गोमर्डा अभयारण्य में अवैध निर्माण का मामला : बिना अनुमति मनरेगा से चेक डैम, वन विभाग पर उठे गंभीर सवाल..

सारंगढ़। छत्तीसगढ़ के गोमर्डा अभयारण्य से एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसने वन संरक्षण व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां अभयारण्य क्षेत्र के भीतर बिना वैधानिक अनुमति के मनरेगा के तहत चेक डैम का निर्माण कराया जा रहा है।

जानकारी के मुताबिक, बटाऊपाली कक्ष क्रमांक 931 पीएफ क्षेत्र में यह निर्माण कार्य चल रहा है। यह इलाका संरक्षित वन्यजीव अभयारण्य के दायरे में आता है, जहां किसी भी प्रकार का गैर-वानिकी (Non-Forestry) कार्य सख्त नियमों के तहत ही किया जा सकता है।

क्या कहता हैं कानून?

भारत में वन और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट और कड़े कानून बनाए गए हैं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार अभयारण्य क्षेत्र में किसी भी निर्माण कार्य के लिए विशेष अनुमति जरूरी होती है। वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत वन भूमि का उपयोग गैर-वानिकी कार्यों के लिए करने से पहले केंद्र सरकार की स्वीकृति अनिवार्य है।इसके अलावा, नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ (NBWL) से अनुमति लेना भी आवश्यक होता है। ऐसे में बिना अनुमति चेक डैम निर्माण सीधे तौर पर नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है।

मनरेगा प्रक्रिया पर सवाल..

मनरेगा के तहत किसी भी निर्माण कार्य के लिए तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होता है। इसमें शामिल हैं: स्थल का भौतिक निरीक्षण। प्रशासनिक और तकनीकी स्वीकृति। संबंधित विभागों (जैसे वन विभाग) से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC)। लेकिन इस मामले में यह स्पष्ट नहीं है कि इन प्रक्रियाओं का पालन किया गया या नहीं। यदि नहीं, तो यह गंभीर लापरवाही या नियमों की अनदेखी मानी जाएगी।

घटिया निर्माण से बढ़ी चिंता..

स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी सामने आए हैं कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता मानकों का पालन नहीं किया जा रहा। कंक्रीट की जगह मिट्टी मिली बजरी और डस्ट का उपयोग।सीमेंट की बहुत कम मात्रा। ऐसी स्थिति में आशंका है कि यह चेक डैम पहली बारिश में ही क्षतिग्रस्त हो सकता है, जिससे सरकारी धन की बर्बादी तय है।

वन अमले की भूमिका पर सवाल..

इस पूरे मामले में वन विभाग की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। क्या स्थानीय बीट गार्ड,डिप्टी रेंजर,रेंजर और एसडीओ को इस निर्माण की जानकारी नहीं थी? यदि जानकारी थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इन सवालों का जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं है।

लगातार बढ़ रहे अवैध निर्माण के आरोप..

स्थानीय लोगों का आरोप है कि अभयारण्य क्षेत्र में पहले भी विभिन्न योजनाओं जैसे आवास, सड़क और भूमि आवंटन के नाम पर निर्माण कार्य किए गए हैं। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि कहीं यह सुनियोजित तरीके से वन भूमि के अतिक्रमण की प्रक्रिया तो नहीं। कुछ मामलों में अधिकारियों पर बाहरी दबाव की बात भी सामने आ रही है, जिसके चलते कार्रवाई नहीं हो पाती।

पर्यावरण पर असर..

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अवैध निर्माण से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास प्रभावित होता है।जैव विविधता को नुकसान पहुंचता है।पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ता है।जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और गंभीर हो सकते हैं।

स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि निर्माण कार्य को तुरंत रोका जाए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। दोषी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर FIR दर्ज हो। पर्यावरणीय नुकसान का आकलन कर क्षतिपूर्ति वसूली जाए।

गोमर्डा अभयारण्य का यह मामला सिर्फ एक चेक डैम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कानून के पालन, प्रशासनिक पारदर्शिता और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो संरक्षित वन क्षेत्र केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाएंगे और प्राकृतिक धरोहर को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।