रायपुर में सफेद हाथी बनी 4.5 करोड़ की गारमेंट फैक्ट्री : सत्ता बदली तो योजना पलटी, 500 महिलाओं के रोजगार पर 4 साल से जड़ा है ताला..

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अफसरशाही और सरकारी नीतियों के भंवर में कैसे एक शानदार योजना दम तोड़ देती है, मोवा क्षेत्र की गारमेंट फैक्ट्री इसका सबसे सटीक और जीता-जागता उदाहरण है। बस्तर के बहुचर्चित ‘दंतेवाड़ा मॉडल’ की तर्ज पर राजधानी की 500 महिलाओं को स्वावलंबी बनाने का जो सुनहरा सपना बुना गया था, वह पिछले चार सालों से एक बंद इमारत में कैद होकर धूल फांक रहा है।

नगर निगम ने 4.5 करोड़ रुपये फूंककर डेढ़ एकड़ जमीन पर एक शानदार बिल्डिंग तो तान दी, लेकिन इस करोड़ों की मशीनरी को चलाएगा कौन? इस अहम सवाल का जवाब आज तक जिम्मेदार नहीं खोज पाए हैं। बिना किसी विजन के बनाई गई यह बिल्डिंग अब महज एक ‘सफेद हाथी’ बनकर रह गई है।

सत्ता परिवर्तन की भेंट चढ़ा 10 करोड़ का ‘बैकअप प्लान’

इस ड्रीम प्रोजेक्ट के फ्लॉप होने की असली कहानी सरकारी नीतियों के यू-टर्न से शुरू होती है। पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में तय हुआ था कि फैक्ट्री को रफ्तार देने के लिए 10 करोड़ रुपये की अत्याधुनिक मशीनें सरकारी अनुदान से स्थापित की जाएंगी। लेकिन, राज्य में सत्ता बदलते ही प्रोजेक्ट के नियम भी 360 डिग्री घूम गए।

नई व्यवस्था के तहत सरकार ने अनुदान से साफ हाथ खींच लिए। फरमान जारी हुआ कि अब जो भी प्राइवेट एजेंसी इसे चलाएगी, उसे खुद ही मशीनें खरीदनी होंगी, पूरा सेटअप लगाना होगा और कर्मचारियों का वेतन भी खुद निकालना होगा। जाहिर है, बिना किसी सरकारी सब्सिडी के इतने भारी-भरकम वित्तीय जोखिम को उठाने के लिए कोई भी बड़ी कंपनी आगे नहीं आई।

बिना ‘नीति’ के निवेश की उम्मीद कैसे?

साल 2024 में नगर निगम ने कंपनियों को लुभाने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया। कुछ बाहरी कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई भी, लेकिन जब बात धरातल पर आई तो मामला फिर अटक गया। औद्योगिक जानकारों का स्पष्ट कहना है कि छत्तीसगढ़ में गारमेंट इंडस्ट्री को लेकर कोई स्पष्ट और ठोस नीति (पॉलिसी) ही नहीं है।

आज देश में गुजरात, दक्षिण भारत और कोलकाता जैसे राज्य टेक्सटाइल के बेताज बादशाह हैं क्योंकि वहां का इकोसिस्टम निवेशकों के अनुकूल है। वहीं छत्तीसगढ़ का बाजार अब भी केवल होजरी, साड़ियों और स्कूल ड्रेस के इर्द-गिर्द घूम रहा है। खपत के लिहाज से रायपुर बड़ा बाजार जरूर है, लेकिन लार्ज-स्केल मैन्युफैक्चरिंग के लिए जो माहौल चाहिए, वह यहां नदारद है।

अब बैकफुट पर निगम : छोटे स्तर से बोहनी की तैयारी..

तीन साल में दो बार टेंडर फेल होने और 4 साल की लगातार नाकामी के बाद, अब नगर निगम अपने ‘मेगा विजन’ से समझौता करने को मजबूर हो गया है। बीते 6 महीने में नगरीय प्रशासन विभाग तीन बार निविदाएं (टेंडर) जारी कर चुका है।

लगातार हो रही फजीहत के बीच अब 500 महिलाओं के रोजगार के बड़े लक्ष्य को किनारे कर दिया गया है। नई रणनीति के तहत अब 3 से 4 छोटी एजेंसियों ने काम शुरू करने में रुचि दिखाई है। निगम की कोशिश सिर्फ इतनी है कि किसी तरह इस फैक्ट्री का ताला खुल जाए, भले ही शुरुआत चंद मशीनों और कम वर्करों के साथ छोटे स्तर (Small Scale) से ही क्यों न हो।

इस लेटलतीफी और नई कवायद पर नगर निगम के कार्यपालन अभियंता इमरान खान का कहना है कि, गारमेंट फैक्ट्री के संचालन के लिए हाल ही में तीसरी निविदा जारी की गई है। इस बार 3 से 4 कंपनियों ने इसमें अपनी रुचि दिखाई है। हमारी तैयारी है कि जल्द ही एजेंसी फाइनल कर यहां संचालन शुरू करवा दिया जाए।