बिलासपुर। प्रदेश की चर्चित हमर लैब योजना के तहत 161 करोड़ रुपए के रिएजेंट बर्बाद होने और मेडिकल उपकरण खरीदी में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में मोक्षित कॉर्पोरेशन के डायरेक्टर शशांक चोपड़ा को हाई कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने शशांक चोपड़ा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर, चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की थी।

अनुबंध का विवाद या कुछ और?
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह दलील पेश की गई थी कि पूरा मामला विशुद्ध रूप से अनुबंध और रुपयों के लेनदेन का है। कंपनी का तर्क था कि उसने तय शर्तों के अनुसार पूरी सप्लाई कर दी है, लेकिन इसके एवज में 338 करोड़ रुपए की राशि अभी भी सीजीएमएससी (CGMSC) पर बकाया है। बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि कंपनी द्वारा जीएसटी और इनकम टैक्स के रूप में बड़ी राशि जमा की गई है, अतः उन पर गलत तरीके से आर्थिक लाभ लेने के जो आरोप लगाए गए हैं, वे निराधार हैं।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इन सभी तर्कों को सुनने के बाद यह तय किया कि इस मामले की प्रकृति केवल एक अनुबंध के उल्लंघन या भुगतान के विवाद तक सीमित नहीं है। एफआईआर में लगाए गए आरोपों को देखते हुए अदालत ने आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।





