सियासी पिच पर भाजपा का दबदबा बरकरार, लेकिन ‘कांग्रेस मुक्त’ होने से अभी कोसों दूर है भारत : समझें आंकड़ों का खेल..

नई दिल्ली। देश के सियासी गलियारों में अक्सर यह बहस छिड़ती है कि क्या भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी ‘कांग्रेस’ अब खात्मे की कगार पर है? 2026 के हालिया विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा नतीजों का गहराई से विश्लेषण करें, तो तस्वीर एक अलग ही कहानी बयां करती है। यह सच है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आज देश की निर्विवाद रूप से सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है, लेकिन आंकड़ों के आइने में कांग्रेस का अस्तित्व न केवल सुरक्षित है, बल्कि वह विपक्ष की धुरी भी बनी हुई है।

लोकसभा में दिखा था रिकवरी का ‘ट्रेलर’

अगर हम सबसे ताज़ा राष्ट्रीय डेटा (2024 लोकसभा) पर नज़र डालें, तो भाजपा को लगभग 36.5 से 37% वोट शेयर के साथ 240 सीटें मिली थीं। वहीं, कांग्रेस ने अपने प्रदर्शन में ज़बरदस्त सुधार करते हुए 21-22% वोट शेयर के साथ 99 सीटें (2019 की 52 सीटों के मुकाबले लगभग दोगुनी) हासिल कीं। भाजपा का वोट शेयर भले ही कांग्रेस से 1.7 गुना ज्यादा हो, लेकिन कांग्रेस ने खुद को मुख्य विपक्षी दल के रूप में मजबूती से स्थापित किया है। NDA के 293 के मुकाबले INDIA गठबंधन का 234 सीटों तक पहुंचना बताता है कि विपक्ष पूरी तरह से मैदान में डटा है।

2026 के विधानसभा चुनाव : क्षत्रपों के साथ राज्यों की जंग..

वर्तमान में (2026 तक) राज्य स्तर पर भाजपा और NDA का दबदबा कायम है। देश के 17 से 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उनकी सरकारें हैं। 2026 के हालिया चुनावों में पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 200 से अधिक सीटें जीतकर इतिहास रचा है, वहीं असम में पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटी है।

लेकिन, दक्षिण में कांग्रेस का किला अब भी मजबूत है। हाल ही में केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने बड़ी जीत दर्ज की है। इसके अलावा कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना में पार्टी अपने दम पर सत्ता में है। तमिलनाडु में नई पार्टी TVK के उभार के बावजूद कांग्रेस गठबंधन की राजनीति में प्रासंगिक बनी हुई है।

आखिर क्यों खत्म नहीं हो सकती कांग्रेस?

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, किसी भी पार्टी को खत्म मानने से पहले उसके जनाधार को देखना चाहिए :

विशाल वोट बैंक : 21% से अधिक राष्ट्रीय वोट शेयर का मतलब है कि आज भी देश के करीब 13 करोड़ से ज्यादा मतदाता कांग्रेस पर भरोसा करते हैं।

गठबंधन की ताकत : भारत की राजनीति अब क्षेत्रीय क्षत्रपों (TMC, SP, DMK) के इर्द-गिर्द भी घूमती है। कोई एक पार्टी पूरे देश में नहीं जीत सकती, इसलिए कांग्रेस ‘INDIA’ गठबंधन के जरिए क्षेत्रीय विविधता को साध रही है।

ऐतिहासिक कैडर : पार्टी का संगठित ढांचा और ब्रांड वैल्यू देश के हर गांव तक आज भी मौजूद है।

आगे की राह और चुनौतियां..

भले ही कांग्रेस का अंत निकट नहीं है, लेकिन चुनौतियां पहाड़ जैसी हैं। भाजपा का आक्रामक विकास और हिंदुत्व का नैरेटिव, मजबूत नेतृत्व और चुनावी मशीनरी कांग्रेस के लिए लगातार खतरे की घंटी है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में पार्टी को अपनी संगठनात्मक कमजोरियों को दूर करना होगा।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम में सीटें कम दिख सकती हैं, लेकिन जिस पार्टी के पास देश के हर 5वें मतदाता का समर्थन हो, उसे ‘खत्म’ मान लेना राजनीतिक भूल होगी। 2029 की असली लड़ाई इस बात पर निर्भर करेगी कि कांग्रेस अपनी इस ‘रिकवरी’ को ‘जीत’ में कैसे बदलती है।