रिमोट का धोखा, वजीर का तीर और 24 लाख के रावण का तिलिस्म, रिमोट का शॉर्ट-सर्किट और मंच पर खौफ..

बिलासपुर। दशहरे के दिन बिलासपुर के पुलिस परेड ग्राउंड में जो हुआ, वह महज एक हादसा था या सिस्टम के ‘शॉर्ट-सर्किट’ का सीधा इशारा? जैसे ही ‘शहरी क्षत्रप’ और प्रथम नागरिक ने रावण दहन के लिए रिमोट का बटन दबाया, आतिशबाजी ने ऐसा रंग बदला कि जश्न चंद पलों में ही दहशत में बदल गया। मंच के ठीक पास धमाका हुआ, धुआं यूँ फैला जैसे किसी बड़े घोटाले की फाइलें अचानक बीच चौराहे पर जल उठी हों। गनीमत रही कि मंच पर विराजमान वीआईपी मेहमानों को खरोंच नहीं आई, लेकिन अफरा-तफरी में दो लोग और कवरेज कर रहे दो पत्रकार इस आग की लपटों का शिकार जरूर हो गए। प्रश्न यह है कि जब सियासत का ‘रिमोट कंट्रोल’ ही धोखा दे जाए, तो खेल कैसे आगे बढ़ेगा? यह कोई पहला वाकया नहीं है; दो-तीन साल पहले भी इसी मैदान में मंच पर तार गिर गया था। लगता है, पुलिस ग्राउंड के रावण ने कसम खा रखी है कि वह बिना अपना रौद्र रूप दिखाए खाक नहीं होगा!

वजीर का तीर और रावण की जिद..

उधर साइंस कॉलेज मैदान का नजारा तो और भी दिलचस्प था। यहाँ ‘राज्य के वजीर और युवा सिपहसालार पूरी सियासी तैयारी के साथ पहुंचे थे। योजना थी कि तार के जरिए रॉकेट जलाकर रावण का दहन किया जाएगा। लेकिन क्या वाकई जनप्रतिनिधियों का तीर रावण के सामने हार गया? जैसे ही आग लगाई गई, रॉकेट रावण की तरफ जाने के बजाय तार में ही गोल-गोल घूमने लगा और फुस्स होकर वहीं फट गया। एक दूसरा रॉकेट जैसे-तैसे पुतले के पास पहुंचा भी, तो बिना कुछ किए औंधे मुंह जमीन पर जा गिरा। यह नजारा देख दर्शक सहम गए और अतिथियों की सांसें अटक गईं। राजनीति की बिसात पर तीर भले ही अपने छोड़े हों, लेकिन निशाना कहाँ लगेगा, इसका फैसला अब रावण खुद करने लगा है!

24 लाख का ‘वीआईपी’ रावण और बाहर का हंगामा..

साइंस कॉलेज के अंदर जब रावण दहन का यह फ्लॉप शो चल रहा था, तब बाहर गेट पर विपक्ष के पहरेदार अपना अलग ही ड्रामा कर रहे थे। 24 लाख रुपये खर्च करके जो रावण तैयार किया गया, उस पर भ्रष्टाचार के छींटे उड़ने लगे हैं। विपक्ष का आरोप है कि रावण के निर्माण में जमकर बंदरबांट हुई है। जब उन्हें अंदर जाने की इजाजत नहीं मिली, तो उन्होंने सड़क पर ही अपना अलग पुतला फूंक कर भड़ास निकाल ली। 24 लाख का रावण, और दहन के नाम पर ऐसा तमाशा! यह सवाल लाजिमी है कि क्या रावण के पुतले में बारूद से ज्यादा भ्रष्टाचार और कमीशन का मसाला भर दिया गया था, जो वह ठीक से जल भी नहीं पाया?

क्यों नही जले शहर के रावण पूरे?

बड़ा प्रश्न जो शहर की गलियों में तैर रहा है, वह यह कि इस बार शहर के रावण पूरे क्यों नहीं जले? पुलिस ग्राउंड हो या साइंस कॉलेज, सब जगह रावण का कुछ न कुछ हिस्सा बच ही गया। क्या यह महज बारूद की कमी थी या इसके पीछे कोई गहरा सियासी संदेश छिपा है? जब पुतले बनाने के टेंडर से लेकर आतिशबाजी की खरीद तक में कमीशन का दीमक लग जाए, तो पुतला पूरा कैसे जलेगा? आधा-अधूरा जला रावण शायद इस बात का प्रतीक है कि शहर में बुराई और भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि उन्हें दिखावटी तीर से पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता। रावण का जो हिस्सा बच गया है, वह असल में सिस्टम का वह हिस्सा है, जो हर बार हर जांच और हर आग से बचकर निकल जाता है। देखना यह है कि इस बची हुई राख से अगले साल भ्रष्टाचार का कौन सा नया पुतला खड़ा होता है!