

बिलासपुर। सकरी क्षेत्र की रामा लाइफ सिटी, आसमा सिटी सहित आसपास की कॉलोनियों में कोयले की धूल (कोल डस्ट) से फैलते प्रदूषण ने अब गंभीर रूप ले लिया है। धूल के कारण लोगों का दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। लगातार शिकायतों के बावजूद जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो अब रहवासियों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का फैसला कर लिया है।

कई बार शिकायत, फिर भी नहीं समाधान..

स्थानीय निवासियों के अनुसार, उन्होंने इस समस्या को लेकर कई बार नगर निगम और प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की। कलेक्टर को फोटो और वीडियो साक्ष्य भी सौंपे गए। उनके निर्देश पर पर्यावरण विभाग में औपचारिक शिकायत दर्ज की गई और अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण कर कार्रवाई का आश्वासन भी दिया। इसके बावजूद, रहवासियों का आरोप है कि जमीनी स्तर पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। बाद में कॉलोनीवासियों ने सामूहिक हस्ताक्षर के साथ ज्ञापन तैयार कर संबंधित विभागों को भेजा।
प्रदूषण जांच भी बनी औपचारिकता..
हाल ही में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम ने क्षेत्र में लगभग छह घंटे तक मशीन के माध्यम से प्रदूषण स्तर का डेटा एकत्र किया। रहवासियों ने अतिरिक्त नक्शे और साक्ष्य भी उपलब्ध कराए, जिससे समस्या की गंभीरता स्पष्ट हो सके। फिर भी लोगों में नाराजगी है। उनका आरोप है कि विभाग केवल औपचारिक कार्रवाई करता है और उद्योगों के साथ मिलीभगत के चलते ठोस कदम नहीं उठाए जाते।
हाईकोर्ट में जनहित याचिका की तैयारी..
सूत्रों के अनुसार, अब क्षेत्र के लोग छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर करने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए कानूनी विशेषज्ञों और अनुभवी व्यक्तियों से सलाह ली जा रही है, ताकि मामला प्रभावी ढंग से न्यायालय में रखा जा सके। जल्द ही 15-20 लोगों का समूह प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, बिलासपुर के क्षेत्रीय कार्यालय में ज्ञापन सौंपेगा।
पर्यावरण और वन्यजीवों पर खतरा..


यह समस्या केवल कॉलोनियों तक सीमित नहीं है। सकरी के पास स्थित कानन पेंडारी और कोपरा जलाशय जैसे संवेदनशील क्षेत्र भी इससे प्रभावित हो सकते हैं।
कानन पेंडारी में वन्यजीवों पर खतरा बढ़ रहा है।
कोपरा जलाशय, जिसे रामसर साइट का दर्जा प्राप्त है, प्रदूषण की चपेट में आ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोल वाशरी और पावर प्लांट गतिविधियां इसी तरह जारी रहीं, तो यह हरा-भरा क्षेत्र गंभीर पर्यावरणीय संकट में फंस सकता है।
अधिकार और नियम..
ऐसी परिस्थितियों में नागरिकों के पास कई कानूनी अधिकार मौजूद हैं :
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कार्रवाई की जा सकती है।
वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अनुसार वायु गुणवत्ता बनाए रखना अनिवार्य है।
कोई भी नागरिक जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से सीधे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में मामला उठा सकता है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में भी पर्यावरण से जुड़े मामलों की सुनवाई होती है।
सकरी क्षेत्र में कोल डस्ट और कोयला की राख से उत्पन्न संकट अब केवल स्थानीय परेशानी नहीं, बल्कि एक बड़ा पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य मुद्दा बन चुका है। यदि प्रशासन ने समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो यह मामला न्यायालय में पहुंचकर और गंभीर रूप ले सकता है।
रहवासियों की एकजुटता और कानूनी पहल आने वाले समय में इस पूरे क्षेत्र के भविष्य को तय कर सकती है।



