

रायपुर। छत्तीसगढ़ में मिलावटखोरी के खिलाफ जारी अभियान प्रशासनिक सुस्ती और संसाधनों के अभाव के कारण दम तोड़ता नजर आ रहा है। राज्य के 33 जिलों में से मात्र 2 जिलों में ही मिलावट से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए कोर्ट लग रहे हैं, जबकि शेष 31 जिलों में न्याय प्रक्रिया पूरी तरह ठप है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश भर में 400 से अधिक प्रकरण लंबित हैं, जिससे मिलावटखोरों के हौसले बुलंद हैं और आम जनता की सेहत सीधे तौर पर दांव पर लगी है।

प्रशासनिक फेरबदल बना मुसीबत, एसडीएम से छीने अधिकार पर डीओ नहीं हुए तैयार..
अक्टूबर 2025 में शासन ने व्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से दो दर्जन से अधिक फूड सेफ्टी ऑफिसर्स (FSO) को पदोन्नत कर अभिहित अधिकारी (DO) बनाया था। इस बदलाव से पहले, मिलावटी खाद्य पदार्थों के मामलों की सुनवाई का जिम्मा राजस्व विभाग के एसडीएम (SDM) के पास था। नई व्यवस्था के तहत अब यह जिम्मेदारी डीओ को सौंपी गई है, जिन्हें 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाने का अधिकार प्राप्त है।
विडंबना यह है कि पदोन्नति के 5 माह बीत जाने के बाद भी केवल महासमुंद और कांकेर में ही कोर्ट का संचालन शुरू हो पाया है। रायपुर जैसे महत्वपूर्ण जिले सहित प्रदेश के अन्य हिस्सों में डीओ कोर्ट लगाने में पूरी तरह असफल रहे हैं।
संसाधनों का टोटा : राजधानी में किराए के जर्जर भवन के भरोसे विभाग..
व्यवस्थागत खामियों की पोल तब खुलती है जब विभाग के पास राजधानी रायपुर में भी अपना स्थायी कार्यालय नहीं है। वर्तमान में खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग पुराने डीकेएस अस्पताल के जर्जर भवन में संचालित हो रहा है। अफसरों के पास बैठने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है, और कई बार छापेमारी में जब्त किया गया माल रखने तक की जगह नहीं मिल पाती। इससे पहले यह कार्यालय रायपुर लैब के प्रथम तल पर संचालित था, लेकिन वर्तमान स्थिति बदतर बनी हुई है।
पेंडेंसी का अंबार : एडीएम कोर्ट में भी सालों से अटके मामले..
सिर्फ छोटे मामले ही नहीं, बल्कि गंभीर प्रकृति के 200 से अधिक बड़े मामले भी एडीएम (ADM) कोर्ट में सालों से लंबित हैं। राजस्व कार्यों और प्रशासनिक व्यस्तताओं के चलते इन मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है।
डोमेन्द्र ध्रुव, प्रभारी सहायक नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग,रायपुर ,छ.ग.
मैनपावर की कमी :12 साल से नहीं हुई नई भर्ती..
विभाग में रिक्त पदों का संकट भी कार्रवाई में बड़ी बाधा है। प्रदेश में आखिरी बार फूड सेफ्टी ऑफिसर्स की सीधी भर्ती 2012-14 में हुई थी। इसके बाद से कोई नई नियुक्ति नहीं हुई है।
वर्तमान में जिन जिलों में 7 से 8 अधिकारियों की आवश्यकता है, वहां केवल 2-3 अफसर ही कार्यरत हैं।एक-एक अधिकारी के पास 2 से 3 जिलों का अतिरिक्त प्रभार है। पर्याप्त स्टाफ न होने के कारण न तो नियमित सैंपलिंग हो पा रही है और न ही मामलों का फॉलो-अप लिया जा रहा है।
सरकारी दावों के विपरीत, धरातल पर मिलावटखोरों को न तो सजा का भय है और न ही भारी जुर्माने का। जब तक कोर्ट की प्रक्रिया सुचारू नहीं होती, तब तक छापों और सैंपलिंग की कवायद महज कागजी खानापूर्ति ही बनी रहेगी।



