श्रम न्यायालय का आदेश भी बेअसर : 32 मामले पक्ष में फिर भी कर्मचारियों को नहीं मिली ग्रेच्युटी..

रायपुर। नौकरी के दौरान अपनी पूरी जिंदगी खपाने वाले कर्मचारियों को अपनी ही ग्रेच्युटी और अन्य देनदारियों के लिए रुलाया जा रहा है। श्रम न्यायालय से वर्षों लंबी कानूनी लड़ाई जीतने के बाद भी उनकी परेशानियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। न्यायालय ने संबंधित संस्थान और नियोक्ता को बकाया रकम चुकाने के सख्त निर्देश दिए। इसके बावजूद नियोक्ताओं ने भुगतान नहीं किया। प्रशासन ने वसूली के लिए संपत्ति जब्ती की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश तो दे दिए, लेकिन यह पूरी कार्रवाई राजस्व विभाग के कार्यालय की कागजी प्रक्रिया में उलझकर रह गई है।

लाखों की रकम फंसी, आदेश का नहीं मिल रहा लाभ..

रायपुर जिले में बीते दो-तीन सालों के भीतर ग्रेच्युटी के 32 से अधिक मामलों में कर्मचारियों के हक में फैसला आया है। इनमें कुछ विवाद ऐसे भी बताए जा रहे हैं, जिनकी सुनवाई कई सालों तक चलती रही। कर्मचारी लंबी कानूनी प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करते रहे। न्यायालय का फैसला पक्ष में आने पर उन्हें उम्मीद थी कि अब उनके हक के लाखों रुपए उन्हें मिल जाएंगे। लेकिन, नियोक्ताओं द्वारा भुगतान न किए जाने से मामला दूसरी सरकारी प्रक्रिया में अटक गया। फैसला पक्ष में होने के बावजूद पैसा नहीं मिलने से कर्मचारी आर्थिक परेशानी का सामना कर रहे हैं। वसूली की कार्रवाई समय पर पूरी न होने से न्यायालय के आदेश का वास्तविक फायदा कर्मचारियों तक पहुंच नहीं पा रहा है।

रकम नहीं मिली, तब शुरू हुई रिकवरी की कार्रवाई..

आदेश के बावजूद राशि नहीं मिलने पर कर्मचारियों ने श्रम न्यायालय में दोबारा आवेदन किया। इसके बाद, बकाया रकम वसूलने के लिए नियोक्ता की संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया अपनाने के निर्देश जारी किए गए। संबंधित राजस्व अधिकारियों को पत्र भी भेजे गए। लेकिन, यह कार्रवाई आगे बढ़ने के बजाय कई प्रकरण तहसील कार्यालयों में पहुंचकर लंबित हो गए हैं।

कागजी प्रक्रिया में लगते हैं कई महीने..

विभागीय नियमों के अनुसार, संपत्ति कुर्की के लिए भेजे गए प्रकरण पर सबसे पहले जिला कलेक्टर स्तर से अनुमति लेना आवश्यक होता है।

कलेक्टर से स्वीकृति मिलने के बाद फाइल संबंधित तहसील के एसडीएम कार्यालय पहुंचती है।

यहां से मामला तहसीलदार और पटवारी स्तर पर जाता है।

पटवारी द्वारा संपत्ति की जानकारी जुटाई जाती है और फिर आगे की कार्रवाई की जाती है।

अधिकारियों के अनुसार, इस पूरी कागजी कार्यवाही में कई महीने का समय लग जाता है। यही वजह है कि अदालत से निर्णय मिलने के बाद भी कर्मचारी अपने ही पैसों के लिए राजस्व कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

क्या कहते हैं अधिकारी..

भुगतान नहीं होने पर आरआरसी जारी करने के लिए प्रकरणों को तहसीलों में भेज दिया जाता है।

देवेन्द्र देवांगन, प्रभारी श्रमायुक्त, रायपुर

जो प्रकरण संज्ञान में हैं, उनकी संपत्ति की जानकारी मांगने के लिए हल्का पटवारी को कहा गया है। कई मामलों में नोटिस भी जारी हुआ है। मैं चेक करवाऊंगा कि कितने प्रकरण पेंडिंग हैं।

राममूर्ति दीवान, तहसीलदार