हाथियों का घर बचा तो टकराव घटेगा : बिलासपुर वन वृत्त में 7 कॉरिडोर की सुरक्षा पर जोर.. देखें एक्सक्लूसिव वीडियो..

100 हाथियों की आवाजाही पर 24 घंटे नजर, ड्रोन और ‘गज संकेतक’ से मिलेगी लोकेशन ; गांवों में ‘हाथी मित्र’ बताएंगे खतरे का अलर्ट..

बिलासपुर। हाथी और इंसान के बीच बढ़ते टकराव को रोकने के लिए अब केवल हाथियों को जंगल में वापस खदेड़ना ही समाधान नहीं माना जा रहा, बल्कि उनके पारंपरिक रास्तों और प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। बिलासपुर वन वृत्त में इसी रणनीति के तहत हाथी कॉरिडोर की निगरानी से लेकर ग्रामीणों को समय पर अलर्ट करने तक कई स्तरों पर काम किया जा रहा है। प्रदेश में चिन्हित 9 हाथी कॉरिडोर में से 7 बिलासपुर वन वृत्त में हैं, जबकि इस क्षेत्र के अलग-अलग वनमंडलों में करीब 100 हाथी विचरण करते हैं।

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धरमजयगढ़, रायगढ़, कोरबा और कटघोरा वनमंडल हाथियों की गतिविधियों के प्रमुख क्षेत्र हैं। हाथियों की आवाजाही वाले इलाकों में अब वन विभाग गज ट्रैकिंग दल, ड्रोन, ‘गज संकेतक’ एप, व्हाट्सएप ग्रुप और गांवों में सक्रिय हाथी मित्र दल के जरिए निगरानी और सूचना तंत्र को मजबूत कर रहा है।

पांच साल में 23 करोड़ से ज्यादा की क्षति..

हाथियों के संरक्षण के साथ सबसे बड़ी चुनौती मानव-हाथी संघर्ष को कम करना है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 से 2025 के बीच हाथियों के कारण जनहानि, जनचायल, पशुहानि, फसल, मकान और अन्य संपत्ति की क्षति के मद में कुल 23.76 करोड़ रुपये से अधिक की राशि दर्ज की गई है।

इसमें सबसे बड़ा हिस्सा फसल नुकसान का है। पांच वर्षों में फसल क्षति करीब 17.97 करोड़ रुपये दर्ज की गई। मकान क्षति करीब 2.68 करोड़ रुपये, जबकि अन्य संपत्ति की क्षति करीब 1.20 करोड़ रुपये रही। इसी अवधि में जनहानि के लिए 5.64 करोड़ रुपये और पशुहानि के लिए करीब 15.05 लाख रुपये की राशि दर्ज की गई है।

यानी आंकड़े यह बताते हैं कि मानव-हाथी संघर्ष का सबसे बड़ा असर ग्रामीणों की आजीविका पर पड़ रहा है। खेतों में तैयार फसल हाथियों के झुंड के पहुंचने से बर्बाद हो जाती है और कई बार मकान व दूसरी संपत्तियां भी क्षतिग्रस्त होती हैं।

कॉरिडोर टूटे तो बढ़ेगा संघर्ष..

वन विभाग की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हाथियों के पारंपरिक आवागमन वाले रास्तों को सुरक्षित रखना है। हाथी एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते। वे भोजन, पानी और मौसम के अनुसार एक जंगल से दूसरे जंगल की ओर जाते हैं। यदि उनके पुराने रास्तों में सड़क, निर्माण, औद्योगिक गतिविधि या अन्य बाधाएं बढ़ती हैं तो हाथियों के आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने की संभावना बढ़ सकती है। इसी वजह से हाथी कॉरिडोर में अनियंत्रित भूमि उपयोग, औद्योगिक निर्माण और सड़क चौड़ीकरण जैसी गतिविधियों को नियंत्रित करने पर जोर दिया जा रहा है।

अब हाथी जंगल में छिपे नहीं रहेंगे, ड्रोन रखेगा नजर.. देखें वीडियो..

घने जंगल में हाथियों के झुंड की गतिविधियों पर नजर रखना आसान नहीं होता। ऐसे क्षेत्रों में वन विभाग अब ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। इससे हाथियों के झुंड की स्थिति का पता लगाने और उनकी दिशा समझने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा गज ट्रैकिंग दल जमीन पर लगातार निगरानी कर रहे हैं। जैसे ही हाथियों की गतिविधि किसी गांव या आबादी के करीब होती है, सूचना स्थानीय स्तर पर साझा करने की व्यवस्था की गई है।

‘गज संकेतक’ से रियल टाइम लोकेशन..

मानव-हाथी संघर्ष रोकने की व्यवस्था में ‘गज संकेतक’ मोबाइल एप को महत्वपूर्ण कड़ी बनाया गया है। इसके जरिए हाथियों के झुंड की रियल टाइम लोकेशन की जानकारी वन अमले और संबंधित लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसका सीधा फायदा यह होगा कि हाथियों की दिशा की जानकारी पहले मिलने पर ग्रामीण सावधानी बरत सकेंगे और वन विभाग भी मौके पर निगरानी बढ़ा सकेगा।

गांवों में हाथी मित्र, व्हाट्सएप से अलर्ट..

