ताड़मेटला नक्सली हमले में आरोपियों की रिहाई बरकरार, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज..

76 जवानों की शहादत वाले मामले में कोर्ट की बड़ी टिप्पणी – सिर्फ शक के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा..

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के चर्चित ताड़मेटला नक्सली हमले मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपियों को बरी किए जाने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि जांच एजेंसियां आरोपियों के खिलाफ ठोस और पुख्ता सबूत पेश करने में असफल रहीं।

यह मामला वर्ष 2010 में दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला क्षेत्र में हुए भीषण नक्सली हमले से जुड़ा है, जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे। इस घटना को देश के सबसे बड़े नक्सली हमलों में गिना जाता है। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जांच प्रक्रिया में कई गंभीर खामियों की ओर भी संकेत किया।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि किसी भी आरोपी को केवल शक या संदेह के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने के लिए आवश्यक कानूनी मानकों को पूरा नहीं कर पाया।

सुनवाई के दौरान एफएसएल (फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी) रिपोर्ट, पहचान परेड (टीआई परेड) और अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्यों की प्रक्रिया में गंभीर त्रुटियां सामने आईं। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियों द्वारा साक्ष्य संकलन और प्रस्तुतिकरण में आवश्यक सावधानी नहीं बरती गई, जिससे आरोपियों के खिलाफ मजबूत आधार तैयार नहीं हो सका।

राज्य सरकार ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी, लेकिन विस्तृत सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने अपील को निरस्त कर दिया। इस फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा में आ गया है।

ताड़मेटला हमले में शहीद हुए जवानों की शहादत आज भी देश के लिए एक भावुक अध्याय मानी जाती है। वहीं हाईकोर्ट के इस फैसले ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि न्यायालय में दोष सिद्ध करने के लिए मजबूत और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य सबसे अहम होते हैं।