उदंती-सीतानदी में ऊदबिलाव की मौजूदगी से बढ़ी उम्मीद.. देखें वीडियो..

कैमरा ट्रैप में दिखे दुर्लभ जलीय जीव, वैज्ञानिकों ने कहा- स्वस्थ जल स्रोत और समृद्ध जैव विविधता का संकेत..

रायपुर। छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व और आसपास के जल स्रोतों से वन्यजीव संरक्षण के लिए एक बेहद सकारात्मक खबर सामने आई है। वन विभाग और छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा द्वारा किए गए संयुक्त अध्ययन में अभ्यारण्य क्षेत्र में ऊदबिलाव (ओटर) की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। कैमरा ट्रैप में मिले चित्रों ने यह साबित कर दिया है कि इस क्षेत्र के नदी-नालों और जल स्रोतों में अब भी समृद्ध जलीय जैव विविधता मौजूद है।

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गरियाबंद जिले के उदंती सीता नदी टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक वरुण जैन ने बताया कि लगातार मॉनिटरिंग और कैमरा ट्रैपिंग के दौरान ऊदबिलाव की गतिविधियां रिकॉर्ड हुई हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि जल स्रोतों की गुणवत्ता और पर्यावरणीय संतुलन के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण संकेत है।

विशेषज्ञों के अनुसार ऊदबिलाव ऐसे जीव हैं जो साफ और जीवंत जल स्रोतों में ही लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। इनकी मौजूदगी यह दर्शाती है कि संबंधित क्षेत्र का नदी तंत्र और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी काफी हद तक सुरक्षित है। यही वजह है कि ऊदबिलाव को ‘स्वस्थ नदियों का प्रहरी’ भी कहा जाता है।

भारत में पाई जाती हैं ऊदबिलाव की तीन प्रमुख प्रजातियां..

जानकारों के मुताबिक दुनिया में ऊदबिलाव की कुल 13 प्रजातियां पाई जाती हैं, जबकि भारत में तीन प्रमुख प्रजातियों का रिकॉर्ड दर्ज है –

स्मूथ-कोटेड ऊदबिलाव (Lutrogale perspicillata)

एशियाई स्मॉल-क्लॉड ऊदबिलाव (Aonyx cinereus)

यूरेशियन ऊदबिलाव (Lutra lutra)

छत्तीसगढ़ में इन तीनों प्रजातियों की मौजूदगी अलग-अलग क्षेत्रों में दर्ज की जा चुकी है। इनमें स्मूथ-कोटेड ऊदबिलाव सबसे अधिक पाए जाने वाले माने जाते हैं, लेकिन इनकी संख्या लगातार घट रही है।

अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने इसे “असुरक्षित” यानी Vulnerable श्रेणी में रखा है। अनुमान है कि पिछले तीन दशकों में इसकी वैश्विक आबादी में 30 प्रतिशत से अधिक गिरावट आई है।

नदियों के बिगड़ते हालात बन रहे सबसे बड़ा खतरा..

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि ऊदबिलाव केवल एक जलीय जीव नहीं, बल्कि पूरे नदी तंत्र की सेहत का संकेतक हैं। लेकिन तेजी से बदलते पर्यावरण और विकास परियोजनाओं के दबाव ने इनके अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है।

देशभर में नदियों और आर्द्रभूमियों पर बढ़ता अतिक्रमण, जल प्रदूषण, अवैध रेत खनन, अत्यधिक मछली पकड़ना, बांध और पनबिजली परियोजनाएं, जलवायु परिवर्तन तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष इनके प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर रहे हैं। पश्चिमी घाट, चंबल, तुंगभद्रा और कावेरी नदी तंत्र में हुए कई अध्ययनों में भी इन खतरों की पुष्टि हो चुकी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते नदियों और जल स्रोतों को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में ऊदबिलाव जैसे संवेदनशील जीवों का अस्तित्व गंभीर संकट में पड़ सकता है।

2021 से चल रहा संरक्षण और अध्ययन अभियान..

बताया गया कि छत्तीसगढ़ में वर्ष 2021 से ऊदबिलाव संरक्षण और अध्ययन का विशेष अभियान चलाया जा रहा है। राज्य जैव विविधता बोर्ड और वन विभाग द्वारा कोरबा, कांकेर, गरियाबंद और बस्तर संभाग के विभिन्न इलाकों में कैमरा ट्रैप, मैदानी सर्वे और वैज्ञानिक अध्ययन के जरिए इनके व्यवहार और मौजूदगी की जानकारी जुटाई जा रही है।

हाल ही में तैयार अध्ययन रिपोर्ट वन विभाग को सौंप दी गई है, जिसमें राज्य के कई जिलों में ऊदबिलाव की उपस्थिति के प्रमाण दर्ज किए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिपोर्ट भविष्य में जल स्रोत संरक्षण और वन्यजीव प्रबंधन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

विश्व ऊदबिलाव दिवस पर बढ़ा संरक्षण का संदेश..

हर वर्ष 27 मई को विश्व ऊदबिलाव दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को ऊदबिलाव संरक्षण, स्वच्छ नदियों और जैव विविधता के महत्व के प्रति जागरूक करना है।

पर्यावरणविदों का कहना है कि ऊदबिलावों को बचाना केवल एक जीव की रक्षा करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ जल और सुरक्षित पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करना है।