घटौद बांध में पानी से जूझता मिला था लॉन्ग-बिल्ड वल्चर, वन विभाग ने किया रेस्क्यू; इलाज और पुनर्वास के बाद E-12 रिंग के साथ चोकसिल हिल्स में छोड़ा..

गरियाबंद। एक ग्रामीण की सजगता और वन विभाग की त्वरित कार्रवाई ने एक अति संकटग्रस्त लॉन्ग-बिल्ड वल्चर की जान बचा ली। घटौद बांध के पास पानी में संघर्ष करते मिले इस युवा गिद्ध को ग्रामीण ने समय रहते देख लिया और तत्काल वन विभाग को सूचना दी। इसके बाद शुरू हुआ रेस्क्यू, उपचार और करीब 25 दिनों तक चले पुनर्वास का अभियान आखिरकार सफल रहा। स्वस्थ होने के बाद गिद्ध ने 25 अगस्त को उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के चोकसिल हिल्स में खुले आसमान में उड़ान भरी।
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यह पूरा संरक्षण अभियान इस बात की मिसाल बन गया कि वन्यजीवों की सुरक्षा में स्थानीय ग्रामीणों की सतर्कता कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। वन विभाग के अनुसार, यह लॉन्ग-बिल्ड वल्चर संभवतः इंद्रावती टाइगर रिजर्व क्षेत्र से उड़कर उदंती क्षेत्र में पहुंचा था।
पानी में संघर्ष करता दिखा था गिद्ध..
घटना 30 जुलाई की है। धवलपुर रेंज के घटौद बांध के समीप स्थानीय ग्रामीण रामदयाल नेताम की नजर पानी में संघर्ष कर रहे एक गिद्ध पर पड़ी। पक्षी पूरी तरह भीगा हुआ था और काफी थका हुआ नजर आ रहा था। ग्रामीण ने बिना देर किए वन विभाग को इसकी सूचना दी।
सूचना मिलते ही धवलपुर रेंज का वन अमला मौके पर पहुंचा और गिद्ध को सुरक्षित बाहर निकाला। पक्षी को वन शिविर में लाकर उसके पंखों को सुखाया गया। इसके बाद उसे भोजन, पानी और सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराया गया।
ग्रामीण बना रेस्क्यू अभियान की पहली कड़ी..
वन विभाग ने घटौद के ग्रामीणों की भूमिका को इस पूरे अभियान में बेहद महत्वपूर्ण बताया है। यदि ग्रामीण समय पर पक्षी को नहीं देखते और विभाग को सूचना नहीं देते, तो उसकी हालत और गंभीर हो सकती थी।रेस्क्यू टीम में रेंज असिस्टेंट दौलाल मंडले, बीएफओ इंद्रदेव सिंह ठाकुर, एएनआर/चौकीदार यतीश, एएनआर/चौकीदार संजय सहित स्थानीय ग्रामीण शामिल रहे। उनकी तत्परता से संकटग्रस्त पक्षी को समय पर प्राथमिक सहायता मिल सकी।
विशेषज्ञों ने किया स्वास्थ्य परीक्षण..


गिद्ध के रेस्क्यू की जानकारी मिलने के बाद उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर गुरुनाथन एन., उप संचालक वरुण जैन और पशुचिकित्सक डॉ. राकेश वर्मा ने धवलपुर पहुंचकर पक्षी का परीक्षण किया। जांच के बाद उसे आगे के उपचार और पुनर्वास के लिए उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व की देखरेख में रखने का निर्णय लिया गया। पशुचिकित्सक ने पक्षी की स्वास्थ्य स्थिति की नियमित निगरानी की और उसके लिए आवश्यक पोषण, पानी, दवाओं तथा सप्लीमेंट की व्यवस्था की।
25 दिन तक वनरक्षक ने की दिन-रात देखभाल..
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में लाए जाने के बाद गिद्ध को जिदार वन चौकी में रखा गया। यहां वनरक्षक ओम प्रकाश राव ने करीब 25 दिनों तक उसकी लगातार देखभाल की।
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इस दौरान गिद्ध को प्रतिदिन करीब 700 ग्राम स्वस्थ मटन, पर्याप्त पानी और आवश्यक सप्लीमेंट एवं दवाएं दी गईं। उसके भोजन करने, गतिविधियों, सतर्कता और शारीरिक स्थिति पर लगातार नजर रखी गई। धीरे-धीरे पक्षी की हालत में सुधार आने लगा। जब उसने पर्याप्त ताकत हासिल कर ली और स्वतंत्र रूप से जीवित रहने के लिए फिट पाया गया, तब उसे वापस जंगल में छोड़ने की तैयारी शुरू की गई।
GPS टैग नहीं मिल सका, BNHS की रिंग से मिली पहचान..