तकनीक के साथ स्थानीय लोगों को भी इस अभियान का हिस्सा बनाया गया है। हाथी प्रभावित गांवों में ‘हाथी मित्र दल’ सक्रिय किए गए हैं। इनके माध्यम से हाथियों की मौजूदगी की जानकारी तत्काल साझा करने पर जोर है।

विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में व्हाट्सएप समूह भी बनाए हैं, जिनमें हाथियों की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी ग्रामीणों और अधिकारियों तक पहुंचाई जाती है। इस तरह विभाग का प्रयास है कि हाथी गांव में प्रवेश करने के बाद सूचना मिलने के बजाय पहले ही ग्रामीणों को सतर्क किया जा सके।

जंगल में ही पानी और भोजन की व्यवस्था.. देखें वीडियो..

हाथियों को आबादी से दूर रखने के लिए जंगल के भीतर ही उनके लिए पानी और भोजन की उपलब्धता बढ़ाने पर भी काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य हाथियों को भोजन और पानी की तलाश में खेतों या बस्तियों की ओर आने से रोकना है। यह कदम हाथियों और ग्रामीणों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि जंगल में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होने पर हाथियों की आबादी वाले क्षेत्रों पर निर्भरता कम की जा सकती है।

सड़कों पर भी विशेष सावधानी..

हाथी विचरण वाले इलाकों में सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए साइन बोर्ड, फ्लैश लाइट और ‘स्लो’ प्लेट्स लगाए गए हैं। वाहन चालकों को संवेदनशील क्षेत्रों में गति कम रखने और सड़क पार करते हाथियों से पर्याप्त दूरी बनाए रखने के लिए जागरूक किया जा रहा है। प्रभावित लोगों को त्वरित सहायता उपलब्ध कराने के लिए ‘गज सहायता केंद्र’ भी स्थापित किए गए हैं। भविष्य में संवेदनशील इलाकों में सौर लाइट और सायरन सिस्टम का विस्तार करने की योजना भी बताई गई है।

‘हमर हाथी हमर गोठ’ से जागरूकता..

हाथियों के व्यवहार और उनसे बचाव के तरीकों की जानकारी ग्रामीणों तक पहुंचाने के लिए ‘हमर हाथी हमर गोठ’ रेडियो कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है। इसमें लोगों को हाथियों की गतिविधियों, सावधानी और सुरक्षित व्यवहार के बारे में बताया जाता है।

वन विभाग का मानना है कि हाथियों के साथ संघर्ष कम करने के लिए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं है। ग्रामीणों की जागरूकता, समय पर सूचना और हाथियों के प्राकृतिक रास्तों का संरक्षण तीनों को साथ लेकर चलना जरूरी है।

बीमार हाथी से लेकर शिकार तक पर निगरानी..

वन विभाग के अनुसार बीमार या विपरीत परिस्थितियों में फंसे हाथियों की सूचना मिलने पर तत्काल बचाव और उपचार संबंधी कार्रवाई की जाती है। वहीं हाथी की दुर्घटना में मृत्यु या अवैध शिकार की घटना सामने आने पर जांच कर दोषियों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत कार्रवाई की जाती है।

सबसे बड़ी जरूरत – हाथी के रास्ते में इंसानी दखल कम हो..

बिलासपुर वन वृत्त में हाथियों की मौजूदगी को चुनौती के साथ-साथ संरक्षण की जिम्मेदारी के रूप में भी देखा जा रहा है। करीब 100 हाथियों और सात महत्वपूर्ण कॉरिडोर वाले इस क्षेत्र में आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि विकास और हाथियों के प्राकृतिक आवागमन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

वन विभाग की मौजूदा रणनीति का फोकस अब हाथियों के पीछे दौड़ने के बजाय उनके रास्ते और आवास को सुरक्षित रखने, पहले से खतरे का पता लगाने और ग्रामीणों को समय पर सतर्क करने पर है। यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से जमीन पर लागू होती है तो मानव-हाथी संघर्ष के साथ-साथ फसल और संपत्ति के नुकसान को भी कम किया जा सकता है।

मनोज पांडेय (IFS) मुख्य वन संरक्षक बिलासपुर ने कहा..

मानव-हाथी संघर्ष को कम करना वन विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। हाथियों के प्राकृतिक आवागमन वाले कॉरिडोर को सुरक्षित रखने के साथ उनकी गतिविधियों की लगातार निगरानी की जा रही है। ड्रोन, गज ट्रैकिंग दल और ‘गज संकेतक’ एप के माध्यम से हाथियों की लोकेशन की जानकारी समय पर साझा की जा रही है। प्रभावित गांवों में हाथी मित्र दल और सूचना तंत्र को सक्रिय किया गया है, ताकि ग्रामीणों को समय रहते सतर्क किया जा सके। हमारा प्रयास है कि हाथियों का संरक्षण भी हो और ग्रामीणों की जान-माल एवं फसल की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।

प्रियंका पांडेय (IFS) फील्ड डायरेक्टर अचानकमार टाइगर रिजर्व ने कहा..

हाथियों और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए विभाग जमीन पर लगातार काम कर रहा है। हाथियों के आने-जाने वाले रास्तों की निगरानी बढ़ाई गई है, ताकि समय रहते लोगों को सतर्क किया जा सके। ड्रोन, ट्रैकिंग टीम और ‘गज संकेतक’ एप से हाथियों की लोकेशन की जानकारी मिल रही है। गांवों में हाथी मित्र दल ग्रामीणों तक हाथियों की गतिविधियों की सूचना पहुंचा रहे हैं। हमारा प्रयास है कि हाथियों को सुरक्षित आवास मिले और ग्रामीणों को जान-माल व फसल का कम से कम नुकसान हो।