
ISRO की सैटेलाइट तस्वीरों में वन आवरण घटने के संकेत, 22 सितंबर के निरीक्षण में 1100 से अधिक पेड़ों की गर्डलिंग और कटे ठूंठ मिले..

विस्थापित करका गांव से जुड़े लोगों पर दोबारा वनभूमि कब्जाने के आरोप, जांच के लिए ड्रोन मैपिंग और डिजिटल साक्ष्य जुटा रहा USTR..
65 प्रतिशत मैदानी अमले की कमी और पांच गंभीर हमलों के बावजूद पिछले चार वर्षों में 1050 हेक्टेयर अतिक्रमित वनभूमि मुक्त कराने का विभाग का दावा..
गरियाबंद। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) के जंगलों में अतिक्रमण और वन विनाश का एक गंभीर मामला सामने आया है। टाइगर रिजर्व के करका क्षेत्र में लगभग 35 हेक्टेयर वनभूमि पर अतिक्रमण किए जाने की जानकारी सामने आने के बाद वन विभाग ने कार्रवाई तेज कर दी है। विभाग के प्रारंभिक आकलन में वर्ष 2016-17 के दौरान लगभग 30 हजार पेड़-पौधों की कटाई का अनुमान लगाया गया है। वहीं, 22 सितंबर को किए गए मैदानी निरीक्षण में 1100 से अधिक पेड़ों पर गर्डलिंग और बड़ी संख्या में ताजे कटे पेड़ों के ठूंठ मिलने की बात कही गई है।


यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रभावित क्षेत्र वन्यजीवों के आवास और हाथियों के आवागमन के लिए अहम माना जाता है। वन विभाग का कहना है कि जंगलों को कृषि भूमि में बदलने से वन्यजीवों के पारंपरिक रास्ते प्रभावित हो सकते हैं। इससे आसपास के गांवों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका भी बढ़ सकती है।


वन विभाग अब इस पूरे क्षेत्र की GPS और DGPS आधारित मैपिंग करा रहा है। ड्रोन से प्राप्त तस्वीरों, ISRO की सैटेलाइट इमेजरी और मैदानी निरीक्षण के आधार पर अतिक्रमण की वास्तविक सीमा तथा वन आवरण में हुए बदलाव का आकलन किया जा रहा है।
बांध निर्माण के बाद विस्थापित हुआ था करका गांव..
विभागीय अभिलेखों के अनुसार, करका पहले एक वन ग्राम था। यह गांव सोंढूर बांध के कैचमेंट क्षेत्र में तत्कालीन सीतानदी अभयारण्य के अंतर्गत स्थित था। सोंढूर बांध के निर्माण के बाद वर्ष 1980 के दशक में गांव का विस्थापन किया गया था।
वन विभाग के मुताबिक, उपलब्ध अभिलेखों में करका गांव के 55 व्यक्तियों को जल संसाधन विभाग की ओर से मुआवजा दिए जाने का उल्लेख है। इसके बावजूद अब इसी क्षेत्र की ऊंचाई पर स्थित वनभूमि में दोबारा अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई की गतिविधियां सामने आने की बात कही जा रही है।
विभाग इस बात की भी जांच कर रहा है कि क्या अतिक्रमण के आरोपों से जुड़े कुछ व्यक्तियों को पहले ही अन्य स्थानों पर वनाधिकार के तहत भूमि आवंटित की जा चुकी थी। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, कुछ व्यक्तियों को वर्ष 2015-16 में वनाधिकार भूमि मिलने के अभिलेख सामने आए हैं। हालांकि, इस संबंध में विस्तृत जांच अभी जारी है।
2016 में दर्ज हुआ था वन अपराध का मामला..
करका क्षेत्र में अतिक्रमण का मामला पहले भी वन विभाग के संज्ञान में आ चुका है। वर्ष 2016 में POR क्रमांक 7922 के तहत तत्कालीन करका गांव से संबंधित 22 व्यक्तियों के विरुद्ध लगभग 22 हेक्टेयर घने वन क्षेत्र में कथित अतिक्रमण को लेकर वन अपराध प्रकरण दर्ज किया गया था।
बाद में वर्ष 2023 में नगरी न्यायालय ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। वन विभाग का कहना है कि इसके बाद भी क्षेत्र के कुछ हिस्सों में अतिक्रमण जारी रहने और उसके विस्तार की जानकारी सामने आई है। विभाग के अनुसार, यह इलाका हाल के वर्षों तक नक्सल प्रभावित क्षेत्र भी रहा है। ऐसे में वनभूमि की निगरानी और संरक्षण की चुनौती बनी हुई थी।
सैटेलाइट तस्वीरों में दिखा जंगल के स्वरूप में बदलाव..
