छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का वनरक्षकों के पक्ष में बड़ा फैसला, 2014 के सर्कुलर का क्लॉज-5 निरस्त; 90 दिन में नए सिरे से तय करनी होगी वरिष्ठता..

बिलासपुर। प्रशासनिक तबादले के कारण किसी कर्मचारी को उसकी भर्ती के समय हासिल वरिष्ठता से वंचित नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वन विभाग के वनरक्षकों की वरिष्ठता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में यह स्पष्ट फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारी की नियुक्ति सीधी भर्ती के माध्यम से हुई हो और बाद में प्रशासनिक आधार पर उसका एक वनवृत्त से दूसरे वनवृत्त में तबादला किया गया हो, तो केवल तबादले के आधार पर उसकी मूल वरिष्ठता समाप्त नहीं की जा सकती।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिविजन बेंच ने वन विभाग द्वारा जारी 31 जुलाई 2014 के सर्कुलर के क्लॉज-5 को इस सीमा तक मनमाना और वैधानिक नियमों के विपरीत माना है। कोर्ट ने इस प्रावधान को निरस्त करते हुए विभाग को संबंधित वनरक्षकों की वरिष्ठता पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है।
भर्ती के समय मिली वरिष्ठता तबादले के बाद हो गई थी खत्म..
यह मामला उन वनरक्षकों से जुड़ा है, जिनकी नियुक्ति 5 जनवरी 2013 को छत्तीसगढ़ क्लास-III फॉरेस्ट सर्विस रिक्रूटमेंट रूल्स, 2012 के तहत हुई थी। इन कर्मचारियों की नियुक्ति सीधी भर्ती के जरिए हुई थी और उनकी प्रारंभिक पोस्टिंग गरियाबंद वनमंडल में की गई थी।
बाद में प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर इनमें से कुछ वनरक्षकों का तबादला बिलासपुर, मुंगेली और कोरबा सहित दूसरे वनवृत्तों में कर दिया गया। तबादले के बाद विभाग ने नए वनवृत्त की वरिष्ठता सूची में उन्हें नीचे कर दिया। इससे उनकी पदोन्नति और दूसरे सेवा लाभों पर भी असर पड़ने की स्थिति बन गई।
1 सितंबर 2025 की ग्रेडेशन लिस्ट में कुछ कर्मचारियों के नाम के सामने ‘अन्य वृत्त से स्थानांतरण’ का उल्लेख किया गया और उन्हें संबंधित वनवृत्त में पहले से मौजूद कर्मचारियों के नीचे रखा गया।
कर्मचारियों ने कहा- प्रशासनिक आदेश का पालन करने की मिली सजा..
वरिष्ठता सूची में नीचे किए जाने के बाद कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका तर्क था कि उनकी नियुक्ति सीधी भर्ती से हुई है और भर्ती के समय उनकी मेरिट तथा प्राप्त अंकों का सक्षम अधिकारी द्वारा सत्यापन किया जा चुका था। इसलिए बाद में विभाग द्वारा प्रशासनिक आधार पर किए गए तबादले के कारण उनकी भर्ती के समय हासिल वरिष्ठता समाप्त नहीं की जा सकती।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि तबादला उनका स्वयं का विकल्प नहीं था। विभागीय आदेश का पालन करते हुए उन्होंने नए वनवृत्त में कार्यभार संभाला। ऐसे में प्रशासनिक आदेश के कारण उन्हें वरिष्ठता में पीछे करना उचित नहीं है।
विभाग ने 2014 के सर्कुलर को बनाया आधार..
दूसरी ओर वन विभाग की ओर से 31 जुलाई 2014 के सर्कुलर के क्लॉज-5 का हवाला दिया गया। विभाग का तर्क था कि एक वनवृत्त से दूसरे वनवृत्त में स्थानांतरण होने पर कर्मचारी की वरिष्ठता नए वनवृत्त में पहले से कार्यरत सीधी भर्ती और पदोन्नत कर्मचारियों के नीचे तय की जानी चाहिए।
इसी प्रावधान के आधार पर संबंधित वनरक्षकों को नई वरिष्ठता सूची में नीचे रखा गया था। हालांकि हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को चुनौती के दायरे में परखा और माना कि इसे उन कर्मचारियों पर इस तरह लागू नहीं किया जा सकता, जिनकी मूल नियुक्ति सीधी भर्ती के जरिए हुई थी और जिन्हें बाद में प्रशासनिक आधार पर स्थानांतरित किया गया।
वरिष्ठता केवल सूची में नाम नहीं, सेवा का महत्वपूर्ण अधिकार..
