साय सरकार में ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा, फिर भी भ्रष्टाचार के मामले क्यों नही थम रहे ?

ACB-EOW की लगातार कार्रवाई में अधिकारी-कर्मचारी ट्रैप, बड़े आर्थिक मामलों में चार्जशीट; मेडिकल खरीदी, शराब घोटाला और भूमि मुआवजा जैसे मामलो ने बढ़ाई निगरानी की जरूरत..

रायपुर। छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय सरकार लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने का दावा कर रही है। सरकार के कार्यकाल में ACB और EOW की कार्रवाइयों में रिश्वत लेते अधिकारी-कर्मचारियों की गिरफ्तारी से लेकर बड़े आर्थिक मामलों में जांच और चार्जशीट तक सामने आई हैं। ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कितनी गिरफ्तारियां हुईं, बल्कि यह भी है कि सरकारी व्यवस्था में रिश्वत और वित्तीय अनियमितताओं की गुंजाइश आखिर बनी कैसे हुई?

2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार ACB-EOW ने 2021 से 2026 के बीच भ्रष्टाचार, आय से अधिक संपत्ति और पद के दुरुपयोग से जुड़े 400 से अधिक मामले दर्ज किए। रिपोर्ट में राजस्व, पंचायत, नगरीय प्रशासन और वन विभाग से जुड़े मामलों का विशेष उल्लेख किया गया है। हालांकि यह आंकड़ा केवल साय सरकार के कार्यकाल तक सीमित नहीं है।

बड़े मामलो में अधिकारी से लेकर निजी कंपनियों तक जांच..

साय सरकार के कार्यकाल में पिछली अवधि से जुड़े कई बड़े मामलों में जांच आगे बढ़ी है। CGMSCL की मेडिकल उपकरण और रिएजेंट खरीदी से जुड़े मामले में ACB-EOW ने अप्रैल 2025 में छह लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। जांच एजेंसी के अनुसार कथित अनियमितताओं से सरकारी खजाने को करीब 550 करोड़ रुपए के नुकसान का आरोप है। यह मामला 2022 से अक्टूबर 2023 के बीच हुई खरीदी से संबंधित बताया गया है।

इसी तरह भारतमाला परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण मुआवजे से जुड़े मामले में EOW ने अक्टूबर 2025 में 10 आरोपियों के खिलाफ पहली चार्जशीट दाखिल की। जांच एजेंसी ने करीब 32 करोड़ रुपए के कथित गबन का मामला बताया।

शराब से जुड़े मामलो में भी कार्रवाई..

शराब कारोबार से जुड़े पुराने मामलों में भी साय सरकार के कार्यकाल में जांच और कार्रवाई आगे बढ़ी है। जुलाई 2025 में सरकार ने शराब मामले की जांच के आधार पर 22 आबकारी अधिकारियों को निलंबित किया था। सरकार और जांच एजेंसियों के अनुसार आरोप वर्ष 2019 से 2023 के बीच की कथित गतिविधियों से संबंधित थे। इसलिए इसे सीधे साय सरकार के कार्यकाल का घोटाला कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

वहीं 2026 में CSMCL से जुड़े कथित 182.98 करोड़ रुपए के भुगतान मामले में ACB-EOW ने चार्जशीट दाखिल की। जांच के अनुसार मैनपावर एजेंसियो के माध्यम से भुगतान में कथित अनियमितताओं की जांच की गई। मामले में निजी क्षेत्र से जुड़े लोगों के साथ सरकारी निगम की व्यवस्था से जुड़े व्यक्तियो की भूमिका भी जांच के दायरे में रही है।

रिश्वत के छोटे मामलों से बड़े आर्थिक मामलो तक..

ACB की कार्रवाई केवल करोड़ों रुपए के मामलों तक सीमित नहीं है। 2026 में छत्तीसगढ़ में कई विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों को कथित रूप से रिश्वत लेते गिरफ्तार किए जाने की कार्रवाई भी सामने आई। दूसरी ओर, प्रदेश में राजस्व, पंचायत, नगरीय प्रशासन और वन विभाग से जुड़े छोटे-बड़े रिश्वत प्रकरण लगातार जांच एजेंसियों के सामने आते रहे हैं।

इससे भ्रष्टाचार की समस्या का एक दूसरा पहलू भी सामने आता है – बड़े आर्थिक घोटालों की जांच अपनी जगह है, लेकिन आम नागरिक और ठेकेदार को रोजमर्रा के सरकारी काम के लिए रिश्वत मांगने की शिकायत से राहत कब मिलेगी?

सवाल सिर्फ कार्रवाई का नही, व्यवस्था का भी..

सरकार द्वारा कार्रवाई करना भ्रष्टाचार के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन लगातार सामने आ रहे मामलों के बीच निगरानी व्यवस्था, टेंडर प्रक्रिया, भुगतान प्रणाली और विभागीय जवाबदेही की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठते हैं। खासकर उन विभागों में जहां सरकारी भुगतान, निर्माण कार्य, खरीदी और ठेकों से बड़ी रकम जुड़ी होती है, वहां पारदर्शी प्रक्रिया और स्वतंत्र निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार के लिए चुनौती यह भी है कि कार्रवाई केवल शिकायत मिलने के बाद ट्रैप और गिरफ्तारी तक सीमित न रहे, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित हो जिसमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश ही कम हो। ACB-EOW की कार्रवाई के आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित मानकर इसे खत्म करना आसान नहीं होगा।

जांच के नतीजे का इंतजार..

बड़े मामलों में आरोप, FIR, गिरफ्तारी और चार्जशीट जांच की अलग-अलग अवस्थाएं हैं। अंतिम दोषसिद्धि न्यायालयीन प्रक्रिया के बाद ही तय होती है। ऐसे में साय सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार पर कार्रवाई की तस्वीर दो स्तरों पर दिखाई देती है – एक ओर पुराने मामलों में जांच और कार्रवाई आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में भी रिश्वतखोरी के नए मामले सामने आ रहे हैं।

यही स्थिति सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे की असली कसौटी भी बनती है – क्या कार्रवाई के साथ सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार के कारणों पर स्थायी रोक लगाने वाली व्यवस्था भी मजबूत हो रही है?

डिस्क्लेमर : खबर में उल्लेखित मामले जांच एजेंसियों की कार्रवाई, दर्ज प्रकरणों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित हैं। किसी व्यक्ति या संस्था पर लगाए गए आरोपों को अंतिम सत्य या दोषसिद्धि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। इन सभी मामलो में अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायालयीन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही तय होंगी।