बिलासपुर। राजनीति में निष्ठा और ज़मीर का सौदा आजकल किस भाव हो रहा है, यह देखना हो तो शहर की सड़कों पर निकल जाइए। बिलासपुर की सियासत में आजकल कुछ ऐसे ही तीर चल रहे हैं, जिनकी चुभन और सच्चाई हर चौक-चौराहे की गपशप में गूंज रही है। आइए, सियासत के इस कमान से निकले कुछ तीरों पर गौर करें।

पहला तीर : चेहरा पुराना, बखान नया..
शहर की सड़कें गवाह हैं कि ‘भाई’ का रुतबा अब होर्डिंग्स की कतारों में सिमट आया है। मानो शहर को रोशन करने का ठेका अब बिजली विभाग ने नहीं, बल्कि नेता जी ने ले लिया है। अपना बखान करने की यह भूख बता रही है कि तीर का असली निशाना कुछ और ही है।
दूसरा तीर : ज़मीन का मोह और बदलता रंग..
कांग्रेस के झंडे तले खुद को ‘ज़मीनी नेता’ होने का सर्टिफिकेट बांटते फिरते थे, आज अचानक उनके हृदय में कमल खिल उठा है। जनता भी खूब समझती है कि यह कोई वैचारिक क्रांति नहीं, बल्कि विशुद्ध ‘भू-बिजनेस’ का तकाज़ा है। ज़मीन के काम करने वाले इन नेताओं को सत्ता के प्यार ने रातों-रात कांग्रेसी से पक्का भाजपाई बना दिया है। सत्ता की इस ‘गंगा’ में नहाकर अब सबका काम धड़ल्ले से हो रहा है!
तीसरा तीर : विज्ञापनों की मलाई..
इस पूरे सियासी ड्रामे में अगर कोई सबसे ज़्यादा खुश है, तो वह हैं कुछ कथित मीडिया कर्मी। उन्हें भली-भांति पता है कि जब तैयारी इतनी ज़ोरों पर है, तो ज़ाहिर है कि विज्ञापनों और ‘प्रसाद’ की भी कोई कमी नहीं होगी। होर्डिंग्स के इस शक्ति प्रदर्शन से अगर किसी का असली फायदा हो रहा है, तो वह यही विज्ञापन-प्रेमी मंडली है।
चौथा तीर : रहते कहीं और, छाते कहीं और..
राजनीति का सबसे बड़ा अजूबा तो यह है कि भौकाल टाइट करने वाले इन नेताजी का निवास और विधानसभा क्षेत्र ही अलग है। रहते कहीं और हैं, लेकिन होर्डिंग से किसी और इलाके को पाट रखा है। इसे कहते हैं ज़मीनी हकीकत से दूर रहकर हवा में महल बनाना।
सियासत के इस तरकश से निकलने वाले तीर सिर्फ सत्ता और स्वार्थ के खेल को बेनकाब कर रहे हैं। विचारधारा तो बस ओढ़ने-बिछाने की चादर रह गई है, असली मज़ा तो ज़मीन के सौदों और कुर्सी की मलाई में है।