रिहाई के बाद गिद्ध की पहचान और भविष्य में निगरानी के लिए GPS/GSM टैगिंग पर भी विचार किया गया था, लेकिन निर्धारित समय में आवश्यक उपकरण उपलब्ध नहीं हो सका। इसके बाद बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS), मुंबई की ओर से उपलब्ध कराई गई बर्ड रिंग से गिद्ध को व्यक्तिगत पहचान दी गई। गिद्ध को E-12 रिंग कोड से चिन्हित किया गया है। इससे भविष्य में इस पक्षी की पहचान और उसके बारे में मिलने वाली जानकारी को रिकॉर्ड करना आसान होगा। वन्यजीव विशेषज्ञ अभिजीत शर्मा, बिलासपुर के मार्गदर्शन ने भी पुनर्वास प्रक्रिया में सहयोग दिया।
4.23 किलो वजन के साथ जंगल में लौटाया..
करीब 25 दिनों के पुनर्वास के बाद 25 अगस्त को दक्षिण उदंती रेंज के चोकसिल हिल्स में इस लॉन्ग-बिल्ड वल्चर को प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया। रिहाई के समय उसका वजन 4.23 किलोग्राम था और उसकी उम्र करीब छह महीने आंकी गई। E-12 रिंग से चिन्हित किए जाने के बाद जैसे ही उसे खुले जंगल में छोड़ा गया, उसने सफलतापूर्वक उड़ान भरी और अपने प्राकृतिक आवास की ओर लौट गया। इस दृश्य ने रेस्क्यू और पुनर्वास अभियान में शामिल वन अमले और विशेषज्ञों के प्रयासों को सफल कर दिया।
कई विभागों और कर्मचारियों की रही भूमिका..
रिहाई के दौरान उप संचालक वरुण जैन, पशुचिकित्सक डॉ. राकेश वर्मा, कुल्हाड़ीघाट रेंज के पशुचिकित्सक रेंज अधिकारी दिनेश चौधरी, ओम प्रकाश राव, सूर्यदेव जगतवंशी, ड्रोन ऑपरेटर मनीष राजपूत तथा ट्रैकर्स गौकरण, नीरू नेताम, दीपक निर्मलकर, योनेश यादव, ओंकार यादव और दामरूधर यादव सहित वन अमला मौजूद रहा।
वन विभाग के अनुसार, इस सफलता के पीछे किसी एक व्यक्ति का योगदान नहीं, बल्कि ग्रामीणों से लेकर वनकर्मियों, पशुचिकित्सकों, वन्यजीव विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मचारियों की सामूहिक मेहनत रही।
संकटग्रस्त प्रजाति को बचाना क्यों अहम?
लॉन्ग-बिल्ड वल्चर यानी Gyps indicus अति संकटग्रस्त प्रजातियों में शामिल है। गिद्ध प्रकृति के महत्वपूर्ण सफाईकर्मी माने जाते हैं। मृत पशुओं के शवों को प्राकृतिक रूप से हटाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जिससे पर्यावरण की स्वच्छता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। ऐसे में एक युवा गिद्ध को बचाकर उसे दोबारा जंगल में छोड़ना केवल एक पक्षी की जान बचाना नहीं, बल्कि संकटग्रस्त प्रजाति के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
ग्रामीण से शुरू हुई कहानी, जंगल में उड़ान के साथ हुई पूरी..
घटौद बांध में पानी से जूझते गिद्ध को देखकर रामदयाल नेताम ने जिस समय वन विभाग को सूचना दी, उसी समय इस संरक्षण अभियान की शुरुआत हुई थी। करीब 25 दिन तक उपचार और देखभाल के बाद वही गिद्ध अब चोकसिल हिल्स के जंगल में स्वतंत्र रूप से उड़ रहा है।
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एक ग्रामीण की सजग नजर, वन अमले की तत्परता, पशुचिकित्सकीय देखभाल और वैज्ञानिक पुनर्वास – इन सभी के समन्वय से E-12 लॉन्ग-बिल्ड वल्चर को नया जीवन मिला और वह फिर अपने प्राकृतिक घर लौट सका।







