बिलासपुर।आम आदमी जब व्यवस्था की खामियों पर सवाल उठाता है, तो उसे सूचना के अधिकार (आरटीआई) से न्याय की बड़ी आस होती है। लेकिन सिम्स (CIMS) भर्ती मामले में यह आस कानून के प्रावधानों के बीच उलझ कर रह गई। जिस जांच रिपोर्ट से अनियमितता का सच सामने आने की उम्मीद थी, उस पर हाई कोर्ट ने कानूनी गोपनीयता की मुहर लगा दी है। कोर्ट ने राज्य सूचना आयोग के आदेश को क्षेत्राधिकार से बाहर और अवैध मानते हुए रद्द कर दिया है, जिसमें लोक आयोग को गोपनीय जानकारी देने को कहा गया था।

आरटीआई से सच जानने का वह संघर्ष..
कहानी शुरू होती है साल 2013-14 से, जब सिम्स में की गई भर्तियों में गड़बड़ी और अनियमितता की बात उठी। व्यवस्था से जवाब मांगने के लिए संजीव कुमार पंडल ने वर्ष 2016 में छत्तीसगढ़ लोक आयोग में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद सच्चाई सामने लाने के लिए बिलासपुर के सोमराज श्रीवास्तव ने अप्रैल 2018 में आरटीआई का रास्ता चुना। उन्होंने आवेदन देकर पंडल की शिकायत, उस पर हुई कार्यवाही और पारित अंतिम आदेश की कॉपी मांगी।
गोपनीयता का तर्क और निराशा..
मई 2018 में लोक आयोग के जन सूचना अधिकारी ने जानकारी देने से इनकार कर दिया। अधिकारी ने तर्क दिया कि छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम, 2002 की धारा 14 के अंतर्गत जांच सामग्रियां गोपनीय होती हैं। इसे गवाहों की सुरक्षा का विषय बताते हुए आरटीआई एक्ट की धारा 8 (1) (जी) और 8 (1) (एच) के तहत छूट प्राप्त बताया गया। श्रीवास्तव ने हार नहीं मानी और लोक आयोग के प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के पास अपील की, पर वहां भी जनसूचना अधिकारी का फैसला सही ठहराया गया और जानकारी साझा करने से मना कर दिया गया।
सूचना आयोग से जगी थी उम्मीद..
लगातार मिल रही निराशा के बाद श्रीवास्तव ने न्याय की आस में छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दाखिल की। 28 मई 2021 को सूचना आयोग ने पुराने दोनों फैसलों को पलट दिया। आयोग का तर्क था कि आरटीआई एक्ट की धारा 22 के तहत सूचना के अधिकार को अन्य किसी भी कानून पर प्राथमिकता हासिल है, इसलिए लोक आयोग गोपनीयता का हवाला देकर जानकारी छिपा नहीं सकता। ऐसा लगा जैसे अब भर्ती की फाइलें खुल जाएंगी।
हाई कोर्ट ने पलट दी बाजी : जांच पूरी होने पर भी बरकरार रहेगी गोपनीयता..
सूचना आयोग के इसी आदेश के खिलाफ लोक आयोग ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई। अब जस्टिस संजय के अग्रवाल की सिंगल बेंच ने आरटीआई और लोक आयोग अधिनियम के टकराव पर अपना फैसला सुनाया। न्यायालय ने कहा कि सूचना का अधिकार अन्य कानूनों पर प्राथमिकता जरूर देता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि लोक आयोग अधिनियम की धारा 14(1) का गोपनीयता का प्रावधान निरस्त या खत्म हो गया।
कोर्ट ने कहा कि दोनों कानून अपनी-अपनी जगह लागू रहेंगे, जब तक कि उनमें कोई प्रत्यक्ष विरोधाभास न दिखाई दे। न्यायालय ने सूचना आयोग के उस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि जांच पूरी होकर मामला निपटने के बाद गोपनीयता की धारा लागू नहीं होगी।
हाई कोर्ट के इस फैसले से तय हो गया है कि सिम्स की भर्तियों पर लोक आयोग की जांच फाइल फिलहाल कानून की नजर में एक राज ही रहेगी।