वन विभाग ने करका क्षेत्र में वन आवरण की ऐतिहासिक स्थिति का आकलन करने के लिए ISRO की सैटेलाइट इमेजरी का अध्ययन किया है। विभागीय जानकारी के अनुसार, वर्ष 2006 और 2012 की सैटेलाइट तस्वीरों में क्षेत्र में घने वन की स्थिति दिखाई देती है। इसके बाद वर्ष 2017 के आसपास से वन आवरण में बदलाव और घने जंगल के कुछ हिस्सों के खुले क्षेत्र में परिवर्तित होने के संकेत मिले हैं। बाद की तस्वीरों में भी वन आवरण में कमी के संकेत दिखाई देने की बात कही गई है।
इन तस्वीरों और मैदानी सत्यापन के आधार पर वन विभाग का प्रारंभिक अनुमान है कि वर्ष 2016 से 2017 के बीच लगभग 30 हजार पेड़-पौधे काटे गए होंगे। यह आंकड़ा फिलहाल विभाग का प्रारंभिक आकलन है। वन विनाश की वास्तविक स्थिति और उसकी सीमा का अंतिम निर्धारण विस्तृत जांच तथा तकनीकी मैपिंग के बाद किया जाएगा। वर्तमान GPS आधारित आकलन में अतिक्रमित क्षेत्र लगभग 35 हेक्टेयर पाया गया है। DGPS आधारित ड्रोन मैपिंग पूरी होने के बाद इसकी अंतिम सीमा निर्धारित की जाएगी।
निरीक्षण के दौरान वन विभाग की टीम को रोकने का आरोप..
22 सितंबर को उप संचालक USTR के नेतृत्व में लगभग 20 से 25 वन अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम करका क्षेत्र में निरीक्षण कर रही थी। टीम में महिला वन अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल थीं। वन विभाग के अनुसार, निरीक्षण के दौरान करका निवासी मुकेश मरकाम, पिता हेमलाल मरकाम से कथित रूप से अतिक्रमित वनभूमि पर की जा रही कृषि गतिविधियों के संबंध में पूछताछ की गई।

विभाग की ओर से दर्ज प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, मुकेश मरकाम ने कथित तौर पर बताया कि वह अतिक्रमित क्षेत्र में उगाई जा रही फसलों की रखवाली करता है। उसके द्वारा आसपास के एक अन्य वन क्षेत्र में भी जमीन पर कब्जा किए जाने की जानकारी सामने आने की बात कही गई है।
वन विभाग का आरोप है कि जब टीम संबंधित भूमि की ओर आगे बढ़ी, तब करका गांव के लगभग 50 से 60 लोगों ने अधिकारियों और कर्मचारियों को उनके शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन से रोकने का प्रयास किया। विभाग ने यह भी आरोप लगाया है कि इस दौरान मुकेश मरकाम को मौके से फरार होने में मदद की गई।
देखें वीडियो..
घटना की वीडियोग्राफी किए जाने की बात भी विभाग ने कही है। वीडियो रिकॉर्डिंग को संबंधित व्यक्तियों की पहचान और आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए सुरक्षित रखा गया है। वन विभाग द्वारा वीडियो साक्ष्य पेन ड्राइव में संलग्न कर थाना खल्लारी में FIR दर्ज करने के लिए लिखित आवेदन प्रस्तुत किया जा रहा है।
नया POR दर्ज, अन्य लोगों की भूमिका की जांच..
