बिलासपुर। सिस्टम की लेटलतीफी और अदालती आदेशों की अनदेखी का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने जिस 100% महिला आरक्षण को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया था, राज्य का स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सा शिक्षा संचालनालय (DME) तीन साल बाद भी उसे लागू नहीं कर सका। अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद नियमित भर्ती को ठंडे बस्ते में डालकर अब संविदा भर्ती का नया ‘शॉर्टकट’ खेल शुरू कर दिया गया है।

अधिकारियों की इसी मनमानी पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने अब स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया और पीएससी (PSC) सचिव डी. राहुल वेंकट को अवमानना (Contempt of Court) का नोटिस थमा दिया है।
पढ़ाई साथ-साथ, तो नौकरी में भेदभाव क्यों?
दैनिक भास्कर की लीगल डेस्क के अनुसार, इस पूरे विवाद की जड़ 8 दिसंबर 2021 में छपी है। तब छग पीएससी ने सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में डिमॉन्स्ट्रेटर और असिस्टेंट प्रोफेसर पदों पर सीधी भर्ती निकाली थी। इसमें नियम-5 का हवाला देकर यह शर्त थोप दी गई कि इन पदों पर सिर्फ महिलाएं ही आवेदन कर सकेंगी।
इसके खिलाफ अभय कुमार किस्पोट्टा, डॉ.अजय त्रिपाठी सहित अन्य पुरुष अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका तर्क बेहद सीधा और तार्किक था – जब राज्य के नर्सिंग कॉलेजों में बीएससी और एमएससी नर्सिंग की पढ़ाई में पुरुषों के लिए दरवाजे खुले हैं, वे वहां से डिग्री ले रहे हैं, तो अध्यापन (टीचिंग) के पदों पर उनके लिए ‘नो-एंट्री’ का बोर्ड क्यों लगाया जा रहा है? यह सीधे तौर पर समानता के मौलिक अधिकार का हनन है।
सरकार की दलील और कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला..
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 15(3) (महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान) की आड़ लेकर दलील दी थी कि अस्पतालों में मरीजों की देखभाल मूलतः महिलाएं करती हैं। लेकिन हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने 100% महिला आरक्षण को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित करते हुए आदेश दिया कि भर्ती प्रक्रिया में पुरुष अभ्यर्थियों को भी समान रूप से शामिल किया जाए।
फाइलें दबाईं और ले आए संविदा का नया खेल..
कोर्ट का आदेश आते ही पीएससी ने तो फुर्ती दिखाई, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की सुस्ती ने पूरी प्रक्रिया रोक दी। फैसले के 6 दिन बाद ही (15 मार्च 2023 को) पीएससी ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर संशोधित मांग पत्र और नए नियम भेजने को कहा। अभ्यर्थियों ने भी 1 जून 2023 को गुहार लगाई। लेकिन फाइलें बाबुओं की मेज पर ही धूल खाती रहीं।
हैरानी की बात यह है कि तीन साल तक कोई भी संशोधित विज्ञापन जारी नहीं हुआ। हद तो तब हो गई जब 22 जून 2026 को चिकित्सा शिक्षा आयुक्त ने नियमित भर्ती की फाइल दबाकर इन्हीं पदों पर ‘संविदा भर्ती’ का नया विज्ञापन निकाल दिया।
अब अफसरों को देना होगा जवाब..
कोर्ट के आदेश को ताक पर रखकर संविदा भर्ती निकालने के इसी कदम ने अवमानना याचिका की नींव रखी। अब हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ा संज्ञान लेते हुए शीर्ष अधिकारियों से जवाब तलब किया है। 5 सप्ताह बाद होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या प्रदेश में प्रशासनिक सिस्टम अदालत के आदेशों से ऊपर हो गया है, या फिर अधिकारियों को उनकी इस घोर लापरवाही की कानूनी कीमत चुकानी पड़ेगी।







