कोयले की काली धूल से जे.के. कॉलेज, खेती और अरपा नदी प्रभावित, क्षमता विस्तार के विरोध में बढ़ा आक्रोश..

बिलासपुर। मस्तूरी क्षेत्र के ग्राम गतौरा में संचालित हिन्द एनर्जी एंड कोल बेनिफिकेशन लिमिटेड (हिन्द ग्रुप) की कोल वाशरी के प्रस्तावित क्षमता विस्तार को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। कंपनी द्वारा 24 जून को ग्राम कर्रा में प्रस्तावित जनसुनवाई को लेकर स्थानीय ग्रामीणों, किसान संगठनों, छात्र संगठनों और पर्यावरण प्रेमियों ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि जनसुनवाई की प्रक्रिया को प्रभावित जनता से छिपाकर ‘गुपचुप तरीके’ से पूरा करने की तैयारी की जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि जिस जनसुनवाई के माध्यम से क्षेत्र के हजारों लोगों के जीवन, पर्यावरण और कृषि पर प्रभाव डालने वाले बड़े फैसले लिए जाने हैं, उसकी जानकारी न तो व्यापक स्तर पर सार्वजनिक की गई है और न ही प्रभावित गांवों तक पहुंचाई गई है। इससे पूरे मामले की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
सूचना सार्वजनिक नहीं होने से बढ़ा संदेह..
पर्यावरणीय नियमों के अनुसार किसी भी औद्योगिक परियोजना की स्थापना अथवा क्षमता विस्तार से पहले जनसुनवाई आयोजित करना अनिवार्य होता है। इसके लिए निर्धारित अवधि पूर्व सार्वजनिक सूचना जारी करना, प्रभावित क्षेत्र के लोगों को आपत्ति और सुझाव प्रस्तुत करने का अवसर देना तथा समाचार पत्रों और संबंधित विभागों के माध्यम से जानकारी उपलब्ध कराना आवश्यक माना जाता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रस्तावित जनसुनवाई की जानकारी आम जनता तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचाई गई। इसके चलते ग्रामीणों में यह आशंका बढ़ गई है कि कहीं केवल औपचारिकता पूरी कर क्षमता विस्तार की मंजूरी लेने की कोशिश तो नहीं की जा रही।
पहले से प्रदूषण की मार झेल रहा पूरा क्षेत्र..
ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान क्षमता में संचालित कोल वाशरी से ही आसपास के कई गांव गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं का सामना कर रहे हैं। गतौरा, कर्रा, फरहदा, लगरा और खैरा सहित अनेक गांवों में कोयले की बारीक धूल लगातार उड़ती रहती है, जिससे लोगों को सांस संबंधी बीमारियों, आंखों में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
किसानों का आरोप है कि खेतों में कोयले की राख और धूल की परत जमने से फसलों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। कई स्थानों पर उत्पादन में कमी आने और भूमि की उर्वरा शक्ति घटने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।
जे.के. कॉलेज पर भी प्रदूषण का असर..
क्षेत्र के प्रतिष्ठित जे.के. कॉलेज के आसपास रहने वाले लोगों और विद्यार्थियों का कहना है कि वाशरी से उड़ने वाली काली धूल कॉलेज परिसर तक पहुंच रही है। क्लासरूम, खेल मैदान और भवनों पर लगातार कोयले की धूल जमने से पढ़ाई का वातावरण प्रभावित हो रहा है। विद्यार्थियों और शिक्षकों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शिक्षा के प्रमुख केंद्र के इतने करीब इस प्रकार का प्रदूषण चिंता का विषय है और क्षमता विस्तार से समस्या और बढ़ सकती है।
अरपा नदी और जल स्रोतों को लेकर भी चिंता..
ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि कोयला धुलाई से निकलने वाले अपशिष्ट और गंदे पानी के कारण स्थानीय जल स्रोतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उनका कहना है कि अरपा नदी तथा उससे जुड़े नालों के प्रदूषित होने की आशंका लगातार बढ़ रही है।
क्षेत्रवासियों का आरोप है कि यदि क्षमता विस्तार की अनुमति दी जाती है तो जल प्रदूषण की समस्या और गंभीर रूप ले सकती है, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों तक पड़ेगा।
भू-जल दोहन पर भी उठे सवाल..
स्थानीय किसानों का दावा है कि वाशरी संचालन में बड़ी मात्रा में भू-जल का उपयोग किया जा रहा है। उनका आरोप है कि अत्यधिक जल दोहन के कारण आसपास के कई गांवों में जलस्तर तेजी से नीचे चला गया है। अनेक बोरवेल और हैंडपंपों में पानी की उपलब्धता कम होने की शिकायतें सामने आई हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि एक ओर किसान सिंचाई और पेयजल संकट से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक उपयोग के लिए बड़े पैमाने पर पानी का दोहन किया जा रहा है।
गतौरा रेलवे स्टेशन भी प्रभावित..
स्थानीय लोगों के अनुसार कोल वाशरी से उड़ने वाली धूल का असर गतौरा रेलवे स्टेशन तक देखा जा सकता है। स्टेशन परिसर, प्लेटफॉर्म और आसपास के क्षेत्रों में कोयले की काली धूल जमा होने की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। यात्रियों, दुकानदारों और रेल कर्मचारियों को भी इससे परेशानी उठानी पड़ रही है।
रोजगार और सीएसआर को लेकर नाराजगी..
क्षेत्र के युवाओं का आरोप है कि उद्योग स्थापना के समय स्थानीय लोगों को रोजगार देने के जो वादे किए गए थे, वे पूरी तरह पूरे नहीं हुए। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि कंपनी द्वारा कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत स्वास्थ्य, पेयजल, शिक्षा और आधारभूत सुविधाओं के विकास पर अपेक्षित कार्य नहीं किया गया।
क्षमता विस्तार का विरोध तेज, जनप्रतिनिधियों ने मांगी पारदर्शिता..
क्षेत्र के ग्रामीणों, किसान संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि प्रस्तावित जनसुनवाई पूरी तरह पारदर्शी तरीके से आयोजित की जाए तथा प्रभावित गांवों के लोगों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाए। उनका कहना है कि जब तक वर्तमान प्रदूषण, जल संकट और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का समाधान नहीं होता, तब तक क्षमता विस्तार पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी चिंताओं को नजरअंदाज किया गया तो वे लोकतांत्रिक तरीके से बड़े स्तर पर विरोध आंदोलन करने को बाध्य होंगे। अब सबकी नजर 24 जून को प्रस्तावित जनसुनवाई पर टिकी हुई है, जहां क्षेत्र के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला सामने आ सकता है।






