

बिलासपुर,मस्तूरी। बिलासपुर जिले के मस्तूरी ब्लॉक में एकीकृत महिला एवं बाल विकास विभाग (ICDS) के भीतर एक गंभीर अनियमितता का मामला सामने आया है। यहाँ अल्प मानदेय पर कार्यरत आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के वेतन में बिना किसी ठोस आधार के कटौती की जा रही है। विशेष रूप से लोहार्सि और जयराम नगर जैसे क्षेत्रों में कार्यरत महिलाएं इस प्रशासनिक आतंक का शिकार हो रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें बड़ी संख्या विधवा और परित्यक्ता महिलाओं की है, जिनके लिए यह मानदेय ही जीवनयापन का एकमात्र सहारा है।

सुपरवाइजरों के बीच छवि चमकाने की होड़ में पिस रहीं कार्यकर्ता..
मिली जानकारी के अनुसार, विभाग की कुछ महिला पर्यवेक्षक (सुपरवाइजर) उच्चाधिकारियों और सीडीपीओ (CDPO) के सामने अपनी कार्यकुशलता की झूठी छवि चमकाने के लिए इन गरीब महिलाओं के मानदेय में धड़ल्ले से कटौती कर रही हैं। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वे महीने भर निष्ठापूर्वक कार्य करती हैं, इसके बावजूद उपस्थिति पंजी और रिपोर्ट में हेरफेर कर उनका 10 से 12 दिन का मानदेय काट लिया जाता है।
कार्यकर्ताओं ने बताया कि विभाग में सुपरवाइजरों का दबदबा इतना है कि जायज सवाल पूछने पर उन्हें काम से निकालने या और अधिक वेतन काटने की धमकी दी जाती है। यह स्थिति तब है जब आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को न केवल महिला एवं बाल विकास, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और निर्वाचन जैसे अन्य सरकारी विभागों के कार्यों में भी झोंक दिया जाता है।
कलेक्टर के हस्तक्षेप के बाद भी नहीं बदले हालात..
यह पहली बार नहीं है जब मस्तूरी में वर्कर्स के हक पर डाका डाला गया हो। इससे पूर्व ‘एसआईआर’ (SIR) कार्य में लगी कार्यकर्ताओं का वेतन भी इसी तरह काटा गया था। उस समय मामला तूल पकड़ने पर जिला कलेक्टर ने स्वयं हस्तक्षेप किया था, जिसके बाद कार्यकर्ताओं को उनका पूरा मानदेय प्राप्त हुआ था। हालांकि, कलेक्टर की उस सख्ती का असर कुछ ही समय रहा और अब फिर से वही पुराना ढर्रा शुरू हो गया है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिका संघ ने हाल ही में इस समस्या को लेकर विभागीय अधिकारियों को ज्ञापन भी सौंपा था। संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि ज्ञापन और शिकायतों के बावजूद धरातल पर नतीजा सिफर है। मगरूर अधिकारियों की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया है और मजबूर महिलाओं का शोषण बदस्तूर जारी है।
बहुउद्देशीय कार्यों का बोझ, पर सुरक्षा के नाम पर शून्य..
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की स्थिति वर्तमान में बंधुआ मजदूर जैसी होती जा रही है। सुबह केंद्र खोलने से लेकर दोपहर में बच्चों को पोषण आहार वितरण, फिर सर्वे कार्य और शाम को ऑनलाइन डेटा एंट्री – इन सबमें उनका पूरा दिन बीत जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एक कार्यकर्ता को मिलने वाला मानदेय पहले ही बेहद कम है, और उस पर भी कटौती करना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
पीड़ित कार्यकर्ताओं का दर्द..
हम सुबह से शाम तक क्षेत्र में दौड़ते रहते हैं। लोहरसी जैसे दूरस्थ इलाकों से रिपोर्ट जमा करने कार्यालय आते हैं। इसके बावजूद साहब लोग कहते हैं कि काम पूरा नहीं हुआ और 10 दिन की सैलरी काट लेते हैं। घर चलाना मुश्किल हो गया है।
अधिकारियों का संरक्षण और मौन सहमति..
सूत्रों का दावा है कि यह सारा खेल सीडीपीओ की सरपरस्ती में चल रहा है। निचले स्तर की सुपरवाइजरों द्वारा की जा रही इस धांधली पर उच्चाधिकारियों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। विभाग के भीतर ही चर्चा है कि वेतन कटौती के इस खेल के पीछे एक सोची-समझी रणनीति है, ताकि ऊपरी स्तर पर अनुशासन का दिखावा किया जा सके।
न्याय की उम्मीद में संघ..
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिका संघ ने इस गंभीर विषय को लेकर एक बैठक की है जिसमें इस बात पर सहमति बनी है कि यदि अधिकारी इसी तरह मनमानी करते रहे तो मस्तूरी सहित पूरे जिले में बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाएगा।



