छत्तीसगढ़ में हाथियों के आतंक से हुए नुकसान का मुआवजा अब मिलेगा ऑनलाइन, गजसंकेत सिस्टम हुआ हाईटेक..

रायपुर। छत्तीसगढ़ के वनांचल क्षेत्रों में हाथियों और वन्यजीवों के कारण होने वाले नुकसान का मुआवजा पाना अब आम जनता के लिए बेहद आसान होने जा रहा है।वन विभाग ने अपनी महत्वपूर्ण गजसंकेत प्रणाली को पूरी तरह से डिजिटल रूप देते हुए अपडेट कर दिया है।अब राज्य के किसी भी ग्रामीण को अपनी बर्बाद हुई फसल टूटे हुए मकान या जनहानि के मुआवजे के लिए सरकारी वन दफ्तरों के बार बार चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। नए नियमों के तहत आवेदन जमा करने से लेकर अंतिम भुगतान तक की पूरी व्यवस्था ऑनलाइन कर दी गई है।सबसे बड़ी बात यह है कि सभी प्रकार के दावों के निपटारे के लिए अधिकतम तीस दिन की सख्त समय सीमा तय कर दी गई है।जिससे प्रभावित परिवारों को बिना किसी परेशानी के घर बैठे ही उनके नुकसान का पैसा सीधे उनके बैंक खाते में मिल सकेगा।

गरियाबंद,महासमुंद और धमतरी सहित राज्य के कई घने वन क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही साल भर लगातार बनी रहती है।हर साल जंगली हाथियों के दल गरीब किसानों की लहलहाती फसलों को पूरी तरह रौंद देते हैं।उनके कच्चे मकानों को तहस नहस कर देते हैं और कई बार दुखद जनहानि तथा पशुधन का भी भारी नुकसान होता है। पुरानी व्यवस्था में मुआवजा मिलने में कई महीनों का लंबा समय लग जाता था और कागजी फाइलों के उलझाऊ काम में सीधे सादे ग्रामीण बेहद परेशान होते थे। लेकिन अब इस नई आधुनिक डिजिटल व्यवस्था के लागू होने के बाद राहत राशि प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया बेहद सरल बहुत तेज और पूरी तरह से पारदर्शी हो जाएगी। खासकर वनांचल और दूरस्थ जंगली गांवों में निवास करने वाले आदिवासियों और किसानों को इस नई ऑनलाइन प्रणाली का सबसे अधिक और सीधा फायदा मिलेगा।

उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप निदेशक वरुण जैन की मानें तो मानव और हाथी के बीच बढ़ते द्वंद्व को कम करने के पुनीत उद्देश्य से वर्ष दो हजार तेईस में इस गजसंकेत प्रणाली की विधिवत शुरुआत की गई थी।शुरुआती दौर में इसके माध्यम से वन विभाग ग्रामीणों को हाथियों की सटीक लोकेशन और उनकी गतिविधियों की पूर्व सूचना देता था, ताकि लोग समय रहते सतर्क हो सकें और जानमाल का नुकसान कम से कम हो यह अनूठा प्रयोग इतना अधिक सफल रहा कि देखते ही देखते मध्य प्रदेश महाराष्ट्र, झारखंड, तेलंगाना, कर्नाटक और ओडिशा जैसे कई अन्य बड़े राज्यों ने भी हाथियों के प्रबंधन के लिए इसी सफल मॉडल को अपना लिया। अब इसी शानदार तकनीकी मॉडल को और भी उन्नत करते हुए सीधे मुआवजा प्रबंधन प्रणाली के साथ जोड़ दिया गया है। जो पूरे देश में अपने आप में एक बहुत बड़ी प्रशासनिक उपलब्धि मानी जा रही है।

इस नई डिजिटल प्रणाली में सरकारी काम में पारदर्शिता लाने पर सबसे अधिक जोर दिया गया है।जैसे ही कोई भी हितग्राही या किसान अपना मुआवजा दावा ऑनलाइन दर्ज करेगा। उसके तुरंत बाद से उस दावे की मैदानी जांच दस्तावेजों का सत्यापन अधिकारियों द्वारा स्वीकृति और अंत में सरकारी ट्रेजरी से भुगतान होने तक की हर एक छोटी बड़ी कार्रवाई की ताजा जानकारी सीधे उसके मोबाइल फोन पर एसएमएस मैसेज के जरिए पहुंच जाएगी। अब किसी भी ग्रामीण को यह जानने के लिए वन रक्षकों या रेंजरों के पास नहीं जाना होगा कि उनकी फाइल वर्तमान में किस अधिकारी की टेबल पर है और उन्हें उनका पैसा कब तक मिलेगा।

छत्तीसगढ़ राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक अरुण कुमार पाण्डेय ने स्पष्ट किया है कि गजसंकेत प्रणाली में सभी जरूरी तकनीकी अपडेट का काम अब लगभग पूरा कर लिया गया है और बहुत जल्द ही इस नई पारदर्शी व्यवस्था को जमीनी स्तर पर पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा।