पहाड़ों से निकलकर शहर की जीवनरेखा बनी अरपा की पुकार – सिर्फ तटों का सौंदर्यीकरण नहीं, उद्गम से लेकर जलग्रहण क्षेत्र तक संरक्षण जरूरी..

बिलासपुर। किसी शहर की पहचान केवल उसकी सड़कों, इमारतों और बाजारों से नहीं बनती, बल्कि उसकी प्रकृति, संस्कृति और इतिहास भी उसे एक अलग पहचान देते हैं। बिलासपुर की ऐसी ही एक पहचान है अरपा नदी। पहाड़ों और जंगलों से निकलकर शहर के बीच से गुजरने वाली अरपा केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि बिलासपुर के इतिहास, लोकजीवन, आस्था और सामाजिक स्मृतियों का अभिन्न हिस्सा है। इसके किनारे बस्तियां विकसित हुईं, लोगों की आजीविका इससे जुड़ी और समय के साथ यह नदी शहर की जीवनरेखा के रूप में पहचानी जाने लगी।

लेकिन बदलते समय के साथ अरपा के सामने भी कई चुनौतियां खड़ी हुई हैं। गर्मी में घटता जलप्रवाह, रेत का दोहन, गंदे पानी और कचरे का दबाव तथा नदी के प्राकृतिक स्वरूप को लेकर बढ़ती चिंताएं इसके संरक्षण की जरूरत को सामने लाती हैं। ऐसे में अरपा की कहानी केवल अतीत की यादों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिलासपुर के भविष्य से भी जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल है।
पहाड़ों से शुरू हुई मेरी कहानी, बिलासपुर बनी पहचान..
छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही अंचल के खोडरी-खोंगसरा के पहाड़ी और वन क्षेत्र से निकलने वाली अरपा की यात्रा प्रकृति के बीच शुरू होती है। शुरुआती दौर में छोटी-छोटी जलधाराओं के रूप में आगे बढ़ने वाली यह नदी जंगलों, गांवों और खेतों से गुजरते हुए बिलासपुर अंचल तक पहुंचती है।

बरसात के दौरान पहाड़ियों से उतरने वाला पानी और आसपास की जलधाराएं इसके प्रवाह को सहारा देती हैं। आगे चलकर अरपा शिवनाथ नदी में मिलती है, जो महानदी नदी तंत्र का हिस्सा है। इस तरह अरपा की जलयात्रा स्थानीय सीमाओं से आगे बढ़कर व्यापक नदी तंत्र से जुड़ती है।

अरपा को समझने के लिए केवल शहर के बीच बहने वाली इसकी धारा को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके उद्गम स्थल, जंगल, मिट्टी, रेत और पूरे जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। इन सभी का नदी के जलप्रवाह और प्राकृतिक संतुलन से संबंध है।
नदी के किनारे बसा शहर, नदी से जुड़ी लोगों की जिंदगी..
अरपा और बिलासपुर का रिश्ता लंबे समय से एक-दूसरे से जुड़ा रहा है। नदी के किनारे बसे लोगों के लिए यह पानी का स्रोत होने के साथ-साथ आजीविका और सामाजिक जीवन का भी महत्वपूर्ण आधार रही है।
एक समय नदी पार करने के लिए नावों और डोंगों का सहारा लिया जाता था। घाट लोगों के आने-जाने के रास्ते हुआ करते थे। आसपास के खेतों में खेती होती थी और मछली पकड़ने जैसे कामों से जुड़े परिवारों की जिंदगी भी नदी के साथ चलती थी।

समय के साथ शहर का विस्तार हुआ। सड़कें बनीं, पुल तैयार हुए और नई बस्तियां विकसित हुईं। बिलासपुर के विकास की इस यात्रा में अरपा ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पचरीघाट, शनिचरी रपटा और दूसरे घाट शहर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बने। इन स्थानों पर लोगों की दिनचर्या, मेल-मिलाप और धार्मिक गतिविधियां जुड़ती चली गईं।
आज भी बिलासपुर की पहचान की चर्चा अरपा के बिना अधूरी महसूस होती है। नदी के किनारे बिताए गए बचपन के पल, पुराने घाटों की यादें और त्योहारों की रौनक शहर के लोगों के लिए भावनात्मक महत्व रखती हैं।
बिलासा माई की लोकस्मृति से जुड़ी अरपा..
बिलासपुर की पहचान में बिलासा माई का नाम भी विशेष स्थान रखता है। बिलासा केंवटिन से जुड़ी लोककथाएं पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं। इन कथाओं में साहस, संघर्ष और नदी से जुड़े जीवन की झलक मिलती है।
बिलासा माई की कथा के अलग-अलग रूप प्रचलित हैं। उनकी स्मृति बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। नदी और लोकजीवन के इस संबंध ने अरपा को केवल भौगोलिक पहचान तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे शहर की सांस्कृतिक स्मृतियों से भी जोड़ दिया। अरपा के किनारे बहता पानी जहां प्रकृति की कहानी कहता है, वहीं बिलासा माई की लोकस्मृति शहर के पुराने जीवन और परंपराओं की याद दिलाती है।
अंतःसलिला अरपा: गर्मी में घटता पानी, संरक्षण की बढ़ती जरूरत..
अरपा को कई लोग अंतःसलिला भी कहते हैं। बरसात में नदी का प्रवाह बढ़ जाता है, लेकिन गर्मी के दिनों में कुछ स्थानों पर सतही पानी कम दिखाई देने लगता है। ऐसे समय में नदी के जलस्तर और प्रवाह को लेकर चिंता बढ़ती है। हालांकि, सतह पर पानी कम दिखाई देना और नदी का पूरी तरह सूख जाना एक ही बात नहीं है। नदी के नीचे भूजल और रेत के भीतर पानी की स्थिति को समझने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत होती है।


रेत नदी की प्राकृतिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पानी के प्रवाह, उसके रिसाव और भूजल से जुड़े संबंधों में भूमिका निभाती है। इसलिए रेत का अत्यधिक दोहन नदी के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। नदी का स्वास्थ्य केवल उसके भीतर दिखाई देने वाले पानी से तय नहीं होता। उसके उद्गम क्षेत्र, वर्षा, जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, मिट्टी और आसपास के वन भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विकास के साथ बढ़ीं चुनौतियां, अरपा के अस्तित्व पर सवाल..
शहर के विस्तार और निर्माण गतिविधियों के साथ अरपा के सामने कई पर्यावरणीय चुनौतियां सामने आई हैं। नदी में गंदे पानी का पहुंचना, प्लास्टिक और अन्य कचरे का जमाव, रेत के दोहन तथा तटों पर बढ़ते दबाव जैसे मुद्दे इसके संरक्षण को महत्वपूर्ण बनाते हैं।
नदी के आसपास अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक प्रवाह में बाधाएं भी चिंता का विषय हो सकती हैं। वहीं, जलग्रहण क्षेत्र में वन और भूमि की स्थिति में बदलाव का असर वर्षा के पानी के बहाव और मिट्टी के कटाव पर पड़ सकता है।
बरसात में अचानक बढ़ता जलप्रवाह और गर्मी में घटती धारा को समझने के लिए पूरे नदी तंत्र का अध्ययन आवश्यक है। इसके लिए केवल नदी के किनारे सफाई या निर्माण कार्य करना पर्याप्त नहीं होगा।अरपा के संरक्षण के लिए जरूरी है कि नदी को एक संपूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था के रूप में देखा जाए। इसमें उद्गम स्थल से लेकर शहर के बीच बहने वाली धारा और आगे मिलने वाली नदियों तक के संबंधों को ध्यान में रखना होगा।
अरपा के संरक्षण और विकास के लिए चार प्रमुख पहल..
अरपा के संरक्षण और विकास को लेकर विभिन्न परियोजनाओं और योजनाओं का उल्लेख सामने आता रहा है। इनका उद्देश्य नदी के उद्गम क्षेत्र, जल प्रबंधन, तट विकास और स्वच्छता से जुड़ी जरूरतों पर काम करना है।
1.उद्गम स्थल का संरक्षण: नदी की शुरुआत सुरक्षित रखना जरूरी..
अरपा के उद्गम क्षेत्र के संरक्षण और विकास की योजना में जलाशय, पौधारोपण और सुरक्षा दीवार जैसे कार्य शामिल बताए गए हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, परियोजना की लागत लगभग 7.88 करोड़ रुपये से बढ़कर 12.53 करोड़ रुपये होने का उल्लेख है। नवंबर 2025 में भूमि अधिग्रहण से संबंधित अधिसूचना की जानकारी भी सामने आई थी।

