अग्रवाल समाज ने जमीन नहीं मांगी, विश्वविद्यालय में उद्यान विकसित करने की पहल की थी..

भूमि आवंटन का फैसला निरस्त होने के बाद समाज ने रखा पक्ष, कहा- स्वामित्व या कब्जे का कोई सवाल ही नही ; उद्यान बनाकर उसके रखरखाव का सामाजिक दायित्व उठाने की थी पहल..

बिलासपुर। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय परिसर में अग्रवाल समाज को भूमि उपलब्ध कराने को लेकर उठे विवाद के बीच अग्रवाल समाज की ओर से अपना पक्ष स्पष्ट किया गया है। समाज का कहना है कि अग्रवाल समाज ने विश्वविद्यालय से जमीन अपने उपयोग, स्वामित्व या कब्जे के लिए नहीं मांगी थी। विश्वविद्यालय परिसर की रिक्त भूमि पर वृक्षारोपण कर एक सुंदर उद्यान विकसित करने और उसके रखरखाव की जिम्मेदारी लेने के उद्देश्य से पहल की गई थी। यह पूरी पहल सामाजिक सेवा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी थी।

समाज की ओर से जारी स्पष्टीकरण में कहा गया है कि अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन ने गुरु घासीदास विश्वविद्यालय परिसर में उपलब्ध रिक्त भूमि पर वृक्षारोपण कर वाटिका विकसित करने के लिए विश्वविद्यालय प्रबंधन से भूमि उपलब्ध कराने का निवेदन किया था। इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय की जमीन पर किसी प्रकार का स्वामित्व हासिल करना अथवा कब्जा करना नहीं था। विश्वविद्यालय की अनुमति और सहयोग से वहां हरित क्षेत्र विकसित कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करना प्रस्तावित था।

भूमि लेने की नहीं, उद्यान बनाने और संभालने की थी पहल..

अग्रवाल समाज का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय की ओर से भूमि उपलब्ध कराई जाती तो वहां समाज के सहयोग से उद्यान विकसित किया जाता तथा उसके निर्माण, सौंदर्यीकरण और रखरखाव की जिम्मेदारी सामाजिक दायित्व के रूप में निभाई जाती। इसे भूमि लेने के रूप में देखना इस पहल के मूल उद्देश्य को गलत तरीके से प्रस्तुत करना होगा।

समाज ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस तरह विभिन्न कंपनियां अपने सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) फंड के माध्यम से शहर के उद्यानों, चौक-चौराहों अथवा अन्य सार्वजनिक परिसंपत्तियों के विकास और रखरखाव में सहयोग करती हैं, उसी तरह अग्रवाल समाज भी सामाजिक सहभागिता के रूप में विश्वविद्यालय परिसर में हरित क्षेत्र विकसित करना चाहता था। इसी तरह बिलासपुर में मुक्तिधाम सहित सार्वजनिक स्थलों के रखरखाव में सामाजिक संस्थाओं और संगठनों की भागीदारी के उदाहरण भी मौजूद हैं।

समाज का कहना – सार्वजनिक संपत्ति पर समाजसेवा का उद्देश्य..

अग्रवाल समाज के अनुसार विश्वविद्यालय की भूमि सार्वजनिक शैक्षणिक संस्था की संपत्ति है और उस पर समाज का कोई दावा नहीं था। प्रस्ताव का उद्देश्य केवल इतना था कि विश्वविद्यालय की अनुमति से अनुपयोगी पड़ी भूमि को हरियाली में बदला जाए और विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा आम लोगों के लिए एक सुंदर एवं उपयोगी स्थान विकसित किया जाए।

समाज ने कहा कि महाराजा अग्रसेन के सेवा, सहयोग और लोककल्याण के सिद्धांतों से प्रेरित होकर इस तरह के सामाजिक कार्य लगातार किए जाते रहे हैं। उद्यान विकसित करने की पहल भी इसी भावना का हिस्सा थी।

विश्वविद्यालय ने 2 अगस्त का निर्णय 10 अगस्त को किया निरस्त..

इसी बीच गुरु घासीदास विश्वविद्यालय ने 10 अगस्त 2026 को कार्यालयीय ज्ञाप जारी कर इस मामले में पूर्व में लिए गए निर्णय को निरस्त कर दिया है। विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. अश्विनी कुमार दीक्षित की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि विद्यापरिषद की स्थाई समिति की 248वीं बैठक में लिए गए निर्णय के अनुक्रम में, स्थाई समिति की 247वीं बैठक में 2 अगस्त 2026 को एजेंडा क्रमांक 07 के तहत अग्रवाल समाज को उद्यान विकसित करने के लिए भूमि उपलब्ध कराने का जो निर्णय लिया गया था, उसे अपास्त किया जाता है। अर्थात विश्वविद्यालय की ओर से पहले लिया गया भूमि उपलब्ध कराने का निर्णय अब प्रभावी नहीं रहेगा।

समाज ने कहा – भ्रांतियां दूर होना जरूरी..

अग्रवाल समाज की ओर से कहा गया है कि पूरे मामले को लेकर यदि कहीं यह धारणा बनी है कि समाज विश्वविद्यालय की जमीन लेना चाहता था, तो यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। समाज का उद्देश्य न तो जमीन का स्वामित्व हासिल करना था और न ही किसी प्रकार का कब्जा करना।

समाज का कहना है कि यदि किसी संस्था या विश्वविद्यालय की भूमि पर सामाजिक सहयोग से उद्यान विकसित किया जाता है, तो इसका अर्थ भूमि का हस्तांतरण नहीं होता। सार्वजनिक संस्थानों में सामाजिक संस्थाओं और कंपनियों द्वारा विकास एवं रखरखाव के कार्य इसी प्रकार किए जाते हैं।

अग्रवाल समाज ने कहा कि वह विश्वविद्यालय के निर्णय का सम्मान करता है। साथ ही समाज का पक्ष सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना इसलिए जरूरी है, ताकि इस पहल को लेकर किसी प्रकार की गलतफहमी न रहे और जनता के सामने पूरा तथ्य सामने आ सके।

‘हमारा उद्देश्य सेवा था, जमीन लेना नहीं’..

समाज की ओर से स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि अग्रवाल समाज की पहल ‘जमीन लेने’ की नहीं, बल्कि ‘जमीन पर समाजहित का काम करने’ की थी। विश्वविद्यालय की अनुमति से वृक्षारोपण, उद्यान निर्माण और उसके रखरखाव के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण तथा समाजसेवा का एक उदाहरण प्रस्तुत करना ही इसका उद्देश्य था।

समाज ने कहा कि भविष्य में भी महाराजा अग्रसेन के सेवा और लोककल्याण के संदेश से प्रेरित होकर समाज सकारात्मक एवं रचनात्मक सामाजिक कार्यों में अपनी भूमिका निभाता रहेगा।