वन शहीदों को नमन, परिवारों से जुड़े रहने और वन संरक्षण का लिया संकल्प..

वन शहीदों की शहादत को संकल्प में बदला, परिवारों से भावनात्मक जुड़ाव पर जोर..

शहीद वनकर्मियों की विरासत संभाल रही अगली पीढ़ी, वर्दी पहनकर पिता-पति की अधूरी ड्यूटी निभा रहे परिवार..

22वें वन शहीद दिवस पर शहीदों को श्रद्धांजलि, स्मारिका का विमोचन; 1985 से अब तक 36 वनकर्मियों ने वन और वन्यजीवों की रक्षा में दी शहादत..

रायपुर। जंगल, वन्यजीव और जैव विविधता की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वन शहीदों को छत्तीसगढ़ ने शुक्रवार को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी। रायपुर के राजीव स्मृति वन में 22वें वन शहीद दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने शहीद वनकर्मियों को नमन किया और वन संरक्षण के लिए पूरी निष्ठा के साथ काम करने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि वन शहीदों को केवल एक दिन याद करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके परिवारों के साथ लगातार भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखना भी विभाग की जिम्मेदारी है। वन विभाग के प्रमुख अधिकारियों ने क्षेत्रीय अधिकारियों और कर्मचारियों से शहीद परिवारों के लगातार संपर्क में रहने की अपील की, ताकि उन्हें कभी यह महसूस न हो कि वे अपने वन परिवार से अलग हो गए हैं।

1730 के खेजड़ली बलिदान से जुड़ा है इतिहास..

11 सितंबर को वन शहीद दिवस मनाने की परंपरा राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र के खेजड़ली बलिदान से जुड़ी है। वर्ष 1730 में अमृता देवी बिश्नोई सहित 363 लोगों ने पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। इसी ऐतिहासिक बलिदान की स्मृति में 11 सितंबर को वन शहीद दिवस मनाया जाता है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2013 में इसे राष्ट्रीय वन शहीद दिवस के रूप में घोषित किया था। वहीं छत्तीसगढ़ में वर्ष 2005 से लगातार यह दिवस मनाया जा रहा है।

जंगल बचाने की लड़ाई में अब तक 36 वनकर्मी शहीद..

कार्यक्रम में बताया गया कि छत्तीसगढ़ में करीब 44 प्रतिशत रिकॉर्डेड वन क्षेत्र है। इन जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा में वन विभाग के मैदानी कर्मचारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वनरक्षक से लेकर वनपाल और रेंज अधिकारी तक कई कर्मचारी कठिन और दुर्गम इलाकों में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। उन्हें एक साथ वन तस्करों, नक्सली हिंसा और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

वर्ष 1985 में जशपुर के वनरक्षक स्वर्गीय बुधराम भगत से लेकर वर्ष 2025 में कांकेर के वनपाल स्वर्गीय नारायण सिंह यादव तक कई वनकर्मियों ने कर्तव्य निभाते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। वर्ष 1985 से अब तक राज्य में वन और वन्यजीवों की सुरक्षा के दौरान 36 वनकर्मी शहीद हो चुके हैं।

शहीद परिवारों से जुड़े रहने की अपील..

प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरुण कुमार पांडेय ने शहीद वनकर्मियों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि ड्यूटी के दौरान तस्करों और वन्यजीवों के हमलों का सामना करते हुए जान गंवाने वाले कर्मचारियों का बलिदान हमेशा याद रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शहीद परिवारों के लिए आर्थिक सहायता जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी उनके साथ भावनात्मक रिश्ता बनाए रखना है।

उन्होंने सभी क्षेत्रीय अधिकारियों और कर्मचारियों से कहा कि वे अपने-अपने क्षेत्र के वन शहीदों के परिवारों से लगातार संपर्क में रहें। परिवारों को यह महसूस होना चाहिए कि वे आज भी वन विभाग के बड़े परिवार का हिस्सा हैं।

शहीदों के परिवार के सदस्य खुद संभाल रहे वन सेवा की जिम्मेदारी..

कार्यक्रम में यह बात विशेष रूप से सामने आई कि कई शहीद वनकर्मियों के परिवार के सदस्य आज स्वयं वन विभाग की वर्दी पहनकर सेवा कर रहे हैं। अनुकंपा नियुक्ति के माध्यम से वन विभाग में शामिल हुए शहीदों के परिवार के कई सदस्य अब वनरक्षक से आगे बढ़कर वनपाल और रेंज अधिकारी जैसे पदों तक पहुंचे हैं।

कार्यक्रम में मौजूद अन्नपूर्णा साहू, मनोज जायसवाल, रामविलास सिंह और तुलसा मरकाम जैसे शहीद परिवारों के सदस्यों द्वारा अपने पिता या पति की अधूरी जिम्मेदारियों को आगे बढ़ाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में सामने आया।

सरकार ने शहीद परिवारों के कल्याण का भरोसा दिलाया..

कार्यक्रम में अपर मुख्य सचिव ने शहीद वनकर्मियों के परिवारों के कल्याण के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों को प्राथमिकता दी जा रही है। इसके साथ ही वन विभाग के मैदानी अमले को मजबूत करने के लिए नए विभागीय ढांचे और पदों को मंजूरी देकर कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने पर भी काम किया जा रहा है।

स्मारिका में दर्ज हुई शहीदों की पूरी कहानी..

वन शहीद दिवस के अवसर पर विशेष स्मारिका का विमोचन भी किया गया। इसमें राज्य के वन शहीदों के जीवन और उनके बलिदान से जुड़ी जानकारी के साथ शहीद परिवारों के लिए उपलब्ध कल्याणकारी प्रावधानों को शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को उन वनकर्मियों के योगदान से परिचित कराना है, जिन्होंने जंगल और वन्यजीवों की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

कार्यक्रम के अंत में अधिकारियों और कर्मचारियों ने वन संरक्षण की सामूहिक शपथ ली। वक्ताओं ने कहा कि वन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल शब्दों से नहीं, बल्कि जंगलों की रक्षा के लिए किए गए मजबूत प्रयासों से होगी। वन केवल वन विभाग की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा विरासत हैं। हर नागरिक का वन संरक्षण में योगदान ही शहीद वनकर्मियों के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।