बिलासपुर आंगनबाड़ी ‘कट-कमीशन’ कांड : 15 दिन बाद भी सिंडिकेट का बाल बांका नहीं, जांच के नाम पर फाइलों की बाजीगरी..

बिलासपुर। कोटा जनपद पंचायत के बेलगहना सेक्टर में महिला एवं बाल विकास विभाग के भीतर चल रहे ‘कट-कमीशन’ और उगाही के बड़े खेल का पर्दाफाश हुए आधा महीना बीत चुका है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने जब बगावत कर अपनी ही सुपरवाइजर के खिलाफ मोर्चा खोला था, तब लगा था कि बच्चों के निवाले और खिलौनों पर डाका डालने वालों पर तुरंत गाज गिरेगी। लेकिन पंद्रह दिन गुजर जाने के बाद भी जांच के नाम पर केवल रस्म अदायगी चल रही है और कुपोषण के सौदागर अब भी सिस्टम में बेखौफ जमे हुए हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर वह कौन सी अदृश्य ताकत है जो इस पूरे भ्रष्टाचार के सिंडिकेट को बचा रही है? जब कार्यकर्ताओं ने ब्लॉक मुख्यालय पहुंचकर एसडीएम टी. अरविंद कुमार को लिखित में यह बताया था कि मासिक रिपोर्ट के नाम पर प्रति केंद्र बीस रुपए की तय वसूली हो रही है, खेल सामग्री के परिवहन से लेकर सुपोषण चौपाल तक की राशि में डकैती डाली जा रही है, तो तत्काल प्रभाव से सख्त एक्शन क्यों नहीं लिया गया?

प्रशासनिक सुस्ती से अब उन आरोपों को बल मिल रहा है जिसमें कहा गया था कि भ्रष्टाचार की जड़ें केवल एक सुपरवाइजर कीर्ति किरण मोंगरे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ऊपर तक ‘हिस्सा’ तय है। परियोजना अधिकारी सुरुचि श्याम ने शिकायत के वक्त बड़े अधिकारियों को अवगत कराने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया था, लेकिन अब तक कोई ठोस विभागीय कार्रवाई जमीन पर नहीं दिखी है। यह देरी साफ इशारा कर रही है कि मामले को ठंडे बस्ते में डालने की पूरी पटकथा लिख दी गई है।

इस विभागीय भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी कीमत वे गरीब नौनिहाल चुका रहे हैं, जिनके पोषण के लिए सरकार खजाना खोले बैठी है। कार्यकर्ता ऑन रिकॉर्ड बता चुकी हैं कि कमीशन न देने पर बच्चों के खिलौने रोक दिए जाते हैं और उन्हें यह कहकर संसाधनों से वंचित रखा जाता है कि ‘केंद्र में बच्चे ही नहीं हैं’। टीए बिल में कटौती, भोजन से वंचित करना और कार्यकर्ताओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने जैसे संगीन आरोपों के बावजूद प्रशासन का यह रहस्यमयी मौन कई सवाल खड़े करता है।

पंद्रह दिन का समय किसी भी गंभीर शिकायत में प्रारंभिक जांच और कार्रवाई के लिए पर्याप्त होता है।ऐसा प्रतीत होता है कि अफसर सिर्फ मामले के शांत होने का इंतजार कर रहे हैं। अगर जल्द ही कलेक्टर और उच्च स्तर से इस मामले में सीधा दखल देकर जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह साबित हो जाएगा कि बच्चों के हक पर डाका डालने वालों को पूरे तंत्र का खुला संरक्षण प्राप्त है।