वन विभाग के अनुसार, उप संचालक USTR के हस्तक्षेप के बाद 23 सितंबर 2026 को POR क्रमांक 20/17 दर्ज किया गया है। इसमें मुकेश मरकाम, केशनाथ उर्फ गोलू और अन्य के विरुद्ध कथित वन अपराध के संबंध में कार्रवाई शुरू की गई है। विभाग अब मामले से जुड़े अन्य व्यक्तियों की भूमिका, अतिक्रमित भूमि की वास्तविक सीमा और वन विनाश की स्थिति की जांच कर रहा है।
अधिकारियों के अनुसार, GPS और DGPS कोऑर्डिनेट्स, ड्रोन इमेजरी, सैटेलाइट तस्वीरें, मैदानी फोटोग्राफ, स्वतंत्र गवाहों के बयान और दस्तावेजी रिकॉर्ड जुटाए जा रहे हैं। इन साक्ष्यों का उपयोग जांच तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयीन कार्यवाही में किया जाएगा।
जंगल उजड़ने से हाथियों के रास्ते प्रभावित होने की आशंका..
करका क्षेत्र में सामने आया अतिक्रमण केवल वनभूमि पर कब्जे तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र वन्यजीवों के आवास और हाथियों के आवागमन के लिए महत्वपूर्ण वन परिदृश्य का हिस्सा है। वन विभाग का कहना है कि पेड़ों की कटाई, गर्डलिंग और वनभूमि को खेती में बदलने से जंगलों का प्राकृतिक स्वरूप प्रभावित होता है। इससे वन्यजीवों के आवास छोटे-छोटे हिस्सों में बंट सकते हैं और उनके पारंपरिक आवागमन मार्गों में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
ऐसी स्थिति में हाथियों सहित अन्य वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित होने और भोजन-पानी की तलाश में उनके आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आने की आशंका बढ़ सकती है। इससे ग्रामीणों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा होने का खतरा रहता है। USTR प्रशासन का कहना है कि वन आवास को और अधिक नुकसान से बचाना तथा हाथियों के आवागमन वाले क्षेत्रों को सुरक्षित रखना दीर्घकालिक संरक्षण की दृष्टि से आवश्यक है।
चार वर्षों में 1050 हेक्टेयर वनभूमि मुक्त कराने का दावा..
करका क्षेत्र में चल रही कार्रवाई को वन विभाग ने अतिक्रमण के विरुद्ध जारी व्यापक अभियान का हिस्सा बताया है। USTR प्रशासन के अनुसार, पिछले चार वर्षों में लगभग 1050 हेक्टेयर अतिक्रमित वनभूमि को मुक्त कराया गया है। इस अभियान में पारंपरिक मैदानी कार्रवाई के साथ आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक साक्ष्यों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके तहत ड्रोन आधारित निगरानी और मैपिंग, ISRO की सैटेलाइट इमेजरी से ऐतिहासिक वन आवरण का विश्लेषण, GPS/DGPS आधारित मैदानी सत्यापन, डिजिटल साक्ष्यों का संकलन तथा संबंधित वन एवं वन्यजीव कानूनों के तहत कार्रवाई की जा रही है।
देखें वीडियो..
विभाग का कहना है कि अतिक्रमण हटाने के बाद भी संबंधित क्षेत्रों की निगरानी की जा रही है, ताकि दोबारा कब्जे की स्थिति न बने। वन अपराधों की जांच में स्थान और समय से जुड़े तकनीकी साक्ष्यों को भी महत्व दिया जा रहा है।
65 प्रतिशत मैदानी पद रिक्त, फिर भी संरक्षण अभियान जारी..
USTR प्रशासन के सामने वन संरक्षण के दौरान मानव संसाधन की कमी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। विभागीय जानकारी के अनुसार, रिजर्व में लगभग 65 प्रतिशत मैदानी कर्मचारियों के पद रिक्त हैं। इसके कारण उपलब्ध फ्रंटलाइन कर्मचारियों पर काम का दबाव बढ़ा हुआ है। इसके अलावा, विभाग ने पिछले चार वर्षों में वन एवं वन्यजीव संरक्षण कार्य में लगी टीमों पर पांच गंभीर हमले होने की जानकारी भी दी है।
इन चुनौतियों के बावजूद वन विभाग का कहना है कि संरक्षित क्षेत्र के जंगलों, वन्यजीवों के आवास और वनभूमि की सुरक्षा के लिए अभियान जारी रहेगा। विभाग ने स्पष्ट किया है कि अतिक्रमण और वन विनाश के मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
अब करका क्षेत्र में आगे की कार्रवाई का आधार DGPS ड्रोन मैपिंग, मैदानी सत्यापन और एकत्र किए जा रहे डिजिटल साक्ष्य होंगे। इससे अतिक्रमण की वास्तविक सीमा, वन विनाश की स्थिति और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।







