बिलासपुर। अगर किसी भर्ती के विज्ञापन में यह नहीं बताया गया है कि किस श्रेणी की दिव्यांगता को अयोग्य माना जाएगा, तो चयन प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद सरकार कर्मचारी को सेवा से नहीं हटा सकती। हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने इस मामले में दो दृष्टिबाधित शिक्षकों के पक्ष में अपना फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सेवा में आने के बाद किसी प्रशासनिक कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देकर सरकार नौकरी नहीं छीन सकती। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।

डेढ़ साल बाद थमाया गया था नोटिस..
रायपुर स्थित संचालनालय लोक शिक्षण ने 9 मार्च 2019 को शिक्षक, सहायक शिक्षक और व्याख्याता के पदों पर भर्ती के लिए एक विज्ञापन निकाला था। इसमें नियम के अनुसार दिव्यांगों के लिए आरक्षण का प्रावधान तो शामिल था, लेकिन यह नहीं बताया गया था कि किस कैटेगरी के दिव्यांग इस पद के लिए अपात्र माने जाएंगे। इसी विज्ञापन के आधार पर 40 प्रतिशत दृष्टिबाधित नील कुमारी और शिव शंकर साहू ने शिक्षक (शारीरिक शिक्षा) के पद के लिए अपना आवेदन किया।
पूरी चयन प्रक्रिया होने और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद इन दोनों की नियुक्ति 24 अगस्त 2021 को कर दी गई। इसके बाद वे अपनी सेवाएं दे रहे थे। लेकिन नियुक्ति के करीब डेढ़ साल बीत जाने के बाद, 19 जनवरी 2023 को बिलासपुर के संयुक्त संचालक (शिक्षा) ने इन दोनों शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। इसके तहत शिव शंकर साहू को सेवा समाप्ति का नोटिस मिला, जबकि 6 फरवरी 2023 को नील कुमारी की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। विभाग की इस कार्रवाई के बाद दोनों शिक्षकों ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
संविधान में दिव्यांग और सामान्य नागरिकों में कोई भेद नहीं..
याचिका पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि हमारा संविधान सामान्य नागरिकों और दिव्यांगों के बीच कोई वर्ग या भेद नहीं करता है। संविधान दोनों को समान अवसर देने की वकालत करता है। संसद द्वारा जो अधिकार तय कर दिए गए हैं, उन्हें किसी भी तरह छीना नहीं जा सकता।
अवसर कम नहीं किए जा सकते..
सामान्य प्रशासन विभाग के वर्ष 2014 के सर्कुलर का भी जिक्र किया गया। इसके अनुसार, विभाग दिव्यांगों के लिए अवसरों को बढ़ा तो सकते हैं, लेकिन पहले से तय किए गए पदों को किसी स्थिति में कम नहीं कर सकते। इन सभी तर्कों को मानते हुए हाई कोर्ट ने शिव शंकर साहू की सेवा समाप्ति के लिए जारी कारण बताओ नोटिस को रद्द कर दिया। चूंकि वे अभी सेवा में हैं, इसलिए वे अपने पद पर बने रहेंगे। इसके साथ ही नील कुमारी के बर्खास्तगी आदेश को भी कोर्ट ने निरस्त कर दिया है।