उद्गम क्षेत्र नदी की प्राकृतिक यात्रा का शुरुआती हिस्सा होता है। इसलिए यहां जलस्रोतों, वनस्पतियों और भूमि का संरक्षण महत्वपूर्ण है। यदि उद्गम और उसके आसपास का जलग्रहण क्षेत्र सुरक्षित रहता है, तो नदी के दीर्घकालीन संरक्षण को सहारा मिल सकता है।
2.अरपा-भैंसाझार बैराज: सिंचाई और जल प्रबंधन की उम्मीद..
कोटा क्षेत्र के भैंसाझार में अरपा नदी पर बैराज परियोजना सिंचाई और जल प्रबंधन से जुड़ी है। उपलब्ध परियोजना विवरण में बैराज की ऊंचाई लगभग 12.35 मीटर और लंबाई करीब 130 मीटर बताई गई है।

परियोजना की लागत लगभग 606 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,141 करोड़ रुपये होने का उल्लेख मिलता है। इसके माध्यम से करीब 102 गांवों में 25 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य बताया गया है।
इस परियोजना से किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने और जल प्रबंधन में सहायता मिलने की उम्मीद है। हालांकि, किसी भी नदी परियोजना में सिंचाई की जरूरतों के साथ नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान रखना भी आवश्यक है।
3.रिवर फ्रंट विकास: सुंदरता के साथ स्वच्छता भी जरूरी..
बिलासपुर में अरपा के किनारों को व्यवस्थित और विकसित करने के लिए रिवर फ्रंट परियोजना का उल्लेख मिलता है। इंदिरा सेतु से शनिचरी रपटा तक लगभग 1.80 किलोमीटर क्षेत्र में प्रस्तावित इस परियोजना की शुरुआती लागत करीब 93.70 करोड़ रुपये बताई गई है। सड़क, रिटेनिंग वॉल, रोशनी, बगीचे और नागरिक सुविधाएं इस योजना के प्रमुख हिस्सों में शामिल हैं।

रिवर फ्रंट से नदी किनारे लोगों के लिए बेहतर सुविधाएं विकसित करने की संभावना है। लेकिन नदी के किनारों का विकास तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ जल की गुणवत्ता, प्राकृतिक प्रवाह और पर्यावरणीय संतुलन का भी ध्यान रखा जाए। नदी की सुंदरता केवल रोशनी, दीवारों और बगीचों से नहीं, बल्कि स्वच्छ पानी और सुरक्षित प्राकृतिक वातावरण से भी तय होती है।
4.कोनी-मंगला तट विकास: गंदे पानी और कचरे पर नियंत्रण की जरूरत..
कोनी और मंगला क्षेत्र में तट विकास की योजनाओं का भी उल्लेख किया गया है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, कोनी के लिए करीब 22.45 करोड़ रुपये और मंगला के लिए लगभग 22.32 करोड़ रुपये की लागत बताई गई है। इन योजनाओं से जुड़े प्रमुख उद्देश्यों में नालों का सुधार, गंदे पानी को नियंत्रित करना और नदी तटों की स्वच्छता शामिल हैं। अरपा को स्वच्छ रखने के लिए यह जरूरी है कि शहर से निकलने वाला गंदा पानी बिना उचित उपचार के नदी में न पहुंचे। इसके साथ ही ठोस कचरे के प्रबंधन और नियमित सफाई की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।
आस्था, त्यौहार और घाटों की रौनक से जुड़ी अरपा..
अरपा का संबंध बिलासपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी गहरा है। छठ पूजा के अवसर पर श्रद्धालु घाटों पर पहुंचकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं। कार्तिक पूर्णिमा और मकर संक्रांति जैसे अवसरों पर भी नदी स्नान, पूजा और दान-पुण्य से जुड़ी परंपराएं दिखाई देती हैं।

