NTPC की दलदल समस्या से त्रस्त किसान, मुआवजा कटने पर फूटा गुस्सा..

कलेक्टर के निर्देश पर एसडीएम-तहसीलदार ने किया निरीक्षण, किसानों ने कहा- खेत बर्बाद, हर साल मुआवजे के लिए लड़नी पड़ती है लड़ाई..

बिलासपुर। एनटीपीसी सीपत परियोजना से प्रभावित क्षेत्र के किसानों की परेशानी एक बार फिर सामने आई है। वर्षों से दलदल और जलभराव की समस्या झेल रहे किसानों ने आरोप लगाया है कि उनकी खेती योग्य जमीन लगातार खराब होती जा रही है, लेकिन समस्या के स्थायी समाधान के बजाय उन्हें हर साल मुआवजे के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

किसानों का कहना है कि एनटीपीसी परियोजना के प्रभाव से कई गांवों के खेतों में जलभराव और दलदल की स्थिति बनी हुई है। इसके कारण खेती करना मुश्किल हो गया है और उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। बावजूद इसके मुआवजा पाने के लिए किसानों को बार-बार आवेदन देना पड़ता है और लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

ग्रामीणों के अनुसार इस वर्ष भी लगभग 30 किसानों का मुआवजा काट दिया गया है, जिससे प्रभावित किसानों में भारी नाराजगी है। किसानों ने आरोप लगाया कि एनटीपीसी के अधिकारियों की कार्यप्रणाली के कारण वास्तविक स्थिति प्रशासन तक सही तरीके से नहीं पहुंच पाती और हर वर्ष प्रभावित किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।

लगातार शिकायतों और विरोध के बाद कलेक्टर के निर्देश पर एसडीएम और तहसीलदार ने प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण किया। अधिकारियों ने खेतों की स्थिति का जायजा लिया और किसानों की समस्याएं सुनीं। हालांकि किसानों का आरोप है कि निरीक्षण के दौरान खेतों के भीतर जाकर वास्तविक हालात देखने के बजाय अधिकांश अवलोकन बाहर से ही किया गया, जिससे जमीन की वास्तविक स्थिति का सही आकलन नहीं हो सका।

किसानों ने बताया कि वर्षों से सर्वेक्षण ऐसे समय कराया जाता है जब गर्मी के कारण खेत अपेक्षाकृत सूखे दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि जून-जुलाई में बारिश शुरू होते ही अधिकांश खेत दलदल में बदल जाते हैं। वहीं अक्टूबर-नवंबर में फसल पकने के समय भी कई स्थानों पर पानी और कीचड़ बना रहता है, जिससे फसल की कटाई तक प्रभावित होती है।

ग्रामीणों का कहना है कि खेतों की स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि कई जगह मेड़ तक पहचान में नहीं आती। कहीं बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं तो कहीं घनी खरपतवार ने खेतों को ढंक लिया है। जलभराव और असमतल जमीन के कारण खेती करना लगभग असंभव होता जा रहा है। कई किसानों ने बताया कि खेतों में मशीनें तक नहीं चल पातीं।

एक किसान ने अपनी समस्या बताते हुए कहा कि खेत की जुताई के लिए बुलाया गया ट्रैक्टर दलदल में फंस गया। उसे बाहर निकालने के लिए तीन अन्य ट्रैक्टरों की मदद लेनी पड़ी, जिससे अतिरिक्त आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

निरीक्षण के दौरान जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने अधिकारियों से मांग की कि प्रभावित खेतों का विस्तृत सर्वे कराया जाए और उन्हें फिर से खेती योग्य बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। उन्होंने कहा कि खेतों की मेड़बंदी कराई जाए, गड्ढों को समतल किया जाए और फैली हुई खरपतवार को हटाकर भूमि को उपयोगी बनाया जाए, ताकि किसान दोबारा सामान्य रूप से खेती कर सकें।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि एनटीपीसी प्रभावित भूमि को पूर्व की स्थिति में लाकर खेती योग्य बनाने में सक्षम नहीं है, तो किसानों के लिए स्थायी मुआवजा व्यवस्था तय की जानी चाहिए। हर साल किसानों को आवेदन, जांच और मुआवजे की प्रक्रिया में उलझाना उचित नहीं है।

मौके पर मौजूद राजस्व अधिकारियों ने किसानों को आश्वस्त किया कि प्रभावित क्षेत्रों की रिपोर्ट तैयार कर उच्च अधिकारियों को भेजी जाएगी। साथ ही खेतों को पुनः खेती योग्य बनाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जाएगा। यदि ऐसा संभव नहीं हुआ तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

क्षेत्र के किसानों का कहना है कि यह समस्या नई नहीं है। वर्षों से वे दलदल, जलभराव और मुआवजे की अनिश्चितता के बीच खेती करने को मजबूर हैं। अब उनकी मांग है कि प्रशासन और एनटीपीसी केवल सर्वेक्षण और आश्वासन तक सीमित न रहें, बल्कि समस्या का स्थायी समाधान निकालें ताकि प्रभावित परिवारों को राहत मिल सके।

फिलहाल किसानों की निगाहें प्रशासन और एनटीपीसी की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि जल्द ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो प्रभावित किसानों का आंदोलन और तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।