

गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वन भैंसा के अस्तित्व को बचाने के लिए अब प्रशासन के साथ-साथ आम जनता ने भी कमर कस ली है। उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व के कोर इलाके में आने वाले 17 गांवों के आदिवासियों ने एक मिसाल पेश करते हुए अपने जंगलों में अकेले बचे नर वन भैंसे छोटू का कुनबा बढ़ाने के लिए हाथ मिलाया है। 14 दिसंबर 2025 को हुई एक अहम बैठक में ग्रामीणों ने न केवल वन भैंसों के संरक्षण पर सहमति जताई, बल्कि वन्यजीवों के लिए अपने कब्जे वाली वन भूमि को भी स्वेच्छा से खाली करने का बड़ा फैसला लिया है।

बरनावापारा से आएंगी तीन मादाएं, छोटू का बढ़ेगा कुनबा..

असम के मानस नेशनल पार्क से लाई गई तीन मादा वन भैंसों को, जिन्हें फिलहाल बरनावापारा अभयारण्य में रखा गया है, जल्द ही उदंती शिफ्ट किया जाएगा। इन मादाओं को यहां के इकलौते नर वन भैंसे छोटू के साथ छोड़ा जाएगा ताकि प्राकृतिक रूप से उनकी आबादी बढ़ सके। अधिकारियों का मानना है कि इससे मध्य भारतीय वन भैंसों के जीन पूल को बचाया जा सकेगा और अंतःप्रजनन का खतरा भी कम होगा। गौरतलब है कि पिछले दो सालों में बरनावापारा में 5 बछड़ों के जन्म के साथ इनकी संख्या बढ़कर 11 हो गई है।
ग्रामीणों ने छोड़ी 750 हेक्टेयर जमीन, तैनात होंगे वन भैंसा मित्र..

इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात ग्रामीणों का सहयोग है। वन विभाग ने वन्यजीव गलियारे के लिए करीब 750 हेक्टेयर जमीन से अतिक्रमण हटाया है। जंगलों में आग और अवैध कटाई रोकने के लिए 17 गांवों के प्रतिनिधि खुद निगरानी कर रहे हैं। सुरक्षा के लिए वन भैंसा मित्र दल तैनात किए जाएंगे जो पैदल गश्त कर इन पर नजर रखेंगे। साथ ही, हाथियों की तरह अब वन भैंसों के मूवमेंट की जानकारी भी हाथी अलर्ट ऐप के जरिए लोगों को दी जाएगी।
दावों का 30 दिन में निपटान और ईको-टूरिज्म से रोजगार..

वन विभाग के उप निदेशक ने बताया कि फसल या मवेशियों के नुकसान की भरपाई के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल बनाया जा रहा है, जिससे 30 दिनों के भीतर मुआवजा मिल जाएगा। इसके साथ ही क्षेत्र में मालाबार पाइड हॉर्नबिल और विशाल गिलहरी जैसी दुर्लभ प्रजातियों को देखने के लिए ईको-टूरिज्म को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए मौके मिलेंगे। इस पूरे अभियान की देखरेख भारतीय वन्यजीव संस्थान और एनटीसीए की टीम कर रही है।