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में वरिष्ठता के महत्व को भी रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठता कर्मचारी का महत्वपूर्ण सेवा अधिकार है। इसका सीधा असर पदोन्नति सहित कई अन्य सेवा लाभों पर पड़ता है।
कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि प्रशासनिक या जनहित में किया गया तबादला कर्मचारी का स्वैच्छिक निर्णय नहीं होता। यदि कर्मचारी विभागीय आदेश का पालन करते हुए दूसरे स्थान पर जाता है, तो केवल इस कारण उसकी पहले से अर्जित वरिष्ठता समाप्त करना उचित नहीं है।
नियम 12(2)(बी) का भी किया गया उल्लेख..
कोर्ट ने 1961 के नियमों के नियम 12(2)(बी) की भी व्याख्या की। कोर्ट ने माना कि यह प्रावधान उन परिस्थितियों में लागू होता है, जहां स्थानांतरण स्वयं भर्ती का माध्यम होता है। लेकिन इस मामले में वनरक्षकों की नियुक्ति स्थानांतरण के आधार पर नहीं, बल्कि सीधी भर्ती के माध्यम से हुई थी। इसलिए बाद में प्रशासनिक आधार पर हुए तबादले को उनकी मूल नियुक्ति और वरिष्ठता को प्रभावित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
90 दिन में नए सिरे से तय करनी होगी वरिष्ठता..
हाईकोर्ट ने विभाग को स्पष्ट निर्देश दिया है कि संबंधित याचिकाकर्ताओं की वरिष्ठता के दावे पर नए सिरे से विचार किया जाए। वरिष्ठता तय करते समय 31 जुलाई 2014 के सर्कुलर के क्लॉज-5 को आधार नहीं बनाया जाएगा।
विभाग को भर्ती के समय प्राप्त मूल मेरिट, प्राप्त अंकों और लागू वैधानिक नियमों के आधार पर वरिष्ठता निर्धारित करनी होगी। कोर्ट ने यह पूरी प्रक्रिया प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही 25 सितंबर 2025 को याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदन खारिज किए जाने की कार्रवाई को भी हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है।
दूसरे कर्मचारियों की वरिष्ठता पर तत्काल असर नहीं..
फैसले में हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस आदेश का असर वर्तमान वरिष्ठता सूची में शामिल उन कर्मचारियों की वरिष्ठता पर स्वतः नहीं पड़ेगा, जो इन याचिकाओं में पक्षकार नहीं हैं। यदि आगे की कार्रवाई में ऐसे कर्मचारियों की वरिष्ठता प्रभावित होने की स्थिति बनती है, तो उन्हें उचित अवसर देकर उनकी बात सुनी जाएगी। इसके बाद ही विभाग आवश्यक कार्रवाई कर सकेगा।
प्रशासनिक तबादले के मामलों के लिए भी अहम संदेश..
हाईकोर्ट का यह फैसला केवल संबंधित वनरक्षकों की वरिष्ठता के विवाद तक सीमित महत्व नहीं रखता, बल्कि प्रशासनिक आधार पर स्थानांतरित किए जाने वाले कर्मचारियों के सेवा अधिकारों को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फैसले से साफ है कि विभागीय आदेश पर किए गए तबादले को कर्मचारी की अपनी पसंद मानकर उसकी पहले से अर्जित वरिष्ठता खत्म नहीं की जा सकती।
अब वन विभाग को संबंधित वनरक्षकों की वरिष्ठता का रिकॉर्ड दोबारा खंगालना होगा और भर्ती के समय उनकी वास्तविक मेरिट के आधार पर नई स्थिति तय करनी होगी। इस प्रक्रिया के बाद वरिष्ठता सूची में उनकी स्थिति में बदलाव की संभावना है, जिसका सीधा असर आगे की पदोन्नति और अन्य सेवा लाभों पर पड़ सकता है।







