कमर्शियल मामलों में सिविल कोर्ट की तरह काम नहीं कर सकता पिछड़ा वर्ग आयोग : हाईकोर्ट..

बिलासपुर । छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग एक सिफारिश करने वाली और सलाहकार संस्था है, यह बात छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कही। कमर्शियल विवाद में पैसे की रिकवरी का आदेश देने का कोई अधिकार उसे नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ‘छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम 1995’ के तहत हालांकि आमतौर पर आयोग की सलाह राज्य सरकार के लिए बाध्यकारी हो सकती है, लेकिन असल में रिकवरी का आदेश जारी करके वह किसी सक्षम अधिकारी की शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकती।

छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा 23.09.2022 को जारी कम्युनिकेशन को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद सुनवाई कर रहे थे। रेस्पॉन्डेंट नंबर 3 को 21 लाख रुपये में एक हार्वेस्टर बेचने का सौदा याचिकाकर्ता ने किया था, जिसके लिए 30,000 रुपये का एडवांस दिया गया था। कोविड-19 महामारी के कारण डिलीवरी में देरी हुई और चूंकि तय समय के भीतर बैंक फाइनेंस का इंतजाम नहीं हो सका, इसलिए यह सौदा पूरा नहीं हो सका।

फाइनेंस मिलने के बाद हालांकि गाड़ी डिलीवरी के लिए प्रतिवादी को उपलब्ध करा दी गई, लेकिन सौदा रद्द करते हुए रेस्पॉन्डेंट ने उसके बाद कई अधिकारियों सहित आयोग के पास शिकायतें दर्ज कराईं। कलेक्टर को आयोग ने निर्देश दिया कि वे 1,26,500 रुपये याचिकाकर्ता से वसूलें और रेस्पॉन्डेंट नंबर 3 को यह रकम दें। याचिकाकर्ता का तर्क था कि अधिनियम, 1995 के तहत उसकी शक्तियां केवल सिफारिश करने तक सीमित हैं और पैसे की रिकवरी का आदेश देने का आयोग को कोई अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने ‘छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम 1995’ की धारा 9 का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य रूप से आयोग के काम सिफारिश करने वाले और सलाहकार स्वभाव के हैं। कोर्ट ने कहा कि कानून उसे न्यायिक शक्तियां नहीं देता है, हालांकि आमतौर पर राज्य सरकार के लिए आयोग की सलाह बाध्यकारी होती है। विभिन्न पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जांच या पूछताछ के मकसद से सिविल कोर्ट की कुछ शक्तियां दिए जाने मात्र से आयोग सिविल कोर्ट नहीं बन जाता।

आयोग के सामने आया विवाद हार्वेस्टर मशीन की बिक्री से जुड़े कमर्शियल सौदे से पैदा हुआ, यह कोर्ट ने कहा। आयोग ने अपनी कानूनी शक्तियों के दायरे से बाहर जाकर याचिकाकर्ता से ₹1,26,500 की वसूली करने और उसे प्रतिवादी नंबर 3 को भुगतान करने का निर्देश देकर काम किया। कोर्ट ने कहा कि यह आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर का काम था और ऐसे निर्देश को सिर्फ़ एक सिफ़ारिश नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया याचिकाकर्ता से ₹1,26,500 की वसूली करने और उसे प्रतिवादी नंबर 3 को भुगतान करने का निर्देश आयोग ने कमर्शियल लेन-देन से जुड़े विवाद को सुलझाते हुए दिया। इसे सिर्फ़ एक सिफ़ारिश नहीं माना जा सकता और ऐसा निर्देश आयोग को मिली कानूनी शक्तियों के दायरे से बाहर है। इसके अनुसार, रिट याचिका को कोर्ट ने मंज़ूरी दी और आयोग की 04.02.2022 की कार्यवाही रद्द कर दी।