पचरीघाट में भोजली की परंपरा और विभिन्न धार्मिक आयोजनों के दौरान नदी तटों पर लोगों की भागीदारी अरपा के सांस्कृतिक महत्व को दर्शाती है। गणेश विसर्जन और दुर्गा उत्सव जैसे अवसरों पर भी नदी घाटों और आसपास के क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ जाती हैं।
इन परंपराओं के साथ नदी की स्वच्छता बनाए रखना भी जरूरी है। पूजा सामग्री, प्लास्टिक और अन्य कचरे को नदी में डालने से बचना चाहिए। धार्मिक आयोजनों के दौरान सफाई और उचित विसर्जन व्यवस्था पर ध्यान देना नदी के प्रति जिम्मेदारी का हिस्सा है।
अरपा के नाम पर आयोजन, लेकिन संरक्षण भी उतना ही जरूरी..
अरपा के नाम पर होने वाले आयोजन और उससे जुड़ी संस्थागत पहल नदी की पहचान को सामने लाते हैं। अरपा महोत्सव जैसे आयोजनों के माध्यम से नदी और शहर के संबंध को सांस्कृतिक मंच मिलता है। अरपा विकास प्राधिकरण जैसी पहल भी इसके विकास और संरक्षण से जुड़ी रही है।
लेकिन नदी के नाम पर आयोजन करना और उसके प्राकृतिक अस्तित्व को सुरक्षित रखना दो अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं। नदी के संरक्षण के लिए योजनाओं के साथ उनका प्रभावी क्रियान्वयन, नियमित निगरानी और नागरिक सहभागिता भी जरूरी है। यदि नदी के किनारों को विकसित किया जाता है, तो साथ ही उसके पानी की गुणवत्ता, रेत के दोहन, अतिक्रमण और जलप्रवाह पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के नाम अरपा का संदेश..
अरपा की कहानी केवल पुराने बिलासपुर की यादों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। आने वाली पीढ़ियों के लिए भी यह नदी जीवित और स्वच्छ प्राकृतिक धरोहर बनी रहे, इसके लिए समाज की भागीदारी जरूरी है।
बच्चे और युवा छोटे-छोटे प्रयासों से नदी संरक्षण में योगदान दे सकते हैं। नदी किनारे कचरा नहीं फेंकना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना, पानी की बर्बादी रोकना, पौधों की देखभाल करना और दूसरों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना ऐसे प्रयास हैं, जिनसे सकारात्मक बदलाव की शुरुआत हो सकती है।
नदी किनारे किसी संदिग्ध अवैध गतिविधि या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कार्य की जानकारी जिम्मेदार विभागों तक पहुंचाना भी नागरिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। हालांकि, नदी संरक्षण केवल बच्चों या आम नागरिकों की जिम्मेदारी नहीं है। संबंधित विभागों, स्थानीय प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और समाज के सभी वर्गों को मिलकर काम करना होगा।
अरपा का भविष्य ही बिलासपुर के पर्यावरण का भविष्य..
अरपा की आत्मकथा हमें यह समझने का अवसर देती है कि नदी केवल पानी की धारा नहीं होती। उसके साथ जंगल, मिट्टी, रेत, भूजल, वन्यजीव, खेत, घाट और इंसानी जीवन के अनेक रिश्ते जुड़े होते हैं।बिलासपुर के विकास के साथ अरपा के किनारों पर सुविधाएं विकसित करना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन नदी के प्राकृतिक स्वरूप और पर्यावरणीय जरूरतों की अनदेखी करके विकास की कल्पना अधूरी रहेगी।
अरपा के संरक्षण के लिए उद्गम क्षेत्र को सुरक्षित रखना, जलग्रहण क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना, गंदे पानी और कचरे को नदी में जाने से रोकना, रेत के दोहन पर नियमानुसार नियंत्रण रखना और प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने के उपाय करना आवश्यक है।
अरपा की कहानी हमें एक सरल संदेश देती है – नदी को बचाना केवल नदी को बचाना नहीं, बल्कि शहर की प्रकृति, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास है। अरपा बिलासपुर की पहचान है। उसके अस्तित्व का सम्मान तभी पूरा होगा, जब उसके संरक्षण को भी शहर की सामूहिक जिम्मेदारी माना जाएगा। अरपा बहेगी, तो उसकी धारा के साथ बिलासपुर की स्मृतियां, संस्कृति और प्रकृति का रिश्ता भी आगे बढ़ता रहेगा।
‘अरपा हमारी शान है, बिलासपुर की पहचान है’
लेखक : मुकेश अग्रवाल







