

गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्रों में शामिल उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व प्रशासन ने स्थानीय ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों से राष्ट्रीय पारिस्थितिक धरोहर की रक्षा के लिए सहयोग की अपील की है। प्रशासन का कहना है कि टाइगर रिजर्व केवल वन क्षेत्र नहीं, बल्कि लाखों लोगों की जल सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और जैव विविधता का आधार है। इसलिए संरक्षित क्षेत्र के भीतर पक्की सड़क, पारंपरिक विद्युत लाइन और अन्य गैर-वानिकी निर्माण कार्यों की मांगों पर निर्णय लेते समय इसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझना आवश्यक है।


उप संचालक कार्यालय द्वारा जारी विस्तृत अपील में बताया गया है कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व मध्य भारत की सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक संपदाओं में से एक है। महानदी, पैरी, सोंदूर और तेल जैसी प्रमुख नदियों का जलग्रहण क्षेत्र होने के कारण यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ और ओडिशा के लाखों लोगों की जल आवश्यकताओं को अप्रत्यक्ष रूप से पूरा करता है। वन क्षेत्र भूजल पुनर्भरण, कार्बन अवशोषण, जलवायु संतुलन, मृदा संरक्षण और जल सुरक्षा जैसी अमूल्य सेवाएं प्रदान करता है।
दुर्लभ वन्यजीवों का सुरक्षित आश्रय..

टाइगर रिजर्व एशियाई हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू, वन भैंसा, मालाबार पाइड हॉर्नबिल, स्मूथ-कोटेड ऊदबिलाव, भारतीय विशाल गिलहरी और उड़न गिलहरी जैसी दुर्लभ प्रजातियों का महत्वपूर्ण आवास है। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ और ओडिशा के जंगलों को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारे के रूप में भी कार्य करता है, जिससे वन्यजीवों की प्राकृतिक आवाजाही बनी रहती है।
विकास कार्यों से बढ़ सकता है मानव-वन्यजीव संघर्ष..
वन विभाग ने चेतावनी दी है कि वैज्ञानिक अध्ययनों में यह साबित हो चुका है कि वन्यजीव आवासों के भीतर सड़क, बिजली लाइन, स्थायी निर्माण और मानवीय गतिविधियों का विस्तार जंगलों को खंडित करता है। इसका सीधा असर वन्यजीवों के व्यवहार पर पड़ता है और वे भोजन तथा आवागमन के लिए गांवों और कृषि क्षेत्रों की ओर बढ़ने लगते हैं।

वर्तमान में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में 50 से अधिक हाथी, लगभग 200 तेंदुए और एक हजार से अधिक भालू निवास करते हैं। इसके बावजूद विभागीय प्रयासों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से मानव-वन्यजीव संघर्ष को काफी हद तक नियंत्रित रखा गया है। पिछले चार वर्षों में औसतन केवल एक मानव मृत्यु प्रतिवर्ष दर्ज होना इस दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
न्यायालयों के निर्देशों का पालन जरूरी..
टाइगर रिजर्व प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि उसका संचालन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए), पर्यावरण मंत्रालय के दिशा-निर्देशों और न्यायालयों के आदेशों के अनुरूप किया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण आदेशों में उदंती वन्यजीव अभयारण्य और वन भैंसा के आवासों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। वहीं छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने भी टाइगर रिजर्व क्षेत्र के भीतर प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाते हुए संवेदनशील वन क्षेत्रों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए थे।
प्रशासन का कहना है कि कानून और न्यायालयों के आदेशों के तहत वह ऐसे किसी भी कार्य को अनुमति नहीं दे सकता जो वन और वन्यजीव संरक्षण के विरुद्ध हो।
भारतमाला परियोजना भी बदली गई थी..
रिजर्व प्रशासन ने बताया कि उदंती-सीतानदी की पारिस्थितिक संवेदनशीलता को देखते हुए राष्ट्रीय महत्व की रायपुर-विशाखापट्टनम आर्थिक कॉरिडोर (भारतमाला परियोजना) का मार्ग भी टाइगर रिजर्व क्षेत्र से बाहर पुनर्निर्धारित किया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना राष्ट्रीय प्राथमिकता है।
हाथी अलर्ट एप बना सुरक्षा का मजबूत माध्यम..

स्थानीय लोगों की सुरक्षा के लिए विकसित ‘छत्तीसगढ़ एलीफेंट ट्रैकिंग एंड अलर्ट एप’ को बड़ी सफलता मिली है। यह एप हाथियों की गतिविधियों की अग्रिम सूचना देकर ग्रामीणों को सतर्क करता है और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने में मदद करता है। इसकी उपयोगिता को देखते हुए कई अन्य राज्यों ने भी इसे अपनाया है।
अतिक्रमण हटाकर बहाल किए गए वन्यजीव आवास..
राजापड़ाव, शोभा, अड़गड़ी, गोना, गरिबा और कोडोमाली जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से अतिक्रमण का दबाव बना हुआ था। विभाग ने पिछले तीन वर्षों में इचराड़ी, टांगरन और गोना नवापारा क्षेत्रों से 300 हेक्टेयर से अधिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराकर वन्यजीव आवासों को पुनर्स्थापित किया है। यह कार्रवाई कई चुनौतियों और विरोध के बावजूद पूरी की गई।
जंगल बचेंगे तो पानी भी बचेगा..

वन विभाग ने पड़ोसी क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां वनों का क्षरण हुआ है, वहां भूजल स्तर लगातार नीचे गया है। ओडिशा के नवरंगपुर और छत्तीसगढ़ के देवभोग, छुरा तथा फिंगेश्वर क्षेत्रों में जल संकट की बढ़ती समस्या इस बात का संकेत है कि स्वस्थ वन क्षेत्र समाज के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।
ग्रामीणों के लिए सुझाए गए विकल्प..
प्रशासन ने ग्रामीणों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कुछ व्यवहारिक विकल्प भी सुझाए हैं। इनमें मौजूदा सौर ऊर्जा प्रणालियों की मरम्मत और सुदृढ़ीकरण, आवश्यक आवागमन के लिए मिट्टी-मुरूम मार्गों का सुधार तथा इच्छुक परिवारों का बेहतर सुविधाओं वाले क्षेत्रों में स्वैच्छिक पुनर्वास शामिल है।
इको-टूरिज्म से खुलेंगे रोजगार के नए अवसर..
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व को भविष्य में मध्य भारत के प्रमुख इको-टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना पर भी जोर दिया गया है। प्रशासन का मानना है कि यहां की समृद्ध जैव विविधता, नदी उद्गम क्षेत्र और दुर्लभ वन्यजीव देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं।

इसके माध्यम से स्थानीय युवाओं को नेचर गाइड, सफारी चालक, होम-स्टे संचालक, ईको-कैंप प्रबंधक, वन्यजीव ट्रैकर, हस्तशिल्प निर्माता तथा पर्यटन और आतिथ्य सेवाओं में रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। विभाग का कहना है कि संरक्षण आधारित पर्यटन अल्पकालिक लाभ की बजाय दीर्घकालिक और स्थायी आर्थिक समृद्धि का माध्यम बन सकता है।
जनता से सहयोग की अपील..
टाइगर रिजर्व प्रशासन ने कहा है कि उदंती-सीतानदी केवल वर्तमान पीढ़ी की नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों की भी अमूल्य धरोहर है। इसकी सुरक्षा से जल, जंगल, वन्यजीव और पर्यावरण सभी सुरक्षित रहेंगे। प्रशासन ने सभी नागरिकों से अतिक्रमण रोकने, अवैध कटाई और शिकार जैसी गतिविधियों के खिलाफ सहयोग देने तथा संरक्षण आधारित विकास को समर्थन देने की अपील की है।

‘आज टाइगर रिजर्व की रक्षा करना, आने वाली पीढ़ियों की जल सुरक्षा, जलवायु सुरक्षा और मानव सुरक्षा सुनिश्चित करना है।’ यही संदेश देते हुए विभाग ने जनसहभागिता को संरक्षण की सबसे बड़ी ताकत बताया है।



