

बिलासपुर।प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए छत्तीसगढ़ शासन के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, छत्तीसगढ़ वेटलैंड ऑथोरिटी और छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में बिलासपुर वनमंडल द्वारा वन चेतना केंद्र, सकरी में ‘आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी एवं पक्षी संरक्षण’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का भव्य और सफल आयोजन किया गया।



इस कार्यशाला में आर्द्रभूमियों (वेटलैंड) के महत्व, उनकी सुरक्षा, जैव विविधता के संरक्षण और पक्षियों की सुरक्षा जैसे अहम विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने सरल भाषा में बताया कि आर्द्रभूमियां केवल पानी भरे क्षेत्र नहीं होतीं, बल्कि वे पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने, भूजल को सुरक्षित रखने और हजारों जीव-जंतुओं के जीवन का आधार होती हैं।
कार्यक्रम में खास तौर पर छत्तीसगढ़ की पहली रामसर साइट कोपरा जलाशय पर विशेष ध्यान दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि कोपरा जलाशय न केवल जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह कई दुर्लभ पक्षियों और जल जीवों का घर भी है। इसके संरक्षण से पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में बड़ी मदद मिलती है। इसे राज्य के लिए गर्व का विषय बताया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत वनमंडलाधिकारी नीरज कुमार के स्वागत उद्बोधन से हुई। उन्होंने कहा कि आज के समय में आर्द्रभूमियों का संरक्षण बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और प्रदूषण के कारण ये क्षेत्र खतरे में हैं। उन्होंने बताया कि इस तरह की कार्यशालाएं लोगों को जागरूक करने का एक प्रभावी माध्यम हैं।

इसके बाद मुख्य वन संरक्षक मनोज पांडे ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि आर्द्रभूमियां प्रकृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये जलवायु को संतुलित रखने, बाढ़ नियंत्रण करने और जैव विविधता को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। उन्होंने लोगों से इनकी रक्षा के लिए आगे आने की अपील की।
कार्यशाला के विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञों ने अलग-अलग विषयों पर विस्तार से जानकारी दी।

गुरु घासीदास विश्वविद्यालय की प्रो. गरिमा तिवारी ने आर्द्रभूमि की संरचना, उसके काम करने के तरीके और पर्यावरण में उसकी भूमिका को आसान भाषा में समझाया। उन्होंने बताया कि आर्द्रभूमियां प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करती हैं और पानी को साफ रखने में मदद करती हैं।

वन्यजीव फोटोग्राफर सिरीश डामरे ने कोपरा क्षेत्र के इतिहास और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि स्थानीय लोगों का जीवन भी इन प्राकृतिक संसाधनों से गहराई से जुड़ा हुआ है।


सौरभ तिवारी ने कोपरा गांव के लोगों की जीवनशैली, संस्कृति और आजीविका को आर्द्रभूमि से जोड़कर समझाया।
दूसरे सत्र में अनुराग विश्वकर्मा ने आर्द्रभूमियों के महत्व को विस्तार से बताते हुए उनके संरक्षण के लिए आसान और व्यावहारिक उपाय सुझाए।
शोधार्थी अनिमेष शुक्ला ने शहरीकरण और प्रदूषण से आर्द्रभूमियों पर पड़ने वाले खतरों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में पर्यावरण संतुलन बिगड़ सकता है। उन्होंने जनभागीदारी और मजबूत नीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया।

नरेंद्र साहू ने जल वनस्पतियों (मैक्रोफाइट्स) के महत्व को समझाते हुए बताया कि ये पौधे आर्द्रभूमि के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी होते हैं और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखते हैं।

छत्तीसगढ़ वेटलैंड ऑथोरिटी की वरिष्ठ वैज्ञानिक नीतू हरमुख ने युवाओं में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अगर युवा पीढ़ी जागरूक होगी, तो पर्यावरण संरक्षण का भविष्य सुरक्षित रहेगा।


पर्यावरणविद् संतोष खंडेलवाल ने स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी को सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि प्रकृति की रक्षा तभी संभव है जब समाज मिलकर प्रयास करे।


इस कार्यशाला में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के वानिकी, वन्यजीव और पर्यावरण विज्ञान विभाग के छात्र-छात्राओं और शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कुल 70 प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों से सवाल-जवाब कर अपनी जिज्ञासाएं दूर कीं और नए ज्ञान हासिल किए।

कार्यक्रम के समापन पर उपवनमंडलाधिकारी टी. आर. मरई ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

इस आयोजन में शहर के पर्यावरणविदों, पक्षी प्रेमियों और वन विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों का सराहनीय सहयोग रहा।

यह कार्यशाला न केवल आर्द्रभूमियों के महत्व को समझाने में सफल रही, बल्कि विशेष रूप से कोपरा रामसर साइट के संरक्षण और पक्षियों की सुरक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक मजबूत और सार्थक कदम साबित हुई।



