
एजुकेशन इन्वेस्टिगेशन – गलती प्रबंधन की, सजा भुगत रहे छात्र; पैसे लेकर नई की जगह पुरानी मार्कशीट पर ही पेन से कर रहे सुधार..

रायपुर। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (रविवि) में मार्कशीट सुधार के नाम पर एक बड़ा ‘वसूली सिंडिकेट’ और प्रशासनिक लापरवाही का मामला सामने आया है। यहां 3 से 5 साल तक पढ़ने वाले छात्रों को कोर्स पूरा होने के बाद पता चल रहा है कि हर साल उनका नामांकन (एनरोलमेंट) नंबर बदल दिया गया। विश्वविद्यालय प्रबंधन की इस घोर तकनीकी और लिपिकीय लापरवाही का खामियाजा अब छात्रों को भुगतना पड़ रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि गलती सुधारने के नाम पर रविवि प्रशासन छात्रों से प्रति मार्कशीट 500 रुपए की भारी-भरकम फीस ऑनलाइन वसूल रहा है। हद तो यह है कि फीस वसूलने के बावजूद छात्रों को नई मार्कशीट प्रिंट करके नहीं दी जा रही, बल्कि पुरानी मार्कशीट पर ही पेन से नंबर काटकर अपनी सील और हस्ताक्षर करके थमा दिया जा रहा है। इस पूरी सुधार प्रक्रिया में एक से डेढ़ महीने का समय लग रहा है, जिससे सैकड़ों छात्रों का भविष्य और अन्य कॉलेजों में प्रवेश अधर में लटक गया है।
बिना बताए हर साल बदला नंबर, अब माइग्रेशन पर लगा ब्रेक..
रविवि से बीए, बीकॉम या बीएड (तीन से चार साल) का डिग्री कोर्स पूरा कर चुके छात्र जब आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे संस्थानों में प्रवेश लेने हेतु माइग्रेशन और ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) निकालने पहुंच रहे हैं, तब इस बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हो रहा है। रिकॉर्ड में प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ष की मार्कशीट में अलग-अलग नामांकन नंबर होने के कारण विश्वविद्यालय उनका माइग्रेशन रोक दे रहा है। छात्रों का सीधा सवाल है कि एक ही विश्वविद्यालय में लगातार पढ़ने के बावजूद उनका नामांकन नंबर कैसे बदल सकता है? नामांकन नंबर जारी करने और उसे डिजिटल व मैन्युअल रिकॉर्ड में सुरक्षित रखने की पूरी जिम्मेदारी विश्वविद्यालय के आईटी सेल और परीक्षा विभाग की होती है।
वसूली का गणित : तीन मार्कशीट के 1500, फिर भी काम अधूरा..
विश्वविद्यालय ने अपनी गलती सुधारने को ही कमाई का जरिया बना लिया है। सुधार कार्य के लिए प्रति मार्कशीट 500 रुपए का शुल्क ऑनलाइन जमा करवाया जा रहा है। जिन छात्रों की तीन या चार साल की मार्कशीट में गड़बड़ी है, उन्हें 1500 से 2000 रुपए तक चुकाने पड़ रहे हैं। शुल्क चुकाने और 40 से 50 दिन तक चक्कर काटने के बाद जो मार्कशीट दी जा रही है, उसमें छपाई (रिप्रिंट) नहीं होती। अन्य विश्वविद्यालयों में जब ऐसी कांट-छांट वाली मार्कशीट छात्र प्रवेश के लिए लगाते हैं, तो वहां दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।
इन्वेस्टिगेशन : छात्रों के दस्तावेज और उनके खुलासे..
खुलासा – 1 : 4 साल की पढ़ाई, 3 मार्कशीट में अलग नंबर और 1500 की चपत..
छात्र तिलक राम वर्मा ने रविवि से 4 वर्षीय बीए-बीएड की पढ़ाई पूरी की। जब वे माइग्रेशन लेने पहुंचे, तो पता चला कि उनकी तीन अलग-अलग मार्कशीट में नामांकन नंबर भी अलग-अलग दर्ज हैं। सुधार के लिए उनसे 1500 रुपए का ऑनलाइन पेमेंट करवाया गया। चार साल तक रविवि प्रबंधन ने उन्हें कभी सूचित नहीं किया कि सिस्टम में उनका नंबर गलत जनरेट हो रहा है।
खुलासा – 2 : 20 दिन पहले दिए 1000 रुपए, अब तक सुधार नही..
दीपक राजपूत ने तीन साल तक बीकॉम की पढ़ाई की। माइग्रेशन के आवेदन के समय नामांकन नंबर गलत निकला। सुधार के लिए दीपक ने 1000 रुपए का ऑनलाइन पेमेंट कर फाइल जमा की। करीब 20 दिन बीत जाने के बाद भी अब तक मार्कशीट में सुधार नहीं हुआ है। समय पर माइग्रेशन न मिलने से दीपक का दूसरे कॉलेज में प्रवेश अटक गया है।
खुलासा – 3 : 500 रुपए ऐंठे, पर माता का नाम जस का तस..
छात्र अल्पेश विश्वकर्मा की बीकॉम फर्स्ट ईयर की मार्कशीट में उनकी माता का नाम गलत छपा था। इसे सुधरवाने के लिए उन्होंने 500 रुपए देकर सुधार फॉर्म भरा। हैरत की बात यह रही कि जब सेकंड ईयर की मार्कशीट आई, तो सिस्टम से डेटा अपडेट न होने के कारण उसमें भी माता का नाम गलत ही छपा था। पैसे देने के बाद भी डाटाबेस में कोई सुधार नहीं किया गया।
कुलपति की सफाई : पुराने छात्रों के साथ आ रही है समस्या..
मार्कशीट में इस बड़े पैमाने पर हो रही गड़बड़ी को लेकर रविवि के कुलपति प्रो. सच्चिदानंद शुक्ल ने लापरवाही की बात स्वीकारी है। उनका कहना है, “हां, यह समस्या अधिकांश पुराने छात्रों के साथ आ रही है, जिनकी मार्कशीट में नामांकन नंबर अलग-अलग दिख रहे हैं। इसे सुधारने के लिए अब हमने ऑटोमेटिक सिस्टम लागू कर दिया है। अब नए फॉर्म में गलत जानकारी भरने पर प्रक्रिया आगे ही नहीं बढ़ेगी।”
राजभवन तक जा सकता है मामला..
विश्वविद्यालय द्वारा अपनी गलती का आर्थिक दंड छात्रों पर थोपने और पेन से कांट-छांट कर मार्कशीट देने के मामले में छात्र संगठनों में भारी आक्रोश है। सूत्रों के मुताबिक, यदि विश्वविद्यालय ने वसूली गई फीस वापस नहीं की और नई कंप्यूटराइज्ड मार्कशीट प्रिंट कर नहीं दी, तो जल्द ही इस मामले की लिखित शिकायत राजभवन (कुलाधिपति) और उच्च शिक्षा विभाग से की जाएगी। मामले में प्रिंटिंग का टेंडर लेने वाली एजेंसी की भूमिका की भी जांच की मांग उठने लगी है।







