रायपुर एम्स में एमआरआई के लिए 9 महीने की वेटिंग, सस्ती जांच की आस में मरीज निजी सेंटरों की तरफ जाने को मजबूर..

रायपुर।रायपुर एम्स में मरीजों की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है। अस्पताल में एमआरआई जांच को लेकर व्यवस्था अब भी वैसी ही है। मरीजों को इस जांच के लिए आज भी महीनों का इंतजार करना पड़ रहा है। लगभग तीन सप्ताह पहले, 19 जून 2026 को इस समस्या को प्रमुखता से उठाया गया था। उस समय की पड़ताल में यह बात सामने आई थी कि मरीजों को एमआरआई जांच के लिए लगभग नौ माह बाद की तारीख दी जा रही है। जांच हो जाने के बाद उसकी रिपोर्ट मिलने में भी दो सप्ताह तक का समय लग रहा है।

खबर के बाद भी नहीं सुधरी व्यवस्था..

खबर प्रकाशित होने के बाद मरीजों को यह उम्मीद जगी थी कि अस्पताल की इस व्यवस्था में कुछ सुधार होगा। लेकिन धरातल पर स्थिति में कोई बदलाव नहीं देखने को मिला है। अस्पताल में इलाज कराने आ रहे कई मरीजों का यही कहना है कि डॉक्टर उनकी बीमारी की गंभीरता को देखते हुए जल्द से जल्द एमआरआई या सीटी स्कैन कराने की सलाह देते हैं। लेकिन, जब वे जांच कराने जाते हैं, तो अस्पताल में उन्हें इसके लिए लंबा इंतजार बताया जाता है।

मजबूरी में निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों का कर रहे रुख..

मरीजों के सामने अब बड़ी परेशानी यह है कि वे इलाज में देरी नहीं कर सकते। बीमारी की गंभीरता उन्हें इतना लंबा इंतजार करने की इजाजत नहीं देती। इसलिए, इलाज में किसी भी तरह की देरी न हो, इसके लिए वे मजबूरी में निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों का रुख कर रहे हैं। सस्ती जांच के लिए मरीजों को जो लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, वह अब उन पर भारी पड़ रहा है।

एमआरआई जांच का खर्च: सरकारी और निजी में अंतर..

एम्स में इलाज कराने आने वाले ज्यादातर मरीज आर्थिक रूप से बहुत मजबूत नहीं होते। वे यहां सस्ती जांच की उम्मीद में आते हैं।

एम्स (सरकारी दर) : यहां एमआरआई जांच का खर्च 1500 से 1800 रुपये आता है।

निजी डायग्नोस्टिक सेंटर : वहीं, निजी सेंटरों में इसी जांच के लिए 3000 से 5000 रुपये तक वसूले जाते हैं।

बीमारी का डर और इंतजार का बोझ..

मरीज जब बड़े अस्पताल में पहुंचते हैं, तो उन्हें उम्मीद होती है कि यहां उन्हें बेहतर और समय पर इलाज मिलेगा। लेकिन एमआरआई जांच के मामले में यह उम्मीद टूटती नजर आती है। डॉक्टर जब मरीज को जांच लिखते हैं, तो उसका मतलब होता है कि बीमारी का सही पता लगाकर इलाज शुरू किया जाए। मगर जब जांच के लिए ही नौ महीने तक का समय दे दिया जाए, तो इलाज कैसे शुरू होगा? इसी डर के कारण मरीज बाहर से जांच करा रहे हैं।

रिपोर्ट के लिए भी लंबा इंतजार..

परेशानी सिर्फ जांच की तारीख मिलने तक ही सीमित नहीं है। जिन मरीजों की जांच हो भी जाती है, उन्हें अपनी रिपोर्ट के लिए भी भटकना पड़ता है। एमआरआई होने के बाद रिपोर्ट हाथ में आने में लगभग दो सप्ताह तक का समय लग जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाला समय मरीजों की परेशानी को और बढ़ा देता है।

कुल मिलाकर हालात ऐसे बन गए हैं कि सरकारी दर पर जांच होने के बावजूद मरीज उसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। 1500-1800 रुपये की जांच के लिए लंबा इंतजार करने के बजाय मरीज 3000-5000 रुपये देकर निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों में जा रहे हैं। जब तक व्यवस्था में वास्तव में सुधार नहीं होता, तब तक मरीजों को इसी तरह परेशानी का सामना करना पड़ेगा और उन्हें मजबूरी में निजी सेंटरों की तरफ ही जाना पड़ेगा।