विश्व हाथी दिवस पर संरक्षण के साथ सह-अस्तित्व पर जोर, गलियारों की सुरक्षा, तकनीक और ग्रामीणों की भागीदारी को बताया जरूरी..

रायपुर/बिलासपुर। हर साल 12 अगस्त को मनाया जाने वाला विश्व हाथी दिवस अब केवल हाथियों के संरक्षण तक सीमित नहीं रह गया है। बदलते पर्यावरण और बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष के बीच यह दिवस जंगल और इंसान के बीच संतुलित सह-अस्तित्व की जरूरत को सामने लाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों को केवल आबादी वाले क्षेत्रों से दूर खदेड़ना स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए उनके प्राकृतिक आवास और पारंपरिक आवागमन मार्गों को सुरक्षित करना, आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करना और स्थानीय ग्रामीणों को संरक्षण का भागीदार बनाना जरूरी है।
एमएससी फॉरेस्ट्री, वाइल्डलाइफ एंड एनवायरनमेंटल साइंस के विशेषज्ञ मुकेश अग्रवाल के अनुसार, हाथी केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि पूरे वन तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जंगल में हाथी बीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने, वनस्पतियों के पुनर्जनन और जैव-विविधता के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी कारण हाथी को ‘फॉरेस्ट इकोसिस्टम इंजीनियर’ भी कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ में चुनौती लगातार बढ़ रही..
छत्तीसगढ़ के सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर, जशपुर, कोरबा और रायगढ़ सहित उत्तर और उत्तर-पूर्वी वनांचल में हाथियों की लगातार आवाजाही होती है। लेमरू, तमोर पिंगला-बादलखोल और धरमजयगढ़ जैसे क्षेत्र हाथियों की मौजूदगी के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। इन इलाकों में जंगलों का दबाव, खेती और अन्य मानवीय गतिविधियों का विस्तार तथा हाथियों के पारंपरिक रास्तों में बाधाएं मानव-हाथी संघर्ष की बड़ी वजह बन रही हैं।
हाथियों के प्राकृतिक रास्तों पर सड़क, रेलवे लाइन, बिजली की लाइन और अन्य अधोसंरचना विकसित होने से उनके आवागमन में बाधा आती है। रास्ते बंद होने पर हाथी भोजन और पानी की तलाश में खेतों और गांवों की ओर पहुंचते हैं। इससे फसल और संपत्ति के नुकसान के साथ ग्रामीणों और हाथियों दोनों के लिए खतरा बढ़ जाता है।
हाथी कॉरिडोर बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता..
विशेषज्ञों के अनुसार मानव-हाथी संघर्ष को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग यानी एलिफेंट कॉरिडोर को सुरक्षित रखना है। हाथी लंबी दूरी तक भोजन और पानी की तलाश में चलते हैं। ऐसे में उनके रास्तों को समझकर विकास योजनाओं की रूपरेखा तैयार करना जरूरी है।
रेलवे, बिजली, सड़क निर्माण, वन विभाग और जिला प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय से संवेदनशील क्षेत्रों में दुर्घटनाओं को कम किया जा सकता है। रेलवे ट्रैक के आसपास निगरानी और गति नियंत्रण, असुरक्षित बिजली लाइनों को सुरक्षित करना तथा हाथियों के आवागमन वाले क्षेत्रों में विशेष सतर्कता जैसे उपाय प्रभावी हो सकते हैं।
तकनीक से समय रहते मिल सकती है चेतावनी..
हाथी संरक्षण में आधुनिक तकनीक अब महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। जीपीएस कॉलर से हाथियों की लोकेशन की निगरानी, ड्रोन से दुर्गम इलाकों की निगरानी, कैमरा ट्रैप से पहचान और गतिविधियों की रिकॉर्डिंग तथा जीआईएस के जरिए आवास और गलियारों की मैपिंग की जा सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण जरूरत अर्ली वार्निंग सिस्टम की है। यदि हाथियों के गांव की ओर बढ़ने की सूचना मोबाइल अलर्ट या अन्य माध्यम से ग्रामीणों तक समय पर पहुंच जाए तो लोग सुरक्षित स्थान पर जा सकते हैं और वन अमला भी तत्काल मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाल सकता है। आने वाले समय में डेटा और एआई आधारित तकनीक से हाथियों की आवाजाही के पैटर्न का विश्लेषण भी संघर्ष कम करने में मददगार हो सकता है।
‘6C मॉडल’ से मजबूत हो सकता है संरक्षण..
