जहां मिट्टी नहीं, वहां भी उगाया जाएगा जंगल : चट्टानों के बीच 5 हजार पौधों का प्रयोग..

खरसिया के बोतल्दा में 5 हेक्टेयर पथरीली पहाड़ी पर वन विभाग की अनूठी पहल, टिन के घेरे में मिट्टी भरकर लगाए जा रहे पौधे..

रायगढ़। जिस पथरीली पहाड़ी जमीन पर सामान्य तौर पर पेड़ उगाना मुश्किल माना जाता है, अब उसी चट्टानी इलाके को हरित क्षेत्र में बदलने का प्रयोग शुरू किया गया है। खरसिया वन परिक्षेत्र के बोतल्दा स्थित कक्ष क्रमांक 1147 में रायगढ़ वन विभाग करीब 5 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रायोगिक वृक्षारोपण कर रहा है। इस क्षेत्र में लगभग 5 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि जहां पौधों की जड़ों के लिए पर्याप्त मिट्टी उपलब्ध नहीं है, वहां चट्टानों के बीच वैज्ञानिक तकनीक से मिट्टी उपलब्ध कराकर पौधे लगाए जा रहे हैं।

वन विभाग की इस पहल का उद्देश्य ऐसे पथरीले और दुर्गम इलाकों में भी हरित आवरण विकसित करने की संभावनाओं को तलाशना है, जहां पारंपरिक तरीके से वृक्षारोपण चुनौतीपूर्ण रहता है। प्रयोग सफल रहा तो यही तकनीक प्रदेश के दूसरे पथरीले और कठिन वन क्षेत्रों में भी अपनाई जा सकती है।

चट्टानों की दरारों में तलाश रहे पौधों के लिए जगह..

बोतल्दा का चयन इसलिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यहां जमीन का बड़ा हिस्सा पथरीला है और कई स्थानों पर मिट्टी की उपलब्धता बेहद कम है। वन विभाग ने ऐसे स्थानों पर प्राकृतिक परिस्थितियों को ही पौधरोपण का आधार बनाया है। चट्टानों की दरारों और प्राकृतिक गड्ढों में पौधे लगाए जा रहे हैं। जहां प्राकृतिक रूप से मिट्टी उपलब्ध नहीं है, वहां चट्टानों के बीच टिन का घेरा बनाकर उसमें उपयुक्त मिट्टी भरी जा रही है। इसके बाद उसमें पौधे लगाए जा रहे हैं। इस तकनीक से पौधों की जड़ों को शुरुआती विकास के लिए आवश्यक मिट्टी उपलब्ध हो सकेगी।

पहाड़ी का पानी बहकर न जाए, इसलिए पत्थरों की मेड़..

पथरीली जमीन पर सिर्फ पौधे लगा देना ही पर्याप्त नहीं है। बारिश के दौरान पानी तेजी से ढलान से नीचे बहने पर मिट्टी और नमी दोनों का नुकसान हो सकता है। इसे ध्यान में रखते हुए ढलान वाले हिस्सों में कंटूर रेखाओं के अनुरूप पत्थरों की मेड़ बनाई गई है। इन मेड़ों से बारिश के पानी की रफ्तार को नियंत्रित करने, मिट्टी के कटाव को कम करने और जमीन में नमी बनाए रखने में मदद मिलेगी। यानी पौधरोपण के साथ जल और मृदा संरक्षण की व्यवस्था भी की गई है।

स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से चुने पौधे..

प्रयोग में किसी एक प्रजाति के बजाय अलग-अलग प्रजातियों को शामिल किया गया है। क्षेत्र की परिस्थितियों और जैव विविधता को ध्यान में रखते हुए पीपल, हल्दू, नीम, कुसुम, बरगद, करंज और कुल्लू सहित विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए जा रहे हैं। मिश्रित प्रजातियों का उद्देश्य ऐसे पौधों को विकसित करना है जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होकर भविष्य में बेहतर हरित आवरण तैयार कर सकें।

पौधों को बचाने फेंसिंग, सहारा देने बांस..

खुली पहाड़ी होने के कारण पौधों को पशुओं से नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। इसे देखते हुए रोपण क्षेत्र में फेंसिंग की गई है। छोटे पौधों को हवा और अन्य परिस्थितियों से बचाने तथा उन्हें सीधा सहारा देने के लिए बांस स्टेकिंग की व्यवस्था की गई है। पौधों के शुरुआती विकास पर भी विभाग विशेष नजर रख रहा है। समय-समय पर निंदाई-गुड़ाई, जरूरत के अनुसार सिंचाई तथा कीट एवं रोग नियंत्रण के कार्य किए जा रहे हैं। वन अमला रोपित पौधों की नियमित निगरानी और देखभाल कर रहा है।

‘एक पेड़ मां के नाम’ के तहत पीसीसीएफ ने लगाया पौधा..

वरिष्ठ वन अधिकारियों द्वारा समय-समय पर रोपण स्थल का निरीक्षण किया जा रहा है। इसी क्रम में प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरुण पाण्डेय ने बोतल्दा के रोपण स्थल का निरीक्षण किया। उन्होंने ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत स्वयं पौधरोपण भी किया। उन्होंने पथरीली जमीन में पौधरोपण के लिए अपनाई जा रही तकनीक, पौधों की स्थिति और उनके संरक्षण के उपायों का अवलोकन किया। इस दौरान अधिकारियों ने प्रायोगिक रोपण की प्रगति की जानकारी भी दी।

सफल हुआ प्रयोग तो दूसरे पथरीले इलाकों में भी होगा इस्तेमाल..

वन विभाग के लिए बोतल्दा का यह रोपण सिर्फ 5 हेक्टेयर में पौधे लगाने की पहल नहीं, बल्कि कठिन भू-भाग में हरित क्षेत्र विकसित करने की प्रायोगिक कवायद है। प्रयोग के दौरान यह देखा जाएगा कि चट्टानी जमीन पर तैयार किए गए मिट्टी के छोटे क्षेत्रों में विभिन्न प्रजातियों के पौधे किस तरह स्थापित होते हैं और समय के साथ उनका विकास कैसा रहता है।

यदि परिणाम सकारात्मक रहे तो इस तकनीक को प्रदेश के दूसरे पथरीले और दुर्गम इलाकों में भी अपनाया जा सकता है। इससे उन जमीनों को भी हरित आवरण के दायरे में लाने का रास्ता खुल सकता है, जिन्हें अब तक पौधरोपण के लिए कठिन माना जाता रहा है। साथ ही इससे मृदा एवं जल संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी को मजबूत करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।

यह कार्य प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरुण पाण्डेय के निर्देशन तथा मुख्य वन संरक्षक मनोज कुमार पाण्डेय के मार्गदर्शन में किया जा रहा है।