और खासियत इसकी लागत प्रभावशीलता है। अत्यधिक महंगे ढांचे पर निर्भर रहने के बजाय इसमें उपलब्ध तकनीक को स्थानीय स्तर की जानकारी, वनकर्मियों की मेहनत और ग्रामीणों की भागीदारी के साथ जोड़ा गया है। नीति आयोग ने इसे कम लागत में बड़े क्षेत्र में लागू किए जा सकने वाले मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व मॉडल के रूप में देखा है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ का यह प्रयोग दूसरे वन क्षेत्रों और राज्यों के लिए भी उपयोगी मॉडल बन सकता है।
अब छत्तीसगढ़ का मॉडल दूसरे राज्यों के लिए मिसाल..
मानव-वन्यजीव संघर्ष देश के कई राज्यों में बड़ी चुनौती है। हाथियों की आवाजाही वाले क्षेत्रों में ग्रामीणों की सुरक्षा के साथ हाथियों का संरक्षण भी जरूरी है। ऐसे में छत्तीसगढ़ का गजसंकेत मॉडल दोनों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक व्यावहारिक प्रयास के रूप में सामने आया है। गजसंकेत को नीति आयोग की राष्ट्रीय Frontier Tech पहल में जगह मिलना इस बात का संकेत है कि स्थानीय स्तर पर तैयार समाधान भी आधुनिक तकनीक के सहारे राष्ट्रीय मॉडल बन सकते हैं।
घटना के बाद नहीं, खतरे से पहले कार्रवाई..
गजसंकेत की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी सोच में दिखाई देती है। इसका पूरा मॉडल इस सिद्धांत पर काम करता है कि दुर्घटना या संघर्ष होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय संभावित खतरे की पहचान पहले की जाए। हाथियों की गतिविधि पर नजर, लोकेशन की पहचान, संभावित गांवों का निर्धारण, तत्काल अलर्ट और मौके पर वन अमले की मौजूदगी – इन सभी कड़ियों को जोड़कर गजसंकेत ने फील्ड में मिलने वाली जानकारी को समय पर कार्रवाई योग्य सूचना में बदलने की कोशिश की है।
नीति आयोग द्वारा इस नवाचार को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलना छत्तीसगढ़ के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह संदेश भी देता है कि AI और आधुनिक तकनीक का सही इस्तेमाल केवल डिजिटल दुनिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे इंसानों और वन्यजीवों दोनों की जान बचाने में मदद मिल सकती है।
गजसंकेत की खास बातें..

हाथियों की गतिविधियों की रियल टाइम निगरानी
GPS और GIS आधारित लोकेशन सिस्टम
जियो-फेंसिंग से संभावित प्रभावित गांवों की पहचान
SMS, WhatsApp और वॉयस मैसेज से अलर्ट
AI आधारित सूचना विश्लेषण
वनकर्मियों की पैदल गश्त और फील्ड इंटेलिजेंस
नेटवर्क विहीन क्षेत्रों में मुनादी से सूचना
सितंबर 2025 तक करीब 60 लाख अलर्ट जारी
2022-23 से 2024-25 के बीच संघर्ष की घटनाएं 445 से घटकर 107







