ईको-टूरिज्म से बदलेगी गांवों की तस्वीर : अब नहीं होगा पलायन, दुर्लभ वन्यजीव बनेंगे रोजगार का सहारा..

उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व में ‘गुडविल एम्बेसडर’ योजना शुरू, गांवों को मिल रही नई पहचान..

गरियाबंद। गरियाबंद-धमतरी क्षेत्र के उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व में अब वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों के जीवन में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां पहले रोजगार के अभाव में ग्रामीणों को आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में बोर गाड़ी और ईंट-भट्ठों में काम करने के लिए पलायन करना पड़ता था, वहीं अब ईको-पर्यटन उनके लिए गांव में ही रोजगार के नए अवसर लेकर आया है।

दुर्लभ वन्यजीवों की बढ़ती संख्या बनी आकर्षण का केंद्र..

पिछले तीन वर्षों में वन विभाग और स्थानीय ग्रामीणों के संयुक्त प्रयासों से टाइगर रिज़र्व में कई दुर्लभ प्रजातियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इनमें मालाबार पाईड हार्नबिल, भारतीय उड़न गिलहरी, भारतीय विशाल गिलहरी और शाहीन फाल्कन (दुनिया का सबसे तेज़ उड़ने वाला पक्षी) प्रमुख हैं।

इन अनोखे वन्यजीवों को देखने अब दूर-दूर से पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं, जिससे क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं।

‘गुडविल एम्बेसडर’ बनेंगे गांव के प्रमुख लोग..

ईको-पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक नई पहल के तहत गांवों के प्रमुख व्यक्तियों को ‘गुडविल एम्बेसडर’ बनाया जा रहा है। ये एम्बेसडर वन विभाग के साथ मिलकर ग्रामीणों को जागरूक करेंगे और युवाओं को नेचर गाइड व सफारी गाइड बनने के लिए प्रेरित करेंगे।

टाइगर रिज़र्व प्रशासन इन गाइड्स का ऑनलाइन पंजीकरण करेगा, जिससे पर्यटक पहले से ही गाइड और सफारी बुक कर सकेंगे। इससे स्थानीय युवाओं को स्थायी रोजगार मिलेगा और बाहर पलायन की मजबूरी खत्म होगी।

गांवों को मिल रही नई पहचान..

इस योजना के तहत अलग-अलग गांवों को वहां पाए जाने वाले विशेष वन्यजीवों के आधार पर नई पहचान दी जा रही है –

कुल्हाड़ीघाट – “उड़न गिलहरी ग्राम” (कायाकिंग व जिप्सी सुविधा)

ओढ़ – “हार्नबिल ग्राम” (ट्रैकिंग, कायाकिंग, टेंट में ठहरने की व्यवस्था)

साहेबिनकछार व नागेश – “वन-भैंसा ग्राम” (जिप्सी सफारी)

कोयबा, सिंघनपुर, बहिगांव – “भारतीय विशाल गिलहरी ग्राम” (कॉटेज व सफारी सुविधा)

आमामोरा, बुड्गेलटप्पा, इन्दागांव – “हार्नबिल व शाहीन बाज़ ग्राम”

भीरागांव – “बाघ ग्राम”

नक्सलवाद से मुक्ति के बाद विकास को मिली रफ्तार..

गरियाबंद और धमतरी जिले अब नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं। ऐसे में यहां विकास और पर्यटन की संभावनाएं तेजी से बढ़ी हैं। ईको-पर्यटन के जरिए अब यह क्षेत्र न सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाएगा, बल्कि ग्रामीण रोजगार के मॉडल के रूप में भी उभरेगा।

पलायन रुकेगा, गांव बनेंगे आत्मनिर्भर..

इस पहल से स्थानीय ग्रामीणों को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिलेगा। गाइड, सफारी, होमस्टे और अन्य पर्यटन गतिविधियों से आय बढ़ेगी। अब उन्हें दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

ईको-टूरिज्म के जरिए उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व न केवल वन्यजीवों का संरक्षण कर रहा है, बल्कि ग्रामीणों के जीवन में खुशहाली और आत्मनिर्भरता की नई राह भी खोल रहा है।