मुकेश अग्रवाल ने हाथी संरक्षण के लिए ‘6C मॉडल’ को प्रभावी रणनीति बताया है। इसमें कॉरिडोर, कम्युनिटी, कंपेनसेशन, कम्युनिकेशन, कंजर्वेशन और कोऑर्डिनेशन यानी गलियारे, समुदाय, मुआवजा, संचार, संरक्षण और समन्वय को प्रमुख आधार बनाया गया है।
इस मॉडल के तहत हाथियों के रास्तों की पहचान और सुरक्षा के साथ ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ाने, नुकसान की स्थिति में मुआवजा जल्द उपलब्ध कराने, समय पर चेतावनी देने और वन विभाग के साथ रेलवे, बिजली, कृषि तथा स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल पर जोर दिया गया है।
ग्रामीणों को दुश्मन नहीं, संरक्षण का साथी बनाना होगा..
मानव-हाथी संघर्ष वाले क्षेत्रों में स्थानीय ग्रामीण सबसे पहले हाथियों की मौजूदगी महसूस करते हैं। ऐसे में उन्हें संरक्षण व्यवस्था का सक्रिय हिस्सा बनाना जरूरी है। ग्रामीणों को हाथियों के व्यवहार, सुरक्षित दूरी, चेतावनी संकेतों और आपात स्थिति में अपनाए जाने वाले सुरक्षित उपायों की जानकारी दी जानी चाहिए।
फसल सुरक्षा के लिए सौर बाड़, मधुमक्खी बाड़ और आवश्यक स्थानों पर खाई जैसी व्यवस्थाओं पर भी काम किया जा सकता है। साथ ही फसल, मकान या जनहानि की स्थिति में मुआवजा प्रक्रिया को सरल और तेज बनाने की जरूरत है।
हाथी संरक्षण यानी जंगल, जल और जैव-विविधता का संरक्षण..
एशियाई हाथी (Elephas maximus) को आईयूसीएन ने संकटग्रस्त श्रेणी में रखा है। भारत में इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत उच्च स्तर की कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। भारत में हाथियों के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट एलीफेंट वर्ष 1992 में शुरू किया गया था।
हाथी जंगल में बीजों के प्रसार से लेकर वनस्पतियों के पुनर्जनन तक कई महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रक्रियाओं में योगदान देता है। वह जंगल के भीतर ऐसे रास्ते और स्थान भी बनाता है जिनका उपयोग दूसरे जीव करते हैं। इसलिए हाथियों का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने की कवायद है।
विकास भी हो और हाथियों के रास्ते भी सुरक्षित रहें..
छत्तीसगढ़ जैसे वनबहुल राज्य में विकास और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन सबसे बड़ी जरूरत है। सड़क, रेलवे, बिजली, खनन और अन्य परियोजनाओं की योजना बनाते समय हाथियों के आवागमन वाले क्षेत्रों को पहले से चिन्हित करना होगा। ‘लैंडस्केप एप्रोच’ के तहत ऐसे विकास की योजना बनाई जा सकती है जिसमें मानव जरूरतों के साथ वन्यजीवों के आवास और गलियारों का भी ध्यान रखा जाए।
सह-अस्तित्व ही स्थायी समाधान..
विश्व हाथी दिवस का संदेश अब केवल ‘हाथी बचाओ’ तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि ‘हाथी और इंसान साथ कैसे सुरक्षित रहें’ इस सवाल पर केंद्रित होना चाहिए। हाथियों को उनके प्राकृतिक आवास और पारंपरिक रास्ते मिलेंगे तो गांवों में उनकी आवाजाही कम होगी। ग्रामीणों को समय पर सूचना, सुरक्षा और मुआवजा मिलेगा तो संघर्ष की स्थिति में नुकसान भी कम किया जा सकेगा।
मुकेश अग्रवाल का कहना है कि हाथी बचेंगे तो जंगल की पारिस्थितिकी मजबूत रहेगी और जंगल सुरक्षित रहेंगे तो जल, मिट्टी, जैव-विविधता और मानव जीवन भी सुरक्षित रहेगा। इसलिए हाथी संरक्षण को केवल वन विभाग की जिम्मेदारी न मानकर सरकार, प्रशासन, ग्रामीण समाज और तकनीकी संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी बनाना होगा।
हाथी बचेंगे, जंगल बचेंगे और जंगल बचेंगे तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।







