850 ग्राम के नन्हे योद्धा ने जीती जिंदगी की जंग..28 सप्ताह में जन्मे प्रीमैच्योर नवजात को श्री शिशु भवन हॉस्पिटल ने दिया नया जीवन..

बिलासपुर। जब उम्मीदें टूटने लगती हैं और हर सांस के साथ डर बढ़ने लगता है, तब डॉक्टरों की मेहनत, आधुनिक इलाज और इंसानियत मिलकर किसी चमत्कार से कम नहीं लगते। ऐसा ही एक भावुक और प्रेरणादायक मामला बिलासपुर के मध्यनगरी चौक स्थित श्री शिशु भवन हॉस्पिटल में सामने आया, जहाँ मात्र 850 ग्राम वजन और 28 सप्ताह में जन्मे एक गंभीर प्रीमैच्योर नवजात को नया जीवन मिला।

हैदराबाद के गायत्री नगर मीरपेठ निवासी शिव कुमार मानकर और उनकी पत्नी सुभाषिनी मानकर के घर 30 मार्च 2026 को समय से पहले बच्चे का जन्म हुआ। जन्म के समय बच्चे का वजन सिर्फ 850 ग्राम था। अत्यधिक कम वजन और समय से पहले जन्म होने के कारण नवजात के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं थे। उसे सांस लेने में परेशानी हो रही थी, हृदय संबंधी गंभीर दिक्कतें थीं, मस्तिष्क में रक्तस्राव हो रहा था और संक्रमण का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा था। बच्चे की हालत इतनी नाजुक थी कि परिवार ने उम्मीद लगभग छोड़ दी थी।

ऐसे कठिन समय में श्री शिशु भवन हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. श्रीकांत गिरी और उनकी अनुभवी टीम ने तुरंत उपचार शुरू किया। बच्चे को लगातार एनआईसीयू में निगरानी में रखा गया। शुरुआती दिनों में हाई ऑक्सीजन फ्लो सपोर्ट दिया गया और जरूरत पड़ने पर वेंटिलेटर सहित अन्य जीवनरक्षक सुविधाओं का सहारा लिया गया।

करीब डेढ़ महीने तक चले कठिन इलाज, चौबीसों घंटे निगरानी और डॉक्टरों व नर्सिंग स्टाफ की समर्पित सेवा के बाद बच्चे की हालत में धीरे-धीरे सुधार आने लगा। कई जटिल चिकित्सकीय चुनौतियों को पार करते हुए आखिरकार वह दिन भी आया, जब इस नन्हे योद्धा ने जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई जीत ली। शनिवार 17 मई 2026 को बच्चे को पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

अपने बच्चे को स्वस्थ देखकर माता-पिता की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। भावुक होकर उन्होंने कहा कि उन्होंने बच्चे के बचने की उम्मीद लगभग छोड़ दी थी, लेकिन अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ ने उनके बच्चे को नया जीवन दिया। उन्होंने कहा कि यहां केवल इलाज ही नहीं हुआ, बल्कि हर पल उन्हें हिम्मत और भरोसा भी मिला।

इस संबंध में डॉ. श्रीकांत गिरी ने बताया कि एक किलो से कम वजन और 28 सप्ताह में जन्म लेने वाले बच्चों का उपचार बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे नवजातों के फेफड़े, मस्तिष्क और अन्य अंग पूरी तरह विकसित नहीं होते, जिससे संक्रमण और सांस लेने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं। उन्होंने कहा कि बिलासपुर जैसे शहर में इतने गंभीर नवजात को स्वस्थ कर घर भेज पाना बड़ी उपलब्धि है।

इस सफल उपचार में एनआईसीयू प्रभारी डॉ. रवि द्विवेदी सहित डॉ. प्रणव अंधारे, डॉ. रोशन शुक्ला, डॉ. मोनिका जायसवाल, डॉ. प्रतिभा अग्रवाल, डॉ. नक्षत्र, डॉ. अनुराग कुमार, डॉ. विशाल मांझी और समस्त नर्सिंग एवं सहयोगी स्टाफ की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

अस्पताल प्रबंधक नवल वर्मा ने बताया कि अस्पताल में समय-समय पर मेडिकल और नर्सिंग स्टाफ को आधुनिक तकनीकों एवं संक्रमण नियंत्रण का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इसी लगातार प्रशिक्षण और अनुशासित व्यवस्था का परिणाम है कि गंभीर से गंभीर नवजातों को भी बेहतर उपचार मिल पा रहा है।

‘जहाँ उम्मीदें खत्म होने लगती हैं, वहीं समर्पण, सेवा और संवेदनशीलता मिलकर जिंदगी को फिर मुस्कुराना सिखा देती है।’