गोहरामाल क्षेत्र के 38 याचिकाकर्ताओं को अदालत में नहीं मिला राहत का आधार, सुनवाई के दौरान नहीं हुए उपस्थित; अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की राह हुई आसान..

गरियाबंद। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) में वन भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ चल रही कार्रवाई को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बड़ी कानूनी मजबूती मिली है। हाईकोर्ट ने गोहरामाल क्षेत्र में बफर जोन के भीतर वन भूमि पर कथित अतिक्रमण से जुड़े दो रिट प्रकरणों को खारिज कर दिया है। ये याचिकाएं WPC No. 2680/2024 और WPC No. 2682/2024 थीं। दोनों मामलों की सुनवाई 31 अगस्त को हुई, लेकिन याचिकाकर्ताओं की ओर से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ। अदालत द्वारा दोनों मामलों को दो बार पुकारे जाने के बावजूद उपस्थिति नहीं होने पर हाईकोर्ट ने याचिकाएं ‘अभियोजन के अभाव में’ (For Want of Prosecution) खारिज कर दीं।

इन दोनों याचिकाओं में कुल 38 लोग शामिल थे। इनमें पहली याचिका में 26 और दूसरी में 12 याचिकाकर्ता थे। याचिकाओं के खारिज होने से संबंधित मामलों में लंबित न्यायिक चुनौती फिलहाल समाप्त हो गई है। इससे टाइगर रिजर्व प्रबंधन के लिए वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने की आगे की कार्रवाई का रास्ता भी अधिक स्पष्ट हुआ है।
अतिक्रमण की जांच में उपग्रह और ड्रोन से जुटाए साक्ष्य..
USTR ने इन मामलों में अपना पक्ष मजबूत करने के लिए पारंपरिक रिकॉर्ड के साथ वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों का भी सहारा लिया। विभाग के अनुसार, ISRO की उपग्रह तस्वीरों, ड्रोन सर्वे और जमीन पर किए गए सर्वेक्षण के जरिए यह पता लगाने का प्रयास किया गया कि संबंधित वन भूमि पर कब्जा कब और किस तरह हुआ।
विभाग का कहना था कि संबंधित भूमि पर कब्जा 13 दिसंबर 2005 के बाद किया गया। यह तारीख वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत वन अधिकारों की पात्रता तय करने में महत्वपूर्ण मानी जाती है। विभाग ने अतिक्रमण की समय-सीमा को साबित करने के लिए पुराने और नए उपग्रह चित्रों के साथ अन्य तकनीकी रिकॉर्ड भी जुटाए।
कार्रवाई से पहले संबंधित लोगों को अप्रैल और मई 2023 में कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे। नोटिस के साथ उपग्रह चित्र और सर्वे से जुड़ी जानकारी भी दी गई, ताकि संबंधित पक्ष अपना जवाब और आपत्ति प्रस्तुत कर सकें। इसके बाद मई 2023 में अंतिम बेदखली की कार्रवाई की गई।
वन अधिकार के दावों की भी हुई जांच..
अतिक्रमण से जुड़े मामलों में वन अधिकार अधिनियम के तहत किए गए दावों की भी जांच की गई। विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार, 26 जुलाई 2024 को ग्राम स्तरीय वन अधिकार समिति की बैठक में इन दावों पर विचार किया गया। समिति के समक्ष दावेदारों द्वारा कानून के तहत जरूरी कब्जे की अवधि और जंगल पर निर्भरता से संबंधित आवश्यक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए जा सके। इसके आधार पर संबंधित दावों को अस्वीकार कर दिया गया।

USTR का कहना है कि उसकी कार्रवाई केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक और पात्र वन अधिकारों की प्रक्रिया का सम्मान करते हुए संरक्षित वन भूमि को अवैध कब्जे से बचाना भी इसका उद्देश्य है।
पहले भी सैकड़ों हेक्टेयर वन भूमि कराई जा चुकी है मुक्त..
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई लंबे समय से जारी है। वर्ष 2024 में हाईकोर्ट के समक्ष राज्य की ओर से रखी गई जानकारी के अनुसार, USTR के छह प्रमुख क्षेत्रों में 276 लोगों को बेदखल कर 595.76 हेक्टेयर अतिक्रमित वन भूमि वापस प्राप्त की गई थी। इनमें कुछ मामलों में स्थानीय परिवारों ने स्वयं अतिक्रमित भूमि खाली की, जिससे दो क्षेत्रों में करीब 110 हेक्टेयर वन भूमि वापस मिली थी।
इसके बाद भी अभियान जारी रहा। वर्ष 2025 में इंदागांव बफर रेंज में 60.7 हेक्टेयर अतिक्रमित भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया गया। इस कार्रवाई में भी उपग्रह तस्वीरों की मदद ली गई थी। तकनीकी जांच में यह सामने लाने का प्रयास किया गया कि संबंधित क्षेत्र में अतिक्रमण वर्ष 2008 के बाद शुरू हुआ था।
अब तकनीक के सहारे होगी अतिक्रमण पर निगरानी..
वन अतिक्रमण की पहचान और कार्रवाई के लिए USTR अब तकनीक का बड़े स्तर पर इस्तेमाल कर रहा है। ISRO/NRSC की उपग्रह इमेजरी, GPS सर्वे, DGPS से लैस ड्रोन मैपिंग और जमीन पर भौतिक सत्यापन को कार्रवाई का आधार बनाया जा रहा है। इससे वन भूमि पर कब्जे की वास्तविक स्थिति, अतिक्रमण का क्षेत्रफल और कब्जे की समय-सीमा निर्धारित करने में मदद मिल रही है।
विभाग का मानना है कि तकनीकी साक्ष्यों के इस्तेमाल से अतिक्रमण के मामलों में कार्रवाई अधिक पारदर्शी और तथ्य आधारित बनाई जा सकती है। इससे भविष्य में सामने आने वाले मामलों में भी रिकॉर्ड तैयार करने और कानूनी कार्रवाई को मजबूती देने में मदद मिलेगी।
अतिक्रमण सिर्फ जमीन का मामला नहीं, वन्यजीवों पर भी असर..
टाइगर रिजर्व जैसे संरक्षित क्षेत्रों में अतिक्रमण का असर केवल वन भूमि तक सीमित नहीं रहता। वन क्षेत्र में पेड़ों की कटाई और खेती या अन्य गतिविधियों के लिए जमीन का उपयोग बढ़ने से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर असर पड़ता है। इससे वन आवरण कम होने के साथ वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और कई परिस्थितियों में मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा भी बढ़ सकता है।

इसी वजह से USTR के लिए अतिक्रमण हटाना संरक्षण अभियान का अहम हिस्सा है। हाईकोर्ट से दो याचिकाओं के खारिज होने के बाद अब संबंधित मामलों में प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
कोर्ट की कार्रवाई ने साफ की आगे की राह..
गोहरामाल से जुड़े दोनों मामलों में याचिकाकर्ताओं की गैरहाजिरी के कारण रिट याचिकाओं का खारिज होना USTR के लिए महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम है। इससे जहां संबंधित न्यायिक चुनौती फिलहाल खत्म हुई है, वहीं टाइगर रिजर्व प्रबंधन को संरक्षित वन भूमि पर अनधिकृत कब्जे के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई आगे बढ़ाने का अवसर मिला है। USTR की रणनीति अब कानूनी प्रक्रिया, वन अधिकार दावों की जांच और वैज्ञानिक साक्ष्यों को साथ लेकर वन भूमि और वन्यजीव आवास की सुरक्षा पर केंद्रित है।







