

गरियाबंद,बस्तर। कभी नक्सल हिंसा, बारूदी सुरंगों और सुरक्षा अभियानों के लिए पहचाने जाने वाला बस्तर-गढ़चिरौली क्षेत्र अब एक नई पहचान की ओर बढ़ रहा है। वर्षों तक रेड कॉरिडोर कहलाने वाला यह इलाका आज वन्यजीव संरक्षण का उभरता हुआ केंद्र बनता जा रहा है।

लगातार सुरक्षा बलों की मौजूदगी, नक्सल विरोधी अभियानों और वन विभाग के सघन संरक्षण प्रयासों के चलते यह क्षेत्र धीरे-धीरे रेड कॉरिडोर से टाइगर कॉरिडोर में तब्दील हो रहा है।
सुरक्षा और संरक्षण का साझा असर..
बस्तर-गढ़चिरौली क्षेत्र में सीआरपीएफ द्वारा चलाए गए नक्सल विरोधी अभियानों से जहां जंगलों में मानवीय दखल और अवैध गतिविधियों में कमी आई है, वहीं दूसरी ओर उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व (यूएसटीआर) द्वारा संचालित शिकार-रोधी अभियान और अतिक्रमण हटाने की कार्यवाहियों ने जंगलों के स्वास्थ्य को नई ऊर्जा दी है।
यूएसटीआर प्रबंधन ने गढ़चिरौली, पखांजूर और बीजापुर जिलों में संयुक्त रूप से शिकार-रोधी अभियान चलाए हैं। अब तक करीब 750 हेक्टेयर अतिक्रमित वनभूमि को मुक्त कराया जा चुका है। इसका सीधा असर वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही और प्राकृतिक आवासों के पुनर्जीवन पर पड़ा है।
सक्रिय हुआ ऐतिहासिक टाइगर कॉरिडोर..

यह ऐतिहासिक टाइगर कॉरिडोर महाराष्ट्र के ताडोबा-अंधारी टाइगर रिज़र्व (चंद्रपुर-गढ़चिरौली) को छत्तीसगढ़ के इंद्रावती टाइगर रिज़र्व (बीजापुर) से जोड़ता है। आगे चलकर यही कॉरिडोर उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व और ओडिशा के सुनाबेड़ा वन्यजीव अभयारण्य तक फैला हुआ है।पिछले 9 महीनों में यूएसटीआर क्षेत्र से 3 बाघों की आवाजाही दर्ज की गई है। यह इस बात का ठोस संकेत है कि वर्षों से निष्क्रिय पड़ा यह कॉरिडोर अब दोबारा जीवंत हो रहा है।

बाघों का बढ़ता दबाव, नए इलाकों की तलाश..
मध्य प्रदेश (2022 की गणना में 785 बाघ) और महाराष्ट्र (444 बाघ) में बाघों की संख्या अब लगभग संतृप्त हो चुकी है। ऐसे में खासतौर पर नर बाघ नए और सुरक्षित क्षेत्रों की तलाश में लंबी दूरी तय कर रहे हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार,बाघिनें सामान्यतः 100-150 किलोमीटर तक ही विचरण करती हैं,जबकि नर बाघ 1000 से 1500 किलोमीटर तक यात्रा कर सकते हैं। इसी कारण यूएसटीआर जैसे अपेक्षाकृत शांत और सुरक्षित जंगल बाघों को आकर्षित कर रहे हैं।
हैरान करने वाली बाघों की लंबी यात्राएँ..
मई 2025 में यूएसटीआर में कैमरा ट्रैप में कैद हुआ एक नर बाघ अब बारनवापारा वन्यजीव अभयारण्य में देखा गया है। उसकी पहचान शरीर पर मौजूद धारियों के पैटर्न से की गई।
इसी तरह, वर्ष 2022 में तेलंगाना के कवाल टाइगर रिज़र्व से लगभग 700 किलोमीटर दूर यूएसटीआर पहुँचा एक नर बाघ, 2023 में ओडिशा के देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में दर्ज किया गया।
मादा बाघों की कमी बनी सबसे बड़ी चुनौती..
हालांकि यूएसटीआर बाघों को आकर्षित करने में सफल रहा है, लेकिन रिज़र्व में मादा बाघों की अनुपस्थिति के कारण नर बाघ यहां स्थायी रूप से ठहर नहीं पा रहे हैं।इस समस्या के समाधान के लिए मध्य प्रदेश से दो मादा बाघों को यूएसटीआर में स्थानांतरित करने की योजना तैयार की गई है, जो फिलहाल एनटीसीए (राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण) की मंजूरी के लिए लंबित है।
भविष्य का वन्यजीव कॉरिडोर..
आईटीआर-यूएसटीआर कॉरिडोर केवल बाघों के लिए ही नहीं, बल्कि जंगली भैंसों और हाथियों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाला है।पूर्वी पड़ोसी राज्यों में बढ़ती गैर-वन गतिविधियों के चलते हाथियों की आवाजाही अब लगातार छत्तीसगढ़ की ओर हो रही है। यह कॉरिडोर भविष्य में बस्तर के जंगलों की ओर बढ़ते हाथियों के लिए मुख्य प्रवेश द्वार बनेगा।
उत्तर बस्तर कांकेर जिले में पहले ही महाराष्ट्र से पखांजूर और यूएसटीआर से सरोना तक हाथियों की आवाजाही दर्ज की जा चुकी है।
वन-भैंसों को जोड़ने की बड़ी योजना..

इसके साथ ही सेंट्रल इंडियन लैंडस्केप में बड़े पैमाने पर वन्यजीव आवास सुधार की योजनाएँ चल रही हैं, ताकि इंद्रावती-पामेड़ क्षेत्र की जंगली भैंसों की आबादी को यूएसटीआर से जोड़ा जा सके।
नई उम्मीद का जंगल..
जिस इलाके को कभी अशांति, भय और हिंसा का प्रतीक माना जाता था, वही बस्तर-गढ़चिरौली क्षेत्र आज वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता की नई उम्मीद बनकर उभर रहा है।यदि सुरक्षा, संरक्षण और नीति निर्धारण इसी तरह आपसी तालमेल से आगे बढ़ते रहे, तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र देश के सबसे महत्वपूर्ण वन्यजीव कॉरिडोरों में शामिल हो सकता है।
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