
बिलासपुर निगम की वार्ड – 59 पार्षद सुनीता जगत का आरोप – जमीन के आगे-पीछे हो रहा कब्जा, इकबाल सिंह समेत अन्य लोगों पर जमीन हड़पने की कोशिश का संदेह; करीब एक साल से सीमांकन के लिए अधिकारियों के चक्कर लगाने का दावा..

बिलासपुर/पेंड्रा। जमीन की वास्तविक सीमा तय करने और उस पर अपने अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए आम नागरिकों को राजस्व कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। लेकिन जब ऐसा ही मामला किसी जनप्रतिनिधि का हो, तो प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। पेंड्रा में जमीन के सीमांकन को लेकर ऐसा ही एक मामला सामने आया है। बिलासपुर नगर निगम के वार्ड क्रमांक 59 की भाजपा पार्षद सुनीता जगत का कहना है कि वर्ष 2011 में खरीदी गई उनकी जमीन की सीमा स्पष्ट नहीं होने के कारण वह परेशान हैं। उन्होंने जमीन के आगे और पीछे की ओर कब्जे की स्थिति बनने की आशंका जताई है। साथ ही इकबाल सिंह समेत कुछ अन्य लोगों पर जमीन हड़पने की कोशिश करने का आरोप लगाया है।


पार्षद का दावा है कि वह करीब एक साल से जमीन का सीमांकन कराने के लिए संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर रही हैं, लेकिन अब तक समस्या का समाधान नहीं हुआ है। हालांकि, जमीन पर अवैध कब्जे, किसी की मंशा और सीमांकन में देरी के कारणों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। ऐसे में राजस्व विभाग के अभिलेख और मौके पर होने वाला नियमानुसार सीमांकन इस विवाद की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होंगे।
2011 में खरीदी थी 16 डिसमिल जमीन..
सुनीता जगत के अनुसार, उन्होंने वर्ष 2011 में पेंड्रा के बिलासपुर रोड क्षेत्र में रमेश कोल से 16 डिसमिल जमीन खरीदी थी। उनके मुताबिक, यह जमीन खसरा नंबर 2480/1 से संबंधित है। जमीन खरीदने के बाद से वह इसे अपनी संपत्ति मानकर चल रही थीं, लेकिन अब इसकी सीमाओं को लेकर उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।


पार्षद का कहना है कि जमीन के आगे और पीछे की ओर कब्जे की स्थिति बनने से उनकी संपत्ति की वास्तविक सीमा को लेकर चिंता बढ़ गई है। उनका आरोप है कि कुछ लोग जमीन पर अपना अधिकार स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, जमीन की वर्तमान स्थिति, आसपास के भूखंडों की सीमाएं और संबंधित पक्षों के दावों की पुष्टि राजस्व रिकॉर्ड तथा आधिकारिक सीमांकन से ही हो सकेगी।
जमीन के दाम बढ़ने के साथ विवाद की आशंका..
पार्षद ने आरोप लगाया है कि क्षेत्र में जमीन की कीमत बढ़ने के बाद उनकी जमीन को लेकर विवाद की आशंका पैदा हुई है। उन्होंने इकबाल सिंह समेत अन्य लोगों पर जमीन हड़पने की कोशिश करने का संदेह जताया है। उनके मुताबिक, इस स्थिति के कारण वह परेशान हैं और अपनी जमीन की सीमा स्पष्ट कराने के लिए प्रशासन से मदद मांग रही हैं।
हालांकि, जमीन की कीमत बढ़ने को विवाद का कारण मानने या किसी व्यक्ति की नीयत पर सवाल उठाने के लिए स्वतंत्र प्रमाण जरूरी हैं। फिलहाल इसे पार्षद की ओर से जताई गई आशंका और लगाए गए आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। संबंधित पक्षों का जवाब और जमीन से जुड़े दस्तावेज सामने आने पर मामले की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।
करीब एक साल से सीमांकन के लिए प्रयास का दावा..
इस पूरे मामले में सबसे अहम मुद्दा जमीन के सीमांकन का है। सुनीता जगत का कहना है कि वह लगभग एक साल से संबंधित अधिकारियों से जमीन का सीमांकन कराने की मांग कर रही हैं। इसके बावजूद उनकी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।

सीमांकन की प्रक्रिया में राजस्व अभिलेखों, खसरा नंबर, उपलब्ध नक्शे और मौके की स्थिति के आधार पर जमीन की वास्तविक सीमा निर्धारित की जाती है। ऐसे मामलों में नियमानुसार सीमांकन होने से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि संबंधित भूखंड की सीमा कहां तक है और आसपास की जमीनों के साथ कोई विवाद है या नहीं।
हालांकि, सीमांकन के लिए आवेदन कब दिया गया, उस पर संबंधित कार्यालय ने क्या कार्रवाई की और देरी का कोई आधिकारिक कारण है या नहीं, इसकी जानकारी सामने आना बाकी है। आवेदन और राजस्व विभाग के रिकॉर्ड से इन सवालों का जवाब मिल सकता है।
भाजपा की पार्षद की शिकायत, प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल..
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सुनीता जगत भाजपा की पार्षद हैं और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है। ऐसे में एक जनप्रतिनिधि का अपनी निजी जमीन के सीमांकन के लिए लंबे समय से प्रयास करने का दावा प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
हालांकि, केवल पार्षद के आरोपों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि अधिकारियों ने जानबूझकर कार्रवाई नहीं की। इसके लिए यह जानना जरूरी है कि आवेदन किस अधिकारी के पास लंबित है, क्या दस्तावेजों में कोई कमी बताई गई है और अब तक क्या कार्रवाई हुई है।
फिर भी, यदि सीमांकन के लिए नियमानुसार आवेदन देने के बावजूद लंबे समय तक प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, तो संबंधित विभाग को देरी का कारण स्पष्ट करना चाहिए। जमीन संबंधी विवादों में समय पर सीमांकन होने से विवाद बढ़ने की आशंका कम की जा सकती है और पक्षकारों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर मिलता है।
अब राजस्व विभाग की कार्रवाई पर नजर..
फिलहाल सुनीता जगत को अपनी जमीन के सीमांकन और विवाद की स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित राजस्व अधिकारी उनके आवेदन पर क्या कार्रवाई करते हैं और नियमानुसार सीमांकन कब कराया जाता है।
जमीन पर कब्जे की आशंका, संबंधित पक्षों के दावे और सीमांकन में कथित देरी जैसे सवालों का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि राजस्व अभिलेखों और निष्पक्ष जांच से ही संभव है। यदि पार्षद की शिकायत के अनुरूप जमीन की सीमा को लेकर विवाद है, तो प्रशासन को नियमानुसार प्रक्रिया पूरी कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
फिलहाल पार्षद के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इकबाल सिंह समेत जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं, उनका पक्ष और संबंधित राजस्व अधिकारियों की प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है।







