

बिलासपुर। अगर कोई सरकारी महकमा अपनी लेटलतीफी या लालफीताशाही के कारण किसी कर्मचारी को समय पर प्रमोशन नहीं देता है, तो बाद में ‘नो वर्क नो पे’ यानी ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ का बहाना बनाकर उस कर्मचारी को एरियर या वेतन के बकाए से वंचित नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नौकरशाही की इस मनमानी पर कड़ा प्रहार करते हुए एक बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि ‘नो वर्क नो पे’ का सिद्धांत कोई ऐसा सार्वभौमिक नियम नहीं है जिसे हर मामले में आंख मूंदकर लागू कर दिया जाए। यदि नियोक्ता (सरकार) खुद ही किसी कर्मचारी को उसके उच्च पद के दायित्वों का निर्वहन करने से रोकता है, तो इसके लिए उस कर्मचारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
क्या है पूरा मामला और कैसे सिस्टम की भेंट चढ़ा एक कर्मचारी..
यह पूरा मामला आदिवासी कल्याण विभाग के रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर जीआर साहू की लंबी कानूनी लड़ाई से जुड़ा है। एक आम सरकारी कर्मचारी की तरह साहू भी विभागीय सिस्टम की अनदेखी का शिकार हुए थे। 1 अप्रैल 2008 को जारी ग्रेडेशन लिस्ट में साहू अपने जूनियर अधिकारियों (जितेंद्र गुप्ता और ए नवरंग) से वरिष्ठता क्रम में ऊपर थे। लेकिन जब 13 जुलाई 2011 को डिप्टी कमिश्नर पद पर प्रमोशन की बारी आई, तो उनके जूनियर अधिकारियों को प्रमोट कर दिया गया और साहू की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर दिया गया।
साहू ने हार नहीं मानी और सिस्टम से लड़ते रहे। उन्होंने अपने हक के लिए विभाग से लेकर राज्य लोक सेवा आयोग (पीएससी) तक अनगिनत अभ्यावेदन दिए। पीएससी ने साल 2015 में उन्हें प्रमोशन के योग्य भी माना, लेकिन विभागीय अधिकारी कुंभकर्णी नींद सोते रहे। जब कोई रास्ता नहीं बचा, तो साहू ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट की फटकार के बाद अधिकारियों की टूटी नींद..
अदालत के सख्त निर्देश और अवमानना याचिका दायर होने के बाद ही विभागीय अधिकारियों को होश आया। लेकिन इस लेटलतीफी में बहुत देर हो चुकी थी और साहू 31 दिसंबर 2016 को रिटायर हो गए। अपनी भारी चूक को छिपाने के लिए राज्य सरकार ने साल 2019 में उन्हें 13 जुलाई 2011 से बैकडेट में ‘काल्पनिक प्रमोशन’ तो दे दिया, लेकिन ‘नो वर्क नो पे’ का नियम थोपते हुए आर्थिक लाभ (एरियर) देने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद साहू ने अधिवक्ता श्रेया जायसवाल के माध्यम से हाईकोर्ट में एक और याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी : गलती अधिकारियों की, तो नुकसान कर्मचारी क्यों सहे?
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रतिवादियों (विभाग) की गलती के कारण याचिकाकर्ता प्रमोशन के लाभ से वंचित रहा। जब आपने खुद ही उन्हें काम नहीं करने दिया, तो ‘बिना वेतन के काम नहीं’ का सिद्धांत उन पर कैसे लागू हो सकता है? कोर्ट ने माना कि यह सरासर अधिकारियों की चूक है।
फैसले का असर : क्या मिला याचिकाकर्ता को..
सार्वजनिक खजाने पर पड़ने वाले बोझ और अधिकारियों की चूक के बीच संतुलन बनाते हुए हाईकोर्ट ने एक न्यायसंगत आदेश पारित किया। न्यायालय ने निर्देश दिया है कि जीआर साहू को 13 जुलाई 2011 (जूनियर्स के प्रमोशन की तारीख) से लेकर 31 दिसंबर 2016 (सेवानिवृत्ति की तारीख) तक के लिए, असिस्टेंट कमिश्नर और डिप्टी कमिश्नर के वेतन के अंतर का 50 प्रतिशत हिस्सा एरियर के रूप में दिया जाए।
कोर्ट ने साफ किया है कि यह भुगतान आदेश की प्रति मिलने के चार महीने के भीतर करना होगा। यदि तय समयसीमा में राशि का भुगतान नहीं होता है, तो पूरी रकम पर 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज भी चुकाना होगा। हाईकोर्ट का यह फैसला उन तमाम कर्मचारियों के लिए एक बड़ी जीत है, जो सिस्टम की लापरवाही के कारण अपने जायज हकों से महरूम रह जाते हैं।



