आधा पाव गांजा, 50 हजार के लेनदेन का आरोप और दो वीडियो..आबकारी टीम पर आरोप, विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल..देखें वीडियो..

महिला का दावा – रकम मिलने के बाद छोड़ा गया बेटा; आबकारी उपनिरीक्षक ने आरोपों को नकारा, युवक ने भी मांगी निष्पक्ष जांच..

बिलासपुर। अवैध नशे के कारोबार पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी निभाने वाला आबकारी विभाग अब अपनी ही एक कार्रवाई को लेकर आरोपों के घेरे में है। एक महिला ने आबकारी उपनिरीक्षक ऐश्वर्या मिंज की टीम पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि उसके बेटे के पास से आधा पाव गांजा मिलने के बाद 50 हजार रुपये के कथित लेनदेन की बात सामने आई। महिला का आरोप है कि रकम मिलने तक टीम उसके बेटे को अपने साथ घुमाती रही और पैसे मिलने के बाद उसे छोड़ दिया गया। हालांकि, आबकारी उपनिरीक्षक ने इन आरोपों से अलग पक्ष रखते हुए कहा है कि कार्रवाई के दौरान कोई मादक पदार्थ नहीं मिला था। उनके मुताबिक, युवक शराब के नशे में अभद्रता कर रहा था और माफी मांगने के बाद उसे छोड़ दिया गया।

इस मामले में महिला के आरोप, आबकारी अधिकारी का जवाब और युवक की ओर से लगाए गए दुर्व्यवहार के आरोप सामने आने के बाद पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। मामले से जुड़े दो वीडियो भी चर्चा में हैं। अब सवाल यह है कि घटना की वास्तविकता क्या है, कथित लेनदेन के आरोपों में कितनी सच्चाई है और विभाग इन सवालों की जांच किस स्तर पर कराएगा।

महिला के आरोपों ने खड़े किए सवाल..

महिला के अनुसार, आबकारी टीम ने उसके बेटे को अपने साथ ले जाने के दौरान गांजा मिलने की बात कही थी। इसके बाद 50 हजार रुपये के कथित लेनदेन का मामला सामने आया। महिला का दावा है कि जब तक रकम नहीं मिली, तब तक उसके बेटे को टीम अपने साथ रखे रही। रकम दिए जाने के बाद उसे छोड़ दिया गया।

देखें वीडियो..

हालांकि, महिला के इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है। यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि कथित रकम किसे, किस परिस्थिति में और किस माध्यम से दी गई। यदि किसी प्रकार का अवैध लेनदेन हुआ है, तो उसकी पुष्टि के लिए संबंधित साक्ष्यों, वीडियो और बयान की जांच महत्वपूर्ण होगी।

आबकारी उपनिरीक्षक ने दिया अलग पक्ष..

दूसरी ओर, आबकारी उपनिरीक्षक ऐश्वर्या मिंज ने महिला के आरोपों से अलग घटनाक्रम बताया है। उनका कहना है कि कार्रवाई के दौरान युवक के पास से कोई मादक पदार्थ नहीं मिला था। उनके मुताबिक, युवक शराब के नशे में था और उसने अभद्रता की थी। बाद में माफी मांगने पर उसे छोड़ दिया गया।

दोनों पक्षों के बयानों में अंतर होने के कारण यह जरूरी हो गया है कि घटना के समय की परिस्थितियों और कार्रवाई की प्रक्रिया की जांच की जाए। केवल आरोप या किसी एक पक्ष के बयान के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि युवक को किस आधार पर अपने साथ रखा गया था और उसे छोड़ने की प्रक्रिया क्या रही।

युवक ने भी लगाए दुर्व्यवहार के आरोप..

इस घटनाक्रम में युवक की ओर से भी अपने साथ दुर्व्यवहार किए जाने का आरोप लगाया गया है। उसने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। ऐसे में जांच का दायरा केवल कथित लेनदेन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि युवक को अपने साथ ले जाने, उसके साथ किए गए व्यवहार और उसे छोड़े जाने की परिस्थितियों की भी पड़ताल होनी चाहिए।

देखें वीडियो..

यदि घटना से जुड़े वीडियो उपलब्ध हैं, तो उनकी मूल रिकॉर्डिंग, समय और घटनाक्रम के संदर्भ की जांच अहम होगी। वीडियो में दिखाई देने वाली बातों को पूरे घटनाक्रम का प्रमाण मानने से पहले यह देखना जरूरी है कि उनमें घटना का कितना हिस्सा दर्ज है और क्या कोई महत्वपूर्ण हिस्सा रिकॉर्डिंग से बाहर है।

चखना दुकानों के संचालन से जुड़े आरोप भी चर्चा में..

इस मामले के साथ चखना दुकानों के संचालन को लेकर पहले से लगाए जा रहे आरोपों का मुद्दा भी चर्चा में है। हालांकि, इन आरोपों और मौजूदा घटनाक्रम के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि होना अभी बाकी है। इसलिए दोनों मामलों को अलग-अलग तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर देखना जरूरी है।

आबकारी विभाग की जिम्मेदारी केवल अवैध शराब और नशीले पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई करना ही नहीं, बल्कि अपनी कार्रवाई को नियमों के अनुरूप और पारदर्शी रखना भी है। विभाग की किसी टीम पर गंभीर आरोप लगने की स्थिति में निष्पक्ष जांच से ही सच्चाई सामने आ सकती है और आम लोगों का भरोसा कायम रह सकता है।

जिला सहायक आबकारी आयुक्त की भूमिका पर नजर..

अब निगाहें जिला सहायक आबकारी आयुक्त के रुख पर हैं। क्या विभाग इस मामले में जांच करायेंगे? क्या संबंधित टीम की कार्रवाई से जुड़े दस्तावेज, उपलब्ध वीडियो और दोनों पक्षों के बयान की समीक्षा होगी? क्या कथित लेनदेन के आरोपों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? इन सवालों पर विभाग की ओर से स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है।

फिलहाल, महिला और युवक के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, जबकि आबकारी उपनिरीक्षक ने अपना अलग पक्ष रखा है। ऐसे में किसी भी पक्ष को दोषी ठहराने के बजाय पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए और यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब आबकारी विभाग खुद नशे के अवैध कारोबार पर कार्रवाई करता है, तो उसकी अपनी टीम पर लगे गंभीर आरोपों की जांच कौन और कितनी पारदर्शिता से करेगा? अब जिला आबकारी प्रशासन के आधिकारिक रुख और जांच की दिशा पर सबकी नजर है।