
एक्सक्लूसिव • स्वास्थ्य विभाग के दावों की खुली पोल, राजधानी रायपुर का सबसे बुरा हाल..


रायपुर। भारत सरकार के वर्ष 2025 तक देश को टीबी (तपेदिक) मुक्त बनाने के भारी-भरकम लक्ष्य की छत्तीसगढ़ में हवा निकल गई है। स्वास्थ्य विभाग की तमाम कागजी रिपोर्टों के उलट जमीनी हकीकत यह है कि प्रदेश में टीबी उन्मूलन अभियान की रफ्तार बेहद सुस्त है। तय समय सीमा खत्म होने के करीब है, लेकिन स्वास्थ्य अमले के रिकॉर्ड में अब भी 29,653 टीबी मरीज दर्ज हैं। सबसे बड़ा खुलासा यह है कि पूरे प्रदेश के 146 विकासखंडों में से स्वास्थ्य विभाग अब तक केवल 4 ब्लॉकों को ही टीबी मुक्त कर सका है। इनमें खुद राजधानी रायपुर का एक भी ब्लॉक शामिल नहीं है। रायपुर में ही सबसे ज्यादा 5 हजार से अधिक मरीज इस गंभीर संक्रामक बीमारी से जूझ रहे हैं।
सिर्फ इन चार ब्लॉकों में मिली सफलता, दिसंबर तक 29 का नया टारगेट..
विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, थर्ड पार्टी और पीयर असेसमेंट के बाद पूरे प्रदेश में केवल कोरिया जिले के खड़गवां और सोनहत, रायगढ़ जिले के घरघोड़ा और सरगुजा जिले के बतौली विकासखंड को ही संक्रमण मुक्त घोषित किया जा सका है। अपना रिपोर्ट कार्ड सुधारने के भारी दबाव में स्वास्थ्य अमला अब आनन-फानन में दिसंबर महीने के भीतर 29 अन्य विकासखंडों को टीबी मुक्त घोषित करने की जल्दबाजी में है। राज्य नोडल अधिकारी (टीबी नियंत्रण) डॉ. संदीप मेश्राम ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि वर्तमान में प्रदेश के चार विकासखंडों को टीबी मुक्त घोषित किया गया है। दिसंबर में 29 और विकासखंडों को टीबी मुक्त घोषित करने की तैयारी की जा रही है।
राजधानी रायपुर में सिस्टम पूरी तरह नाकाम..
आंकड़ों की पड़ताल बताती है कि रायपुर में संक्रमण पर लगाम लगाने में पूरा सरकारी अमला नाकाम साबित हुआ है। जिले में कुल 5,654 टीबी मरीज इलाज करा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के पास राजधानी के शहरी और ग्रामीण इलाकों में बढ़ते मामलों को रोकने के लिए कोई ठोस मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं है, जिसके कारण यह आंकड़ा कम होने के बजाय लगातार बना हुआ है।
टीबी मुक्त घोषित होने के कड़े हैं पैमाने..
किसी भी ब्लॉक को टीबी मुक्त घोषित करने के लिए कड़े मानक तय हैं। प्रति एक हजार की आबादी पर कम से कम 30 लोगों की टीबी जांच अनिवार्य है। साथ ही, प्रति हजार आबादी पर नए मरीजों की संख्या एक या उससे कम होनी चाहिए। इसके अलावा इलाज की सफलता दर 90 प्रतिशत से अधिक होना जरूरी है। मरीजों को नियमित पोषण आहार (निक्षय पोषण) उपलब्ध कराना भी इस सत्यापन का अहम हिस्सा है, जिसमें कई ब्लॉक पिछड़ रहे हैं।
डैमेज कंट्रोल: अब एनसीसी-एनएसएस के युवाओं का सहारा..
अपनी सुस्त रफ्तार को छुपाने और डैमेज कंट्रोल के लिए विभाग अब युवाओं का सहारा ले रहा है। पहले चरण में रायपुर, कांकेर, सरगुजा और राजनांदगांव जिलों के 14 विकासखंडों में एनसीसी और एनएसएस के छात्रों को अभियान से जोड़ा जाएगा। ये छात्र आम लोगों को समय पर जांच कराने और बीच में दवा न छोड़ने के लिए जागरूक करेंगे।
रायपुर: सरकारी से ज्यादा निजी अस्पतालों पर भरोसा..
राजधानी के आंकड़ों में एक बड़ा खुलासा यह भी है कि मरीजों को अब सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर भरोसा नहीं रहा। रायपुर के कुल 5,654 मरीजों में से आधे से ज्यादा मरीज निजी अस्पतालों में जा रहे हैं। रिकॉर्ड के मुताबिक 2,743 मरीज सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं, जबकि 2,911 मरीजों ने इलाज के लिए महंगे निजी अस्पतालों का रुख किया है।








