भोरमदेव अभ्यारण्य में जंगल सफारी की शुरुआत : प्रकृति, पर्यटन और रोजगार का नया संगम.. देखें वीडियो..

34 किमी लंबी सफारी, झरने–पहाड़ और नदी पार करने का रोमांच ; इको-टूरिज्म से स्थानीय लोगों को मिलेगा रोजगार..

कवर्धा (छत्तीसगढ़)। मैकाल पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में बसे भोरमदेव अभ्यारण्य में अब पर्यटक जंगल सफारी का रोमांच ले सकेंगे। राज्य में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए यहां विधिवत रूप से जंगल सफारी का शुभारंभ किया गया है। यह पहल न केवल पर्यटकों को आकर्षित करेगी, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी खोलेगी।

वर्ष 2001 में स्थापित भोरमदेव अभ्यारण्य करीब 351 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके अंतर्गत भोरमदेव और चिल्फी परिक्षेत्र आते हैं। यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव विविधता और वन्यजीवों की विविध प्रजातियों के लिए जाना जाता है। यहां 134 प्रकार की तितलियां और 126 प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं, जो इस क्षेत्र की पारिस्थितिक समृद्धि को दर्शाते हैं।

वन्यजीवों की बात करें तो यहां बाइसन, बाघ, हिरण, सांभर, तेंदुआ, भालू और नीलगाय जैसे प्रमुख वन्यप्राणी प्राकृतिक वातावरण में विचरण करते नजर आते हैं। घने साल और मिश्रित वनों से आच्छादित यह अभ्यारण्य छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व और मध्यप्रदेश के कान्हा नेशनल पार्क को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण वन्यजीव कॉरिडोर का भी हिस्सा है, जो वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही और जैव विविधता के संरक्षण में अहम भूमिका निभाता है।

भोरमदेव क्षेत्र केवल प्राकृतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भी समृद्ध है। यहां स्थित प्राचीन भोरमदेव मंदिर अपनी अद्भुत स्थापत्य कला के कारण ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’ कहलाता है। साथ ही यह क्षेत्र आदिवासी संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

नई शुरू की गई जंगल सफारी लगभग 34 किलोमीटर लंबी है, जिसमें पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य के कई अनूठे स्थलों का आनंद ले सकेंगे। सफारी के दौरान दुर्दुरी झरना, बावापारा 360 डिग्री हिल प्वाइंट और रास्ते में करीब 21 बार सकरी नदी को पार करने का रोमांच विशेष आकर्षण रहेगा।

पर्यटकों की सुविधा के लिए 6-सीटर की 3 जिप्सियां उपलब्ध कराई गई हैं और ऑनलाइन टिकट बुकिंग की सुविधा भी शुरू की गई है, जिससे लोग पहले से अपनी यात्रा की योजना बना सकेंगे।

इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के तहत यहां इको-कॉटेज, नेचर ट्रेल और गाइडेड सफारी जैसी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। खास बात यह है कि ‘वनांचल रसोई’ के माध्यम से महिला स्व-सहायता समूह स्थानीय व्यंजन उपलब्ध कराएंगे, वहीं हस्तशिल्प गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

इस पहल से सीधे तौर पर करीब 30 स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा, जबकि पर्यटन बढ़ने से आसपास के होटल, दुकानों और परिवहन सेवाओं में भी अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

कुल मिलाकर, भोरमदेव अभ्यारण्य में शुरू हुई यह जंगल सफारी संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाते हुए इसे छत्तीसगढ़ के प्रमुख इको-टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक मजबूत कदम साबित होगी।

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