

बिलासपुर,मस्तूरी। बिलासपुर जिले के मस्तूरी ब्लॉक में एकीकृत महिला एवं बाल विकास विभाग के भीतर चल रहे मानदेय कटौती के खेल का पर्दाफाश होने के बाद महकमे में हड़कंप मच गया है। खबर के प्रकाशन के बाद अब जवाबदेही से बचने के लिए अधिकारियों और पर्यवेक्षकों के बीच खींचतान और गुटबाजी शुरू हो गई है।

निचले स्तर की जिन सुपरवाइजरों पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का वेतन काटने का आरोप था अब वे खुद को बचाने के लिए सीधे तौर पर सीडीपीओ यानी साहब के निर्देशों का हवाला दे रही हैं। इधर विभाग अपनी खामियां सुधारने और पीड़ित महिलाओं को न्याय देने के बजाय मीडिया तक यह जानकारी पहुंचाने वाले उस करीबी विभीषण की तलाश में जुट गया है जिसने इस पूरे रैकेट की पोल खोली है।
सुपरवाइजरों ने बदले सुर साहब को भारी पड़ने लगा चोली दामन का साथ..
सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार मीडिया में खबर आने के बाद साहब की बेहद करीबी मानी जाने वाली दोनों महिला पर्यवेक्षक अब बैकफुट पर आ गई हैं। इन सुपरवाइजरों ने दबी जुबान में साफ कर दिया है कि उन्होंने मानदेय में कटौती केवल साहब के मौखिक आदेशों के पालन में की थी।
उनका सीधा कहना है कि यदि जांच की आंच उन तक पहुंचती है तो वे सारा ठीकरा उच्चाधिकारियों के सिर फोड़ देंगी। विभाग के गलियारों में अब यह चर्चा आम हो गई है कि चोली दामन का यह साथ अब साहब को महंगा पड़ने लगा है क्योंकि कहावत है कि घर का भेदी लंका ढाए और इस मामले में भी उनके ही करीबी अब उनकी लंका में आग लगाने में जुट गए हैं।
विभीषण की तलाश और कार्यकर्ताओं पर बढ़ा दबाव..
अपनी कार्यकुशलता की झूठी छवि चमकाने के चक्कर में गरीब और बेसहारा महिलाओं का निवाला छीनने वाला यह तंत्र अब लीपापोती के साथ साथ मुखबिर की तलाश में लगा है। विभाग में इस बात की सघन पड़ताल की जा रही है कि आखिर अंदर की यह गुप्त बातें और विभागीय अनियमितताओं का पुलिंदा मीडिया तक किसने परोसा।
इस खिसियाहट का खामियाजा एक बार फिर उन गरीब आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को भुगतना पड़ रहा है जिन पर अनावश्यक रूप से दबाव बनाना शुरू कर दिया गया है।
गौरतलब है कि इनमें से अधिकांश महिलाएं विधवा और परित्यक्ता हैं जिनके लिए यह अल्प मानदेय ही जीवनयापन का इकलौता सहारा है और अब उन पर नौकरी से निकाले जाने की धमकियों का साया मंडरा रहा है।
दिनभर बंधुआ मजदूरी फिर भी कट रहा 12 दिन का वेतन..
मस्तूरी क्षेत्र विशेषकर लोहार्सि और जयराम नगर में काम करने वाली इन महिलाओं की स्थिति किसी बंधुआ मजदूर से कम नहीं रह गई है। सुबह आंगनबाड़ी केंद्र खोलने से लेकर बच्चों को पोषण आहार बांटने महिला एवं बाल विकास के साथ स्वास्थ्य शिक्षा और निर्वाचन जैसे अन्य विभागों का सर्वे करने और शाम को ऑनलाइन डेटा एंट्री करने में इनका पूरा दिन खप जाता है। इसके बावजूद उपस्थिति पंजी और रिपोर्ट में हेरफेर कर हर महीने 10 से 12 दिन का वेतन काट लिया जाता है।
कार्यकर्ताओं का दर्द है कि सुबह से शाम तक क्षेत्र की खाक छानने और दूरस्थ इलाकों से रिपोर्ट लेकर कार्यालय पहुंचने के बाद भी उन्हें काम अधूरा होने का ताना देकर वेतन से वंचित कर दिया जाता है।
कलेक्टर की पुरानी सख्ती बेअसर, बड़े आंदोलन की तैयारी में संघ..
यह कोई पहला वाकया नहीं है जब मस्तूरी में इन महिलाओं के हक पर डाका डाला गया हो। इससे पूर्व एसआईआर कार्य के दौरान भी इसी प्रकार बेतहाशा वेतन काटा गया था तब जिला कलेक्टर के कड़े हस्तक्षेप के बाद ही महिलाओं को उनका पूरा मानदेय मिल सका था। हालांकि कलेक्टर की उस सख्ती का असर ज्यादा दिन नहीं टिका और विभाग फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आया।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिका संघ द्वारा हाल ही में सौंपे गए ज्ञापन के बाद भी जब मगरूर अधिकारियों की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया तो संघ ने एक महत्वपूर्ण बैठक की है।
संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि अधिकारियों की यह मनमानी और शोषण का दौर यूं ही जारी रहा तो मस्तूरी सहित पूरे बिलासपुर जिले में एक उग्र आंदोलन खड़ा किया जाएगा। न्याय की उम्मीद में बैठी ये महिलाएं अब अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आर-पार की लड़ाई का मन बना चुकी हैं।



