CG Water Crisis : पाताल में पहुंचा पानी, 800 फीट नीचे गिरा भूजल स्तर… रायपुर-बिलासपुर से लेकर रायगढ़ तक हाहाकार, फाइलों में ‘कैद’ सरकारी सिस्टम..

रायपुर। छत्तीसगढ़ में गर्मी के तीखे तेवर से पहले ही जल संकट ने अपना विकराल रूप दिखाना शुरू कर दिया है। बेतहाशा कंक्रीटीकरण, अंधाधुंध औद्योगीकरण और बेतरतीब दोहन ने धरती की कोख सुखा दी है। हालात ये हैं कि प्रदेश का भूजल स्तर अब रसातल में जा पहुंचा है। राजधानी रायपुर हो, न्यायधानी बिलासपुर हो या फिर औद्योगिक जिला रायगढ़… हर तरफ पेयजल के लिए हाहाकार मचने लगा है। सरकार और नगरीय निकाय पर्यावरण संरक्षण और ‘जल बचाओ’ के नाम पर हर साल करोड़ों के बजट की होली खेल रहे हैं, लेकिन धरातल पर वर्षा जल संचयन के सारे सरकारी इंतजाम पूरी तरह से खोखले और फेल साबित हो रहे हैं।

800 फीट नीचे गया पानी, उगल रहे सूखी हवा..

हालिया आंकड़े किसी डरावने सपने से कम नहीं हैं। राजधानी रायपुर के कई इलाकों में भूजल स्तर 800 फीट तक नीचे जा चुका है। शहर के 70 वार्डों में से 60 फीसदी से ज्यादा इलाकों में बोरवेल दम तोड़ चुके हैं और उगल रहे हैं तो सिर्फ सूखी हवा। उधर, बिलासपुर का हाल भी बेहाल है। तखतपुर और बिल्हा ब्लॉक में जल स्तर इतनी तेजी से गिरा है कि प्रशासन को इन्हें ‘सेमी क्रिटिकल जोन’ घोषित कर नए बोरवेल की खुदाई पर सख्त पाबंदी लगानी पड़ी है। रायगढ़ जैसे औद्योगिक जिले में बेतहाशा औद्योगीकरण और कोल खदानों ने भूजल के साथ-साथ प्राकृतिक जलस्रोतों को भी सोख लिया है। जहां कभी 70-80 फीट पर भरपूर पानी मिल जाया करता था, वहां आज 200 फीट गहरी ड्रिलिंग के बाद भी मशीनें धूल फांक रही हैं।

कागजों पर चल रही ‘रेन वॉटर हार्वेस्टिंग’ योजना..

गिरते जल स्तर को रोकने में सरकारी सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी ‘रेन वॉटर हार्वेस्टिंग’ (वर्षा जल संचयन) है। पिछले 15-20 सालों से रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को बिल्डिंग परमिशन के लिए अनिवार्य किया गया है। लेकिन निगम के अफसरों की मिलीभगत से यह नियम सिर्फ भ्रष्टाचार का जरिया बनकर रह गया है। राजधानी रायपुर के करीब 3.50 लाख मकानों में से 80 प्रतिशत घरों में आज तक हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगा है। जिन सरकारी भवनों में यह सिस्टम लगा भी है, वो देखरेख के अभाव में कचरा घर बन चुके हैं। बारिश का बेशकीमती पानी सहेजने के बजाय नालियों में बहाया जा रहा है और अफसर एसी कमरों में बैठकर ‘जल संरक्षण’ की फर्जी रिपोर्टें बना रहे हैं।

49% के पार पहुंचा दोहन, 11 जिले खतरे की जद में..

सरकारी डेटा गवाही दे रहा है कि राज्य में पहले भूजल का इस्तेमाल 36 प्रतिशत तक सीमित था, जो अब बढ़कर लगभग 49.58% के खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। बेमेतरा, दुर्ग, बालोद और धमतरी जैसे जिलों में तो ग्राउंड वाटर दोहन 70 से 90 प्रतिशत का आंकड़ा छू रहा है। प्रदेश के 11 जिलों को सेमी क्रिटिकल जोन घोषित किया जा चुका है। शहर के शहर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो गए हैं, जिससे बारिश का पानी जमीन के भीतर ‘रीचार्ज’ ही नहीं हो पा रहा है।

सिस्टम के पास नहीं है कोई ‘समर एक्शन प्लान’

छत्तीसगढ़ जैसे बड़ी नदियों वाले राज्य में आज जनता को टैंकरों के भरोसे अपनी प्यास बुझानी पड़ रही है। गर्मी का सबसे भीषण दौर अभी सामने खड़ा है, लेकिन सरकार और नगर निगमों के पास स्थिति से निपटने का कोई ठोस एक्शन प्लान नहीं है। तालाबों पर अतिक्रमण हो चुका है, नदियां सूख रही हैं। अगर अब भी सिस्टम नींद से नहीं जागा और वर्षा जल संचयन के नियमों को सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ में पानी के लिए सड़क पर संग्राम होगा।