
अध्यक्ष के ज्ञापन को लेकर पूर्व पदाधिकारियों और सदस्यों में नाराजगी, सचिव-कोषाध्यक्ष ने भी मांगे प्रस्ताव और बैठक के दस्तावेज..


बिलासपुर। डिजिटल पत्रकारिता में काम करने वाले पत्रकारों के लिए प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कम से कम पांच वर्ष का अनुभव अनिवार्य करने की मांग अब बिलासपुर प्रेस क्लब के भीतर विवाद का विषय बन गई है। प्रेस क्लब अध्यक्ष अजीत मिश्रा की ओर से प्रशासन को सौंपे गए ज्ञापन को लेकर क्लब के पूर्व पदाधिकारियों, सदस्यों और पत्रकारों ने सवाल खड़े किए हैं। विरोध करने वालों का कहना है कि डिजिटल पत्रकारों के लिए अनुभव की अनिवार्यता की मांग पूरे प्रेस क्लब का आधिकारिक निर्णय है या किसी पदाधिकारी का व्यक्तिगत विचार, यह स्पष्ट होना चाहिए।
मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया, जब प्रेस क्लब के सचिव संदीप करिहार और कोषाध्यक्ष ने भी इस मांग के संबंध में निर्णय प्रक्रिया पर आश्चर्य व्यक्त किया। सचिव और कोषाध्यक्ष की ओर से मुख्यमंत्री, गृह मंत्री तथा पुलिस महानिरीक्षक, बिलासपुर रेंज को संबोधित ज्ञापन में प्रस्ताव, कार्यकारिणी की बैठक और सामान्य सभा की कार्यवाही के अभिलेखों की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है।
इस विवाद ने अब केवल डिजिटल पत्रकारिता के लिए पांच वर्ष के अनुभव की शर्त तक सीमित न रहकर प्रेस क्लब की कार्यप्रणाली, निर्णय लेने की प्रक्रिया और संस्था के नाम पर प्रशासन को ज्ञापन सौंपने के अधिकार जैसे सवालों को भी सामने ला दिया है।
प्रेस क्लब का निर्णय या पदाधिकारी की व्यक्तिगत मांग?
बिलासपुर प्रेस क्लब में उठे विवाद का सबसे अहम पहलू यह है कि डिजिटल पत्रकारों के लिए पांच वर्ष के अनुभव की अनिवार्यता की मांग किस आधार पर की गई। विरोध करने वाले पत्रकारों का सवाल है कि क्या इस विषय पर क्लब की कार्यकारिणी में चर्चा हुई थी? क्या सामान्य सभा में सदस्यों की राय ली गई थी? क्या इस संबंध में कोई प्रस्ताव पारित किया गया था?
यदि यह प्रेस क्लब का आधिकारिक निर्णय है, तो उससे संबंधित प्रस्ताव और बैठक की कार्यवाही सामने आनी चाहिए। वहीं, यदि इस विषय पर संस्था की ओर से कोई विधिवत निर्णय नहीं लिया गया है, तो अध्यक्ष की ओर से सौंपे गए ज्ञापन को पूरे प्रेस क्लब की सामूहिक राय के रूप में प्रस्तुत किए जाने पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पूर्व अध्यक्ष, पूर्व सचिव, पूर्व उपाध्यक्ष, पूर्व सह सचिव, पूर्व कार्यकारिणी सदस्यों सहित बड़ी संख्या में पत्रकारों और क्लब सदस्यों ने इस मांग का विरोध जताया है। उनका कहना है कि किसी भी संस्था की ओर से महत्वपूर्ण विषय पर राय रखने के लिए निर्धारित प्रक्रिया और सदस्यों की सहमति का सम्मान किया जाना चाहिए।
डिजिटल पत्रकारिता को अनुभव की कसौटी पर बांधने की मांग क्यों?
डिजिटल मीडिया आज समाचारों के प्रसार का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। स्थानीय स्तर पर होने वाली घटनाओं, जनसमस्याओं, सरकारी योजनाओं, प्रशासनिक कार्यप्रणाली और आम लोगों की परेशानियों को सामने लाने में डिजिटल पत्रकारों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
कई पत्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से जनहित के मुद्दे उठाते हैं। ऐसे में डिजिटल पत्रकारिता में प्रवेश के लिए प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पांच वर्ष का अनुभव अनिवार्य करने की मांग को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
विरोध करने वाले पत्रकारों का कहना है कि पत्रकारिता की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और जवाबदेही महत्वपूर्ण विषय हैं, लेकिन इनका समाधान किसी एक अनुभव संबंधी शर्त से ही संभव है, यह जरूरी नहीं। पत्रकारिता के क्षेत्र में नए लोगों के प्रवेश और उनकी संभावनाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
उनका तर्क है कि डिजिटल मीडिया की प्रकृति प्रिंट और पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से अलग है। ऐसे में किसी एक माध्यम में काम करने के अनुभव को दूसरे माध्यम में प्रवेश की अनिवार्य शर्त बनाने से पहले व्यापक चर्चा और सभी पक्षों की राय आवश्यक है।
गलत गतिविधियों पर कार्रवाई का समर्थन, लेकिन सभी पत्रकारों को एक नजर से क्यों?
डिजिटल पत्रकारिता के नाम पर कथित अवैध वसूली, ब्लैकमेलिंग, धमकी या भ्रामक खबरें प्रसारित करने जैसी गतिविधियों को लेकर भी विवाद के बीच चर्चा हो रही है। पत्रकारों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता की आड़ में गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल है, तो उसके खिलाफ शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन कुछ व्यक्तियों के कथित कृत्यों के आधार पर पूरे डिजिटल मीडिया क्षेत्र के पत्रकारों के लिए पांच वर्ष के अनुभव की अनिवार्यता की मांग करना उचित नहीं माना जा सकता।
पत्रकारिता के नाम पर गलत गतिविधियों और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना जरूरी है। किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत होने पर उसकी जांच संबंधित तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए। वहीं, जनहित के मुद्दे उठाने वाले पत्रकारों को किसी व्यापक या अस्पष्ट मानक के आधार पर संदेह के दायरे में रखना भी उचित नहीं होगा।
विरोध करने वालों का कहना है कि पत्रकारिता में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए नियमों और कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर नए पत्रकारों के अवसर सीमित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
सचिव और कोषाध्यक्ष के सवाल से बढ़ी चर्चा..
इस पूरे मामले में प्रेस क्लब के सचिव संदीप करिहार और कोषाध्यक्ष की ओर से उठाए गए सवाल महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। दोनों की ओर से संबंधित ज्ञापन में यह मांग की गई है कि पांच वर्ष के अनुभव की अनिवार्यता से जुड़े प्रस्ताव और निर्णय की वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए।
ज्ञापन में कार्यकारिणी की बैठक, सामान्य सभा की कार्यवाही तथा संबंधित अभिलेखों की जांच का आग्रह किया गया है। साथ ही, इस विषय पर पुनर्विचार करते हुए डिजिटल पत्रकारिता से जुड़े विभिन्न पक्षों के विचार सुनने की मांग भी की गई है।
इससे प्रेस क्लब के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सवाल यह है कि यदि संस्था के नाम पर प्रशासन को कोई महत्वपूर्ण मांग भेजी जाती है, तो क्या उसके पीछे सदस्यों की सहमति और विधिवत अनुमोदन होना चाहिए? पत्रकारों का कहना है कि किसी भी संस्था की विश्वसनीयता उसकी पारदर्शी कार्यप्रणाली से ही कायम रहती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के अवसरों का सवाल..
डिजिटल पत्रकारों के लिए पांच वर्ष के अनुभव की शर्त की मांग को लेकर विरोध करने वाले पत्रकारों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के अवसरों का मुद्दा भी उठाया है। उनका कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण महत्वपूर्ण है।
हालांकि, पत्रकारिता से संबंधित किसी भी पात्रता या नियमन का प्रश्न लागू कानूनों और संबंधित नियमों के दायरे में ही तय किया जाना चाहिए। केवल किसी संस्था के ज्ञापन के आधार पर किसी व्यापक वर्ग के लिए नई पात्रता शर्त लागू हो जाना स्वतः संभव नहीं है।
इसलिए विरोध करने वालों का कहना है कि डिजिटल पत्रकारिता के भविष्य से जुड़े इस विषय पर निर्णय लेने से पहले पत्रकारों, डिजिटल मीडिया संगठनों और संबंधित पक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए।
अब सामने आएं प्रस्ताव और बैठक के अभिलेख..
प्रेस क्लब के भीतर उठे विवाद के बीच अब सबसे महत्वपूर्ण मांग संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करने की है। यदि पांच वर्ष के अनुभव की अनिवार्यता को लेकर कोई प्रस्ताव पारित हुआ है, तो उसकी प्रति और बैठक की कार्यवाही सामने लाई जानी चाहिए। यदि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है, तो यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि ज्ञापन किस अधिकार और किस निर्णय के आधार पर सौंपा गया।
सचिव और कोषाध्यक्ष की ओर से शासन-प्रशासन से संबंधित अभिलेखों की जांच और निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की गई है। साथ ही यह भी आग्रह किया गया है कि किसी जांच या कार्रवाई का इस्तेमाल जनहित के मुद्दे उठाने वाले पत्रकारों पर अनुचित दबाव बनाने के लिए नहीं होना चाहिए।
फिलहाल, इस विवाद में प्रेस क्लब की ओर से विधिवत पारित सामूहिक प्रस्ताव की पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में संबंधित अभिलेखों और पक्षों के स्पष्टीकरण के आधार पर ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
बिलासपुर प्रेस क्लब में उठे इस विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है- क्या किसी संस्था के नाम पर रखी गई मांग वास्तव में संस्था की सामूहिक आवाज है, या फिर उसके पीछे सदस्यों की सहमति और निर्धारित प्रक्रिया का होना भी उतना ही जरूरी है?
डिजिटल पत्रकारिता के लिए पांच वर्ष के अनुभव की अनिवार्यता की मांग पर अब प्रेस क्लब की आधिकारिक प्रतिक्रिया, संबंधित दस्तावेज और शासन-प